शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

भारत की नयीपीढ़ी और नयीपीढ़ी का भारत

         अफ़्रीका के एक मित्र ने मुझसे जानना चाहा कि “नयी पीढ़ी का भारत कैसा है?” मुझे लगा कि पूरी ईमानदारी से उत्तर देने के लिये मुझे नेताओं और उच्चाधिकारियों की चर्चित और विवादास्पद गलियों से दूर आम जनता की भीड़ में घुसकर आधुनिक भारत को देखने का प्रयास करना चाहिये ।

वे विद्यालयीन परीक्षाओं के दिन थे, बिहार में परीक्षा में नकल कराते हुये रिश्तेदारों और मित्रों की भीड़ के बीच से मैंने नयी पीढ़ी के भारत को झाँक कर देखने का प्रयास किया था । कुछ प्रांतों में मुक्त-विद्यालय से हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षायें पूर्ण मुक्त वातावरण में देने की सुविधा भी उपलब्ध है । बाद में मुझे पता लगा कि नकल करके छप्परफाड़ नम्बर लाने वाले कई लोगों को बाद में सरकारी नौकरियों के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था । मुझे अचानक ही उन कर्मचारियों की याद आने लगी जो ऑपरेशन के बाद सर्जिकल इंस्ट्र्यूमेंण्ट्स को पानी में भिगाकर फिर से बिना साफ किये हुये ही स्टरलाइज़र में डाल दिया करते हैं और समझाने के बाद भी कोई बात मानने के लिये कभी तैयार नहीं होते ।

मैंने देखा सरकारी अस्पताल के युवा चिकित्सक ने एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को एक मोटी रकम के बदले एक झूठा मेडिकल सर्टीफ़िकेट बना कर दे दिया, दोनों हर्षित हुये । भ्रष्टाचारिक सहजीविता (सिम्बियॉसिस) के इस सुस्थापित व्यवहारवाद में आदर्शवाद न जाने कब का समाधिस्थ हो चुका था ।

मैंने देखा, दूध और घी बेचने वाले शोषित-दुःखी और गरीब आदमी ने दूध में दरिया का पानी मिला दिया है और मृत पशुओं की हड्डियों को उबालकर निकाली गयी मज्जा से निर्मित तरल में घी का एसेंस मिला दिया है जिससे नकली घी में असली घी की तरह ख़ुश्बू आने लगी है ।

मैं भारत के अंतिम आदमी को भी देखना चाहता था इसलिये वंचित, दुःखी और शोषित माने जाने वाले ग़रीबों की झुग्गियों की ओर गया, जहाँ कुल दो सौ नब्बे परिवारों के बीच चार सौ ग्यारह राशन कॉर्ड बनाये गये थे । ग़रीबों के लिये सरकार की ओर से फ़्री बिजली होने के कारण बल्व दिन-रात जलते रहते थे और टेबल फ़ैन का उपयोग वारिश के दिनों में कपड़े सुखाने के लिये किया जाता था । फ़्री में मिलने वाली सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग से उत्पन्न सुख ने निर्धनता की पीड़ा को बहुत कुछ कम कर दिया था । मैंने वहाँ मितव्ययता को तलाशने की कोशिश की जो मुझे वहाँ कहीं नहीं मिली, मुझे आगे बढ़ना पड़ा ।

अमीबा एक ऐसा प्राणी है जिसके शरीर में कहीं भी कूटपाद (धोखा देने वाले पैर) उत्पन्न होते हैं और अमीबा को एक गति देकर अगले ही क्षण विलुप्त हो जाते हैं । कूटपाद उत्पन्न और विलुप्त होते रहते हैं ...अमीबा आगे की ओर बढ़ता रहता है । पैर झूठे होते हैं किंतु गति वास्तविक होती है । यह अद्भुत है किंतु विश्व के अधिकांश देशों की यही दुष्ट और छल नीति है जो राजनीति के नाम से व्यवहृत होती है ।  

जहाँ ग़रीबी, वंचना, शोषण और दुःख जैसे शब्द दुष्टनीति के लिये अमीबा के कूटपाद की तरह व्यवहृत किये जाने लगे हों और वास्तव में जहाँ हर मछली अपने सामने पड़ गयी हर मछली के शिकार पर आमादा हो वहाँ मुझे नयी पीढ़ी के भारत को तलाशने का काम बड़ा दुस्साहसिक लगने लगा है ।   

भारत की नयी पीढ़ी भारत के बारे में क्या सोचती है, और वह स्वयं को भारत के लिये कहाँ पर खड़ा पाती है ?

मुम्बई के राकेश दुबे जी ने अपने एक मित्र को सूचना दी कि भारत की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुये विदेश प्रवासिनी उनकी बेटी ने उनसे भारत छोड़ देने का अनुरोध किया है ।

“बिगड़ती स्थितियाँ” -इस पर दीर्घ चर्चा हो सकती है । बिगड़ती महँगाई, बिगड़ती सामाजिक समरसता, बिगड़ते पैमाने, बिगड़ती आज़ादी, बिगड़ते लोग और बिगड़ती सीमायें ...।

भोपाल से भाई अशोक चतुर्वेदी जी कहते हैं – “महँगाