सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

किंतु इस बीच .........

 
     देश की सम्प्रभुता पर आक्रमण होता है। आक्रमणकारी को दण्ड दिया जाता है। दण्ड से देश के लोग आक्रोशित होते हैं।
     यह कैसा देश है? ये कौन लोग हैं जो भारतीय संसद के आक्रमणकारी को मृत्युदण्ड दिये जाने पर क्रोधित हो रहे हैं?
     यह एक सपष्ट संकेत है कि कुछ लोग पृथक होना चाहते हैं। उन्हें भारत के प्रति निष्ठा नहीं है। परंतु क्यों नहीं है निष्ठा? यह भी एक ज्वलंत प्रश्न है।
    राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने कश्मीर को विवादित बना दिया। दूरदर्शिता के अभाव ने देश को खण्डित किया। खण्डन की प्रक्रिया अभी थमी नहीं है। भ्रष्टाचार, नैतिक पतन, प्रशासनिक अक्षमता और संवेदनहीनता ने देश को एक ऐसी अराजक स्थिति में झोंक दिया है जिसका परिणाम भारतीय लोकतंत्र को कबीला तंत्र में बदल देगा। भारत का आदर्शपूर्ण गौरव समाप्तप्राय है। भारतीय उपमहाद्वीप अशांत है, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान जल रहे हैं, भारत और बांग्ला देश सुलग रहे हैं।
     अशांति धरती के भीतर भी है और धरती के ऊपर भी। टेक्टोनिक प्लेट्स किसी बड़ी उथल-पुथल की तैयारी में हैं। आने वाले एक हज़ार वर्ष पूरे विश्व और धरती के लिये उथल-पुथल भरे होंगे। इस उथल-पुथल में धरती करवट बदलेगी, महाद्वीपों के आकार-प्रकार में परिवर्तन होंगे। मानवीय अत्याचारों के कारण देश की सीमायें बदलेंगी, राजनीतिक परिदृष्य बदलेंगे। भारी क्षति के पश्चात् भारतीय उपमहाद्वीप एकता के सूत्र में बंधेगा। सत्यमेव जयते का आदर्श एक बार फिर अस्तित्व में आयेगा। किंतु इस बीच .........कितना पाप हो चुका होगा......।

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

भारत में नक्सलवाद की समस्या और उसका समाधान


    शोषण और भ्रष्टाचार में लिप्त हमारी पतित व्यवस्थाओं के विरोधस्वरूप उत्पन्न विद्रोहपूर्ण विचारधारा से प्रारम्भ होकर एक जन-आन्दोलन के रूप में विकसित होते हुये आतंक के पर्याय बने नक्सलवाद ने बंगाल से लेकर सम्पूर्ण भारत में आज अपने पैर पसार लिये हैं। इस लम्बी यात्रा के बीच इस विदोह के जनक कनु सान्याल ने विकृतावस्था को प्राप्त हुयी अपनी विचारधारा के हश्र से निराश होकर आत्महत्या भी कर ली। यह कटु सत्य है कि भ्रष्टव्यवस्था और पतित नैतिकमूल्यों के प्रतिकार से अस्तित्व में आये नक्सलवाद को आज भी वास्तविक पोषण हमारी व्यवस्था द्वारा ही मिल रहा है। व्यवस्था, जिसमें हम सबकी भागीदारी है ...सरकार की भी और समाज की भी। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि हमारी व्यवस्था की रुचि नक्सलवाद को समाप्त करने के स्थान पर उसे बनाये रखने में ही अधिक है। यही कारण है कि किसी भी स्तर पर जन असंतोष और बढ़ती विषमताओं पर अंकुश लगाने के लिये कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं।

    व्यवस्थायें आंकड़ों से चल रही हैं और आंकड़े कागज पर होते हैं, ज़ाहिर है कि हक़ीक़त भी ज़मीन पर नहीं कागज पर है। लूटमार के निर्लज्ज आखेट में हम सबने अपना-अपना नक्सलवाद विकसित कर लिया है। पूरे राष्ट्र की व्यवस्था में भ्रष्टाचार का वायरस एड्स का रूप ले चुका है। भ्रष्टाचार की खुली प्रतियोगिता में एक भृत्य से लेकर हमारा सम्पूर्ण नीतिनिर्धारक तंत्र और विधानसभा एवं संसद के माननीय महोदय तक सभी अपनी-अपनी सक्रिय भागीदारी पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। जब थैलियों के मुंह खुलते हैं तो बाकी सबके मुंह बन्द हो जाते हैं। थैलियों से सम्पन्न लोग अच्छी-खासी प्रतिभाओं को पीछे छोड़कर मेडिकल कॉलेज में दाख़िले से लेकर लोकसेवा आयोग की प्रतिष्ठापूर्ण प्रतियोगिताओं में भी अपना वर्चस्व बना लेते हैं ...वह भी सारी व्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुये। सड़कें बनती हैं तो पहली वर्षा में बह जाती हैं, भवन बनते हैं तो अधिग्रहण के पहले ही खण्डहर होने की सूचना देने लगते हैं। खनिज और वनसम्पदा से भरपूर बस्तर जैसे क्षेत्र सरकारी अधिकारियों और व्यापारियों की चारागाह बन चुके हैं। सम्पन्न बस्तर आज भी लंगोटी लगाये खड़ा है। आतंकपूर्ण नक्सलवाद पनपने के लिये इतने कारण पर्याप्त नहीं हैं क्या?

   बस्तर में नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है, कश्मीर में उग्रवादियों की ..., प्रदेशों में बाहुबलियों की और देश में अंतर्राष्ट्रीय माफ़ियाओं की समानांतर अंतर्सरकारें चल रही हैं। ये अंतर्सरकारें कबीलाई व्यवस्था का रूपांतरण हैं।

   अमेरिका कहीं भी आक्रमण करके अपनी सरकार चलाने लगता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में चीन द्वारा प्रायोजित आज के नक्सली जो भी कर रहे हैं उसे उन्होंने सामाजिक विद्रोह का छद्म नाम दिया है जबकि यह विद्रोह नहीं है अपितु स्पष्टतः सत्ता प्राप्ति के लिये किया जा रहा गुरिल्ला युद्ध है। सत्ता के मूल में हिंसा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। विश्व के सभी युद्धों का सत्य यही है। कहीं तो यह हिंसा दिखायी दे जाती है और कहीं पर नहीं। जहाँ दिखायी नहीं पड़ती वहाँ भी सत्ता के मूल में हिंसा ही है। केवल हत्या ही तो हिंसा नहीं है, कई रूप हैं उसके, हत्या से भी अधिक निर्मम और वीभत्स।

    नक्सलियों ने अब माओवाद का नक़ाब ओढ़ लिया है, उन्हें सत्ता चाहिए, वह भी हिंसा से। पर विचारणीय यह भी है कि लोकतंत्र का नक़ाब ओढ़कर देश में होने वाले चुनाव भी तो हिंसा से ही जीते जा रहे हैं। कहीं मतदान स्थल पर आक्रमण करके, कहीं मतदान दल को नज़रबन्द करके, कहीं मतदाता को डरा-धमका कर, तो कहीं उसे शराब और पैसे बाँटकर। भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को दिखावे के लिये टिकट नहीं दी जाती किंतु उनकी पत्नियों को टिकट देकर पति के अपराध का पुरस्कार प्रदान कर दिया जाता है। शातिर अपराधी पत्नियों की आड़ में राज चला रहे हैं। कोई सज्जन व्यक्ति आज सत्ता में क्यों नहीं आना चाहता, यह देश के समक्ष एक विराट प्रश्न है। नक्सलवाद केवल कुछ क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में फैल चुका है। किसी भी प्रकार की हिंसा करके या दूसरों के अधिकार के अपहरण से कुछ भी पाने का प्रयास करने वाला हर व्यक्ति मानसिक रूप से नक्सलीआतंकवादी है क्योंकि ऐसे ही लोग उग्रवाद के अघोषित जनक होते हैं।

   नक्सलियों से भी अधिक हिंसक और निर्मम तो हमारा तंत्र है जिसमें बैठा हर व्यक्ति जनता को जीने न देने की कसम खाये बैठा है। इस तंत्र द्वारा की गयी हिंसायें बहुआयामी होती हैं, प्राण भर नहीं जाते इसलिये दिखायी नहीं पड़तीं। निर्मम और अमानवीय शोषण की अनवरत श्रंखला पर चढ़कर वैभव एवं सत्ता पाने वाले भी तो हिंसा ही करते हैं। हमारे ही बीच का कोई साधारण सा या कोई ग़रीब किंतु तिकड़मी व्यक्ति चुनाव में अनाप-शनाप पैसा खर्च करके चुनाव जीतता है, जीतने के कुछ ही वर्षों बाद कई नगरों और महानगरों में फैली करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक बन जाता है। यह सर्वविदित होकर भी रहस्य ही बना रहता है कि उस ग़रीब के पास चुनाव में पानी की तरह बहाने के लिये इतना धन आख़िर आता कहाँ से है? जब उंगली उठती है तो निर्धन से अनायास ही सम्पन्न बना वह व्यक्ति चीखने-चिल्लाने लगता है कि सवर्णों को एक ग़रीब और दलित का सत्ता में आना बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। क्या यह ग़ुस्ताख़ी भी दोहरी हिंसा नहीं? निर्लज्जता की सारी सीमायें तो तब टूट जाती हैं जब वह करोड़पति-अरबपति बनने के बाद भी स्वयं को ग़रीब, दलित और आदिवासी ही घोषित करता रहता है।

   भारत में सभी समर्थों की केवल एक ही आति और एक ही धर्म है, इसे भी समझने की आवश्यकता है। यह एक ऐसा नक्सलवाद है जिससे होने वाली हिंसा से मृत्यु एक बारगी न होकर तिल-तिल कर अंतहीन दुःखों को सहते हुये होती है। पूरे देश में व्याप्त इन अत्याचारों का समुचित निदान किये बिना नक्सलवाद के उन्मूलन की कल्पना भी बेमानी है।

   श्रीलंका में गृहयुद्ध, म्यांमार में दमन चक्र, नेपाल में माओवादी हिंसा, भारत में नक्सलवाद एवं पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के पीछे भी केवल सत्ता की ही आदिम भूख ही छिपी हुयी है। मानव समाज विकास की किसी भी स्थिति में क्यों न रहा हो वह अपने प्रभुत्व और सत्ता के लिये हिंसायें करता रहा है। किंतु इस सबके बाद भी “सत्ता के लिये हिंसा” को किसी मान्य सिद्धांत का प्रशस्तिपत्र नहीं दिया जा सकता। सत्ताधारियों की अरक्त हिंसा ही नक्सलियों की रक्तहिंसा को जन्म देती है। हमारी राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक नीतियाँ इन्हें पोषण देती हैं। यदि हमारी व्यवस्थायें सबको जीने एवं विकास करने का समान अवसर प्रदान कर दें तो नक्सली या किसी भी उग्रवादी हिंसा को पोषण मिलना बन्द हो जायेगा और ये विचारधारायें दम तोड़ देंगी।

   सभ्यमानव समाज तो आत्मशासित होना चाहिये, जहाँ किसी शासन की आवश्यकता ही न हो। हो पायेगा ऐसा? सम्भवतः अभी तो नहीं। आरक्षण के बटते कटोरों, राजनीतिक भ्रष्टाचार, बौद्धिक विकास हेतु अनुर्वरक स्थितियाँ, सरकारी नौकरियों तथा पदोन्नतियों की खुलेआम निर्लज्ज ख़रीद-फ़रोख़्त, त्रुटिपूर्ण कृषिनीतियाँ, कुटीर उद्योगों की हत्या एवं असंतुलित आर्थिक उदारीकरण आदि ऐसे पोषक तत्व हैं जो नक्सलवाद को मरने नहीं देंगे, कम से कम अभी तो नहीं।

    तमाम सरकारी व्यवस्थाओं, भारी भरकम बजट, पुलिस और सेना के जवानों की मौत, रेल संचालन पर नक्सली नियंत्रण से उत्पन्न आर्थिक क्षति, स्थानीय बाज़ारों एवं आवागमन पर यदा-कदा लगने वाले नक्सली कर्फ़्यू से आम जनता को होने वाली अनेक प्रकार की क्षतियों और बड़े-बड़े रणनीतिकारों की मंहगी बैठकों के बाद भी नक्सली समस्या में निरंतर होती जा रही वृद्धि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

 भारत में नक्सलवाद के कारण :-

1-   अनधिकृत भौतिक महत्वाकांक्षाओं के अनियंत्रित ज्वार :- महत्वाकांक्षी होने में कोई दोष नहीं पर बिना श्रम के या कम से कम श्रम में अधिकतम लाभ लेने की प्रवृत्ति ही सारी विषमताओं का कारण है। सारा उद्योग जगत इसी विषमता की प्राणवायु से फलफूल रहा है। आर्थिक विषमता से उत्पन्न विपन्नता की पीड़ा वर्गसंघर्ष की जनक है।

2-   मौलिक अधिकारों के हनन पर नियंत्रण का अभाव :- अनियंत्रित महत्वाकाक्षाओं के ज्वार ने आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर डाका डालने की प्रवृत्ति में असीमित वृद्धि की है। नक्सलियों द्वारा जिस वर्गसंघर्ष की बात की जा रही है उसमें समर्थ और असमर्थ ही मुख्य घटक हैं, दलित या आदिवासी जैसे शब्द तो केवल भोले-भाले लोगों को बरगलाने के लिये हैं। समर्थ होने की होड़ में हर कोई शामिल है। मनुष्य की इस आदिम लोलुपता पर अंकुश लगाने के लिये वर्तमान में हमारे पास कोई वैधानिक उपाय नहीं है। मौलिक अधिकारों के हनन में नक्सलवादी भी अब पीछे नहीं रहे, शायद इसी कारण कनु सान्याल को आत्महत्या करनी पड़ी।

3-   शोषण की पराकाष्ठायें :- सामान्यतः आम मनुष्य सहनशील प्रवृत्ति का होता है, वह हिंसक तभी होता है जब शोषण की सारी सीमायें पार हो चुकी होती हैं। नक्सलियों के लिये शोषण की पराकाष्ठायें पोषण का काम करती हैं। शोषितों को एकजुट करने और व्यवस्था के विरुद्ध हिंसक विद्रोह करने के लिये अपने समर्थक बनाना नक्सलियों के लिये बहुत आसान हो जाता है।

4-   सामाजिक विषमता :- सामाजिक विषमता ही वर्गसंघर्ष की जननी है। आज़ादी के बाद भी इस विषमता में कोई कमी नहीं आयी। नक्सलियों के लिये यह एक बड़ा मानसिक हथियार है।

5-   जनहित की योजनाओं की मृगमरीचिका :- शासन की जनहित के लिए बनने वाली योजनाओं के निर्माण एवं उनके क्रियान्वयन में गंभीरता, निष्ठा व पारदर्शिता का अभाव रहता है जिससे वंचितों को भड़काने और नक्सलियों की नयी पौध तैयार करने के लिये इन माओवादियों को अच्छ बहाना मिल जाता है।

6-   राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव :- आमजनता को अब यह समझ में आने लगा है कि सत्ताधीशों में न तो सामाजिक विषमतायें समाप्त करने, न भ्रष्टाचार को प्रश्रय देना बन्द करने और न ही नक्सली समस्या के उन्मूलन के प्रति लेश भी राजनीतिक इच्छाशक्ति है। आर्थिक घोटालों के ज्वार ने नक्सलियों को देश में कुछ भी करने की मानसिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी है।

7-   लचीली कानून व्यवस्था, विलम्बित न्याय एवं कड़े कानून का अभाव :- अपराधियों के प्रति कड़े कानून के अभाव, विलम्ब से प्राप्त होने वाले न्याय से उत्पन्न जनअसंतोष एवं हमारी लचीली कानून व्यवस्था ने नक्सलियों के हौसले बुलन्द किये हैं।

8-   आजीविकापरक शिक्षा का अभाव एवं महंगी शिक्षा :- रोजगारोन्मुखी शिक्षा के अभाव, उद्योग में परिवर्तित होती जा रही शिक्षा के कारण आमजनता के लिये महंगी और दुर्लभ हुयी शिक्षा, अनियंत्रित मशीनीकरण और कुटीर उद्योंगो के अभाव में आजीविका के दुर्लभ होते जा रहे साधनों से नक्सली बनने की प्रेरणा इस समस्या का एक बड़ा नया कारण है।

9-   स्थानीय लोगों में प्रतिकार की असमर्थता :- निर्धनता, शैक्षणिक पिछड़ेपन, राष्ट्रीयभावना के अभाव, नैतिक उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता और पुलिस संरक्षण के अभाव में स्थानीय लोग नक्सली हिंसाओं का सशक्त विरोध नहीं कर पाते जिसके कारण नक्सली और भी निरंकुश होते जा रहे हैं।

10- पर्वतीय दुर्गमता का भौगोलिक संरक्षण :- देश के जिन भी राज्यों में भौगोलिक दुर्गमता के कारण आवागमन के साधन विकसित नहीं हो सके वहाँ की स्थिति का लाभ उठाते हुये नक्सलियों ने अपना आतंक स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है और अब वे इस अनुकूलन को बनाये रखने के लिये आवागमन के साधनों के विकास में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। यद्यपि, अब तो उनका बौद्धिक तंत्र नगरों और महानगरों में भी अपनी पैठ बना चुका है।

11- पड़ोसी देशों के उग्रवाद को भारत में प्रवेश की सुगमता :- विदेशों से आयातित उग्रविचारधारा को भारत में प्रवेश करने से रोकने के लिये सरकार के पास राजनैतिक और कूटनीतिक उपायों का अभाव है जिसके कारण विचार और हथियार दोनो ही भारत में सुगमता से प्रवेश पाने में सफल रहते हैं।                                    

 नक्सलवाद की समस्या का समाधान :-

जन असंतोष के कारणों पर नियंत्रण और विकास के समान अवसरों की उपलब्धता की सुनिश्चितता के साथ-साथ कड़ी दण्ड प्रक्रिया नक्सली समस्या के उन्मूलन का मूल है। अधोलिखित उपायों पर ईमानदारी से किये गये प्रयास नक्सलवाद की समस्या के स्थायी उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

ü नक्सली समस्या के उन्मूलन के प्रति दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का विकास – क्योंकि बिना दृढ़ संकल्प के किसी भी उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।

ü आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के उपायों से विकास के समान अवसरों की उपलब्धता की सुनिश्चितता।

ü शासकीय योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन एवं उनमें पारदर्शिता की सुनिश्चितता – जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।

ü समुचित एवं सहयोगपूर्ण कानून व्यवस्था- जिससे स्थानीय लोग नक्सलवादियों का प्रतिकार कर सकें और उन्हें जीवनोपयोगी आवश्यक चीजें उपलब्ध न कराने के लिये साहस जुटा सकें।

ü कानून व न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल – जिससे लोगों को सहज और समय पर न्याय मिलने की सुनिश्चितता हो सके।

ü आजीविकापरक एवं सर्वोपलब्ध शिक्षा की व्यवस्था – जिससे सामाजिक विषमताओं पर अंकुश लग सके।

ü कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने के समुचित प्रयास – जिससे वर्गभेद की सीमायें नियंत्रित की जा सकें।

ü राष्ट्र के विकास की मुख्यधारा में नक्सलियों को लाने और उनके पुनर्व्यवस्थापन के लिये रोजगारपरक विशेष पैकेज की व्यवस्था।

ü चीन और पाकिस्तान से नक्सलियों को प्राप्त होने वाले हर प्रकार के सहयोग को रोकने के लिये दृढ़ राजनीतिक और सफल कूटनीतिक उपायों पर गम्भीरतापूर्वक चिंतन और तद्विषयक प्रयासों का वास्तविक क्रियान्वयन।   

बुधवार, 30 जनवरी 2013

“भारत में बलात्कार की जाति भी है और धर्म भी” –के.आर.शाह।


यौनदुष्कर्म की निरंतर हो रही घटनाओं से पूरा देश आन्दोलित है। विचारक और चिंतक समस्या और समाधान की दिशा में अपने-अपने दृष्टिकोण से मंथन कर रहे हैं।
रायपुर से प्रकाशित होने वाली भारत की नम्बर -1 सामाजिक समाचार पत्रिका “आदिवासी सत्ता” के जनवरी 2013 के सम्पादकीय में विद्वान सम्पादक ने भारत में बलात्कार की जाति और धर्म के बारे में लिखते हुये बताया है कि –
“ ...धर्म मानव समाज के आचरण में निहित है। जैसा धर्म वैसा आचरण। ...भारतीय जनजातीय समाज में स्त्री, कल भी पुरुष की सम्पत्ति नहीं थी और आज भी नहीं है। अनार्य भारत से आर्य भारत होने के बाद हमारे देश की स्त्रियाँ सदा-सदा के लिये मर्दों की सम्पत्ति बना दी गयीं अर्थात् इसे “धर्म सम्मत” बना दिया गया। वेदों से लेकर मनुस्मृति तक सारे धर्मशास्त्रों में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में नारी को पुरुष की सम्पत्ति वर्णित किया गया है। श्रृष्टि के रचयिता परब्रह्म ब्रह्मा का अपनी ही पुत्री सरस्वती से किया गया बलात् संग एक चर्चित कथा सर्वविदित है। जो धर्म स्त्री को देवी भी मानता है और उपयोग की वस्तु भी कहता है, ऐसे धर्मावलम्बी देश में कानून के डण्डे से वहाँ निवासरत् लोगों के आचरण को कैसे परिवर्तित किया जा सकता है? .... बलात्कार का ना तो रूप-रंग होता है ना ही कोई चेहरा। लेकिन भारत में बलात्कार की जाति भी होती है और धर्म भी, क्योंकि इसे धार्मिक संरक्षण मिला हुआ है। जो समाज दो हजार सालों से भी अधिक समय से जिस आचार संहिता से बंधा रहकर जीवन यापन करता है, वही उसके आचरण में दृष्टिगोचर होता है। मनुस्मृति को पढ़ लेने से प्रत्येक भारतीय को भारतीय आचरण का मायाजाल समझ में आ जायेगा। इसलिये हम कहते हैं कि वर्तमान दुनिया में भारत इकलौता देश है जहाँ बलात्कार की जाति भी है और धर्म भी"।
सम्पादक जी के अनुसार- "आज भारत में जितना भी साहित्य उपलब्ध है वह सारा का सारा ब्राह्मण साहित्य है जिसे हम वैदिक, देव या आर्य साहित्य कहते, पढ़ते और मानते हैं। आर्य साहित्य व  दर्शन की मुख्य विषयवस्तु राजा, धर्म, जाति, कुल या फिर युद्ध (छल-कपट), सौन्दर्य, विलासिता और स्त्री पर केन्द्रित है। आर्य साहित्य में राजनीति और कूटनीति की आत्मा धर्मप्रधान होकर धर्मसत्ता तक सीमित है। यह प्रमाणित हो चुका है कि भारत मूलतः मूलनिवासियों अनार्यों का भारत था और है। समस्या इतनी सी है कि मूलनिवासियों का साहित्य नष्ट कर दिया गया”। 
सम्पादक जी ने जिस मनुस्मृति की बात की है उसी मनुस्मृति में लिखा गया है –“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता” एवं “जामियो यानि गेहानि शपंतय प्रतिपूजिता, तानिकृत्या हतानीव विनष्यंति समंततः”। मुझे नहीं पता शाह जी की दृष्टि में इन श्लोकों का अर्थ क्या है?
भारतीय समाज को विखण्डित करने के अनेक प्रयासों में से एक प्रयास भारतीय वैदिक वांग्मय की कूट व्याख्या करना भी है। तत्वज्ञानी इस कूटरचना की उपेक्षा कर सकते हैं किंतु बात इतने से समाप्त नहीं हो जाती। बारम्बार किया गया मिथ्या व्याख्यान अपना कूट प्रभाव डालता है। “आदिवासी सत्ता” नामक पत्रिका के पाठक पूरे देश में हैं, इन पाठकों का अपना एक वर्ग है जिसमें उच्च शिक्षितों से लेकर अपनी पीढ़ी में प्रथम बार शिक्षित लोग भी हैं। इन पाठकों के लिये यह पत्रिका अंतिम सत्य की तरह पूज्य है।
ऐसे वैचारिक कूटाचरण के विरुद्ध सत्य प्रतिपादित करने और प्रचारित करने की आवश्यकता है अन्यथा भारतीय समाज के विखण्डन को रोका नहीं जा सकेगा।             

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

विधान ये सड़ा-गला।



धूप के गाँव से 

छाँव माँगने चला 

नर पिशाच हैं खड़े

मैं वेद बांचने चला|

चून के ढेर से 

रेत बीनने चला

सिंह की माद से 

शिकार छीनने चला| 

पाखण्ड है प्रचण्ड 

खण्ड-खण्ड है मनुष्यता 

उठी हुयी खड्ग से 

प्राण माँगने चला| 

"असतो मा सद्गमय"

पोथियों में था पढ़ा 

पापियों से न्याय 

का पहाड़ माँगने चला| 

ज़ख्म कौन दे रहा 

इससे दर्द को है क्या 

क्रूरता से उम्र का 

नाता है क्या भला! 

मर रही है दामिनी 

रोज ही ज़रा-ज़रा 

कैसा है विधान 

दुष्ट भी सुधारगृह चला| 

ज़ख्म रोज़ दे रहा 

न्याय-न्याय रट रहा 

लो, सुधर के फिर नया 

शिकार ढूँढने चला| 

कब नकारती हैं दर्द

उम्र की ये बेड़ियाँ 

क्या जाने दर्द 'दर्द' का 

विधान ये सड़ा-गला|  


शनिवार, 26 जनवरी 2013

गणतंत्रदिवस के कुछ पल ...

 
 

 

 

 

 

बस्तर के हृदय जगदलपुर का लाल बाग.....पूरे बाग की मिट्टी लाल है। यह लालिमा यहाँ की मिट्टी में मिले लौह अयस्क के कारण है। यह लालिमा यहाँ के गिरिवासी-वनवासी देशभक्तों के रक्त के कारण भी है जिन्होंने तीर-धनुष और टंगिया ( छोटी कुल्हाड़ी) से ही नाकों चने बीनने को विवश कर दिया था अंग्रेज़ी सेनाओं को। सच्चे वीरों की इस भूमि को कोटि-कोटि नमन !

   गणतंत्र दिवस, पौष शुक्ल,14, विक्रम संवत् 2069

लाल बाग का एक विहंगम दृष्य

विद्यार्थियों का उत्साह तो देखते ही बनता है।

 

 

बस्तर की गिरि-वनवासी समुदायों की वेशभूषा में आये कलाकार

 
 
अपना जज़्बा ...अपनी अभिव्यक्ति ...
 

बीते वर्षों में हमारे ही कुछ बन्धु बन गये हमारे शत्रु। नक्सली आतंकवाद में जल रहा है बस्तर। सुरक्षा में चारो ओर मुस्तैद हैं हमारे जांबाज़ देशभक्त।

 
 आते जा रहे हैं लोग ....बढ़ती जा रही है भीड़
 
 
कलाकारों का एक दल
 
 
...शाला से आये बाल कलाकारों का एक और दल
 
....
 
अपनी प्रस्तुति के लिये तैयार पारम्परिक वेशभूषा में आये ग्रामवासियों का एक दल ...
 
 
घुंघरुओं की कलात्मक पट्टी
 
 
हम हैं हिन्दुस्तानी ...
 
 
एक वनवासी श्रमिक महिला कृषि उपकरणों के प्रतीकों के साथ
 
 
अपने महापुरुषों की स्मृति में .....उनके जैसा बनने की दिशा में  ...अपने गुरुओं की छत्रछाया में कुछ विशिष्ट बनने का ...कुछ विशिष्ट करने का प्रयास।
 
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 ग्राम्य जीवन का एक दृष्य़ ...

 
 
...और लीजिये, सज गयी झाँकी।
 

अरे! सच्ची-मुच्ची के नहीं ... हम तो स्वांग कर रहे हैं नक्सली का।

मगर वनवासी सचमुच में कब डरे हैं मरने से। मृत्यु तो उत्सव है यहाँ, तभी तो भूमकाल जैसे आन्दोलन हो पाये यहाँ की धरती पर। क्रांतिकारी गुण्डाधुर और गेंदसिंह के किस्से याद हैं न आपको!

 
 
लीजिये, प्रारम्भ हो गया कार्यक्रम ...
 
 
चारो ओर लोग ही लोग, अपनी नन्हीं सी ज़िन्दगी में पहली बार देख रही हूँ इतनी भीड़। समझ में नहीं आता क्या देखूँ और क्या छोड़ूँ ....
 
 

पण्डाल में भीड़ ..पण्डाल के बाहर भीड़ ...सड़क पर भी भीड़ ...क्या सचमुच लोगों में इतना उत्साह है अपने गणतंत्र पर्व के लिये? ख़ुशफ़हमी ही सही, चलो मान लेते हैं कि इस विचित्र देश की धरती पर सब कुछ सम्भव है। ऐसे कार्यक्रम मुझे प्रायः भावुक कर दिया करते हैं। जो भी है जैसा भी है मेरा देश मेरा है। ...कई बार तो मुझे लगता है कि देश अभी लोकतंत्र की प्रसवपीड़ा से गुजर रहा है ....परिणाम् सुखद ही होगा, जब पूरा विश्व देखेगा कि इतनी विविधताओं के बाद भी हम सबसे न्यारे हैं और आगे बढ़ रहे हैं ...

उत्सव समाप्त । चलो, अब घर चलें ......

काश! यह उत्सव जीवन के हर पल में हो।

 

 

 

 

 

 

 


 

 



बुधवार, 23 जनवरी 2013

हिड़िमा रानी


   अठारहवीं शताब्दी के अंत में बस्तर की पराधीनता के जो बीज ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने तैयार किये थे वे उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम कुछ दशकों में नागपुर में बोये गये। इन बीजों का अंकुरण शीघ्र ही होने लगा जिससे तैयार हुयी कंटीली झाड़ियों ने बस्तर के बृहद् भूभाग को कंटकाकीर्ण कर दिया।
    नागपुर के भोसले राजाओं ने जिस तरह से बस्तर को थाली में रखकर कम्पनी बहादुर के सामने परोस दिया था उससे भोमदेव को देवहुती की चिंता होनी स्वाभाविक थी। उसे किसी भी बहाने से अपदस्थ किया जा सकता था या फिर किसी भी मिथ्या अपराध के आरोप में बन्दी। काकतीय महाराजा की गोंड रानी की संतान के रूप में जन्मे थे दोनो, कहने को राजवंशी किंतु अधिकार न के बराबर। अपनी मृत्यु से ठीक पहले महाराजा ने भोमदेव को अपने राज्य के एक वनक्षेत्र का पंचकोसी राजा बना दिया था। काकतीय वंश की गोंड गिरिवासी शाखा महाराजा के प्रति कृतज्ञ हुयी।
    गोंड माता की संतान भोमदेव के रक्त में काकतीय वंश का राजरक्त भी मिला हुआ था, इसलिये उसकी महत्वाकांक्षा थी कि एकलौती बहन देवहुती का विवाह किसी तरह किसी राजवंश में हो जाय। भोमदेव ने उत्तर-पूर्व के कलचुरी वंश के राजघरानों से बात की किंतु जब सफलता नहीं मिली तो उसने उड़ीसा के राजघरानों से सम्पर्क करना प्रारम्भ किया।
     हाल ही में नरबलि के काल्पनिक आरोप के बहाने कम्पनी बहादुर ने भोसलों पर अपने प्रभाव का दुरुपयोग करते हुये बस्तर में अरब सैनिकों को नियुक्त करवा दिया था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भारत के देशी राजाओं पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था, राजा-महाराजा नाम मात्र के राजा-महाराजा रह गये थे। उनकी राजसभाओं में नियुक्त किये गये अंग्रेज अधिकारियों के हाथों ही देशी राजाओं के आपसी स्वार्थों ने सत्ता के सूत्र थमा दिये थे। स्थानीय स्त्रियाँ अरब सैनिकों और अंग्रेजों की पाशविक यौनलिप्सा की शिकार होने के लिये बाध्य थीं, कठपुतली राजा अपनी प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ थे। राजा कराधान के साधन के रूप में अंग्रेजों का हित साध रहे थे, और कर देने वाले गिरिवासी अरब सैनिकों, मराठों और अंग्रेजों के पाशविक अत्याचारों से जूझ रहे थे। मुस्लिम सैनिकों के लिये स्त्रियाँ लूट की सामग्री से अधिक और कुछ नहीं हुआ करतीं थीं। महाराजा की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकारियों के पारस्परिक संघर्ष का लाभ उठाते हुये अरब सैनिकों ने सर्वप्रथम राजमहल की गोण्ड रानियों को बलात उठाना प्रारम्भ कर दिया। राजमहल के किसी अधिकारी को इन निरीह रानियों की लेश भी चिंता नहीं थी। महाराजा के जीवनकाल में भी उन्हें यथोचित सम्मान के योग्य नहीं माना जाता था। पटरानियों के रहने की व्यवस्था पूरी तरह से पृथक हुआ करती थी। गोण्ड रानियों के लिये महल के जिन भागों में व्यवस्था की जाती थी वहाँ पटरानियाँ कभी झाँकने भी नहीं जाती थीं। गोण्ड रानियाँ अपना भोजन भी स्वयं ही पकाती थीं और राजा के दिये अपने बच्चों के साथ राज्य का एक भाग बनी रहती थीं।
     जिस समय अरब सैनिक राजमहल में लूट-मार कर रहे थे, दिवंगत् महाराजा के राजपुत्र उत्तराधिकार के लिये संघर्ष में जूझ रहे थे। उधर, पंचकोसी राजा भोमदेव अपने गाँव में अंग्रेजों के विरुद्ध जनाक्रोश को हवा देने के कार्य में व्यस्त था। इधर, पटरानियों के महल की सुरक्षा बढ़ा दी गयी थी। रानियों के महल की ओर कोई भी नहीं था, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। वनवासी जनता को महत्व देने के उद्देश्य से गिरि-वन प्रांतर के प्रमुखों की लड़कियों को रानी बनाकर महल में रखना राज्य की एक नीति थी, और हिड़िमा रानी थी उसी नीति का एक अंश।
    सैनिकों का एक दल रानीमहल में निर्विरोध प्रवेश कर गया। महल में स्त्रियों के चीखने और रोने की आवाजें सुनायी देने लगीं, किंतु उनकी चीख-पुकार सुनने वाले महाराजा उनसे दूर जा चुके थे, जो पास थे उन्हें यह चीख-पुकार सुनने की न तो कोई आवश्यकता थी और न इसका समय।
   अरब सैनिक अपने साथ जिन तेरह स्त्रियों को उठा कर ले गये उनमें दिवंगत् महाराजा की सभी नौ रानियाँ और उनकी चार किशोर वय बेटियाँ थीं। हिड़िमा रानी उनमें से एक थी। सौभाग्य से हिड़िमा की युवा सुन्दर बेटी देवहुती किसी तरह सैनिकों की दृष्टि में न पड़ने के कारण लूट की सामग्री बनने से बच गयी।
   भोमदेव को जबतक समाचार मिला और वे राजमहल पहुँचे तबतक सब कुछ समाप्त हो चुका था। उसके सौतेले भाइयों ने महल में उससे मिलना भी उचित नहीं समझा। अपनी माँ के बलात् अपहरण से दुःखी भोमदेव मन में अरबों के प्रति क्रोध और अंग्रजों के प्रति घृणा लेकर बहुत दिन तक जंगल में भटकते रहने के बाद वापस चला गया।
    बस्तर पर अप्रत्यक्ष रूप से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन और भी सुदृढ़ हो चुका था। अरब सैनिक नरबलि के मिथ्या प्रमाण एकत्र करते जा रहे थे जो अंग्रेजी शासन के लिये अकाट्य प्रमाण होने वाले थे। वनवासियों में अंग्रेजों और अरबों के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना बढ़ती जा रही थी।
    भोमदेव ने कोटपाड़ राजघराने के एक राजवंशी से अपनी बहन का विवाह तय करने में सफलता पा ली। विवाह का शुभमुहूर्त उड़ीसा के एक पुरोहित ने निकाल कर भोमदेव को बताया। भोमदेव ने तिथि निर्धारित कर दी। विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गयीं।
    देवहुती किसी कल्पना लोक में खोयी-खोयी रहने लगी। किंतु जैसे-जैसे विवाह की तिथि समीप आती जाती देवहुती को माँ की स्मृति और भी विकल करने लगी।
    विवाह के ठीक दो दिन पूर्व गाँव में मुस्लिम सैनिकों ने आक्रमण किया। यह आक्रमण नरबलि के काल्पनिक अपराधियों को ढूँढने के अभियान का एक भाग था जिसे नागपुर के भोसले राजा के दरबार में उनके अंग्रेज आकाओं द्वारा तैयार किया गया था। पंचकोसी राजा भोमदेव मुस्लिम सैनिकों की क्रूर हिंसा की भेंट चढ़ा तो बहन देवहुती सैनिकों की भोगलिप्सा की।

