रविवार, 1 मार्च 2026

सेक्युलर बाम्हन विरुद्ध ब्राह्मण

ब्राह्मण कोई जाति नहीं, एक अर्जित स्थिति है जिसे बनाये रखने के लिए निरंतर कर्मयोग की आवश्यकता होती है, अन्यथा "अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा" नियमों की तरह अनिवार्यअनुबंध का उल्लंघन होते ही कारण बताओ पत्र से लेकर सेवामुक्ति तक कुछ भी हो सकता है। कर्मयोग की निरंतरता एक अट (अनुबंध) है जिसका क्षरण होते ही पदच्युति अनिवार्य है। इस दृष्टि से कोई व्यक्ति सदा ब्राह्मण नहीं रह सकता। दुर्भाग्य से ब्राह्मणोचित आचरण में निरंतर परिमार्जन के अभाव में हर ब्राह्मण उपाधिधारी व्यक्ति ब्राह्मण हो ही नहीं सकता।

राजनीतिक क्षेत्र में तीव्रता से परिवर्तित हो रही स्थितियों में "ब्राह्मण" की तरह ही "नेता" को भी नये सिरे से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।
जाति और धर्म से परे "नेता" ने मनुष्य कुल की एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में स्वयं को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। यह पारंपरिक पहचान से पृथक है जिसकी निष्ठा न तो समाज के प्रति होती है और न देश, मानवीय मूल्य, नैसर्गिक सिद्धांत, न्याय या किसी भी शास्त्रसम्मत विधि-विधान के प्रति। यह एक ऐसी प्रजाति है जिससे भयभीत रहने वाले विद्वानों और वैज्ञानिकों को तो छोड़िये, ऋषि, महर्षि, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सभी प्राणी "नेता" के प्रत्यक्ष होते ही उसे झुककर "पायलागन" करते हैं पर उसके जाते ही गालियों की ऐसी वर्षा करते हैं मानो मुनसियारी में बादल फट गया हो।

यूजीसी रेगुलेशन के साथ सवर्ण विरोधी विभिन्न हुंकारों और नये आदेश के संदर्भ में एक जिज्ञासा...
पहले आदेश पढ़ लें -
"हर संस्था श्रेष्ठता को अपना संस्कार बनाये।" -मोदी

...और अब जिज्ञासा -
"श्रेष्ठता का अवमूल्यन और निकृष्टता का मूल्यांकन ही जब जातीय अधिकार का विधान बना दिया जाय तब "संस्कार" जैसे तत्व की आवश्यकता और प्रासंगिकता को किस दृष्टि से समझा जाना चाहिए ?"