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     तीन वर्ष पश्चात् नागपुर की सैनिक छावनी में एक महिला सैनिकों के लिये भोजन बनाने का उपक्रम कर रही थी। मुसलमान सैनिक किसी युद्ध भूमि से विजय प्राप्त कर वापस आये थे जिसके कारण पूरी छावनी में उत्सव का वातावरण था। मसालों और मांस की संयुक्त गन्ध व्याप्त हो कर सैनिकों को व्याकुल कर रही थी। एक सेवक ने आकर महिला को छावनीप्रमुख का आदेश कह सुनाया – “उन शिविरों की बायीं ओर सबसे बड़े वाले शिविर में दो लोगों के लिये भोजन लेकर जाना है।”
    स्त्री ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह प्रायः मौन ही रहती थी। उसने दो थालियों में भोजन लगाया और निर्दिष्ट दिशा में लेकर चल पड़ी। शिविर के पास पहुँचते ही एक सैनिक ने पट हटाकर मार्ग दिया, स्त्री ने भीतर प्रवेश किया। भीतर शिविर प्रमुख के साथ एक अन्य सैन्य पदाधिकारी भी था। स्त्री भोजन रखकर नियमानुसार एक ओर सिर झुकाकर खड़ी हो गयी। सैन्यशिविर का यह नियम उसे राहत देता था। भयानक चेहरे वाले बलात्कारी सैनिकों का चेहरा भला कौन स्त्री देखना चाहेगी!
    प्रमुख ने उसे अपमानजनक तरीके से अपने पास बुलाया। सैन्यक्रूरता की अभ्यस्त हो चुकी डरी-सहमी स्त्री को समीप जाना पड़ा। प्रमुख ने एक झटके से स्त्री को अपने पलंग पर पटक दिया। दोनो सैन्य अधिकारियों के क्रूर ठहाके देर तक वातावरण में भय का संचार करते रहे। एक ने कहा- “आपने कुछ नया पेश करने का वायदा किया था ....”
    दूसरे ने एक आह भरी- “हम माफ़ी चाहते हैं, वह अभी फ़िरंगियों की ख़िदमत में है। मौका मिलते ही आपकी भी ख़िदमत में पेश की जायेगी, हम अपने वायदे से मुकरने वाले नहीं। वल्लाह क्या चीज़ है ....आप देखेंगे तो दिल ख़ुश जायेगा।”
    स्त्री अपने वस्त्र ठीक करने लगी। सैन्य अधिकारी ने कहा – “जाइये रानी साहिबा, आज की ख़िदमत पूरी हुयी।”
    उत्सव कई दिन तक चला। सैनिक छावनी मनुष्यता को तार-तार करती उत्सव मनाती रही। लगभग दो माह पश्चात् एक बार फिर मुस्लिम सैन्य अधिकारी के शिविर में उत्सव का वातावरण बना। फ़िरंगियों की उच्छिष्ट होकर एक युवती लायी गयी थी। इस उच्छिष्ट पर अब मुस्लिम सैनिकों का अधिकार था। उम्र और सुन्दरता की कोटि के आधार पर भोग के अधिकार की पात्रता तय होती थी। इस बार अधिकारियों की संख्या चार थी। लड़की के शरीर को चार हिंस्र पशु रात भर चबाते रहे।
    दिन ऊपर चढ़ आया था, सैन्य अधिकारी अपनी-अपनी दिनचर्या में लग गये। लड़की शिविर के एक कोने में पड़ी कराहती रही। काकतीय राजघराने की गोण्ड रानी शिविर की सेविका थी। उसे लड़की को खाना खिलाने का आदेश दिया गया था। जब वह भोजन की थाली लेकर शिविर में पहुँची तब तक लड़की मूर्छित हो चुकी थी। गोण्ड रानी हिड़िमा की दृष्टि जैसे ही लड़की पर पड़ी चीखकर वह भी मूर्छित हो गिर पड़ी। भोजन की थाली गिरने की झनझनाहट को सुन शिविर का भृत्य सैनिक दौड़ कर भीतर आया।
     सैनिक के प्रयास से जब दोनो की मूर्छा टूटी तो हिड़िमा और भी पाषाण हो चुकी थी। लड़की की हिचकियाँ बंध चुकी थीं। अचानक स्त्री ने सैनिक की कटार छीनी और लड़की पर पूरी शक्ति से वार कर दिया। हड़बड़ाया सैनिक जब तक कुछ समझ पाता, हिड़िमा ने दूसरे, तीसरे और चौथे वार से अपनी इहलीला समाप्त कर ली। मरते समय हिड़िमा रानी ने देवहुती का सिर अपनी बाँह से लपेट लिया था मानो अपनी सारी ममता लुटा देना चाहती हो। 
     माँ-बेटी दोनो के चेहरों पर अब किसी विषाद की कोई छाया नहीं थी, वे सारे दुःखों से मुक्त हो चुकी थीं। इस बीच मुस्लिम सैनिक मृत देहों को ठिकाने लगाने के उपक्रम में बैलगाड़ी ले आये। मिट्टी को बैलगाड़ी में पटक दिया गया। गाड़ी खीचने से पहले बैलों ने अपने सिर को झटके से हिलाया जिससे उनकी आँखों में आये आँसू बह जायें और वे मार्ग को ठीक से देख सकें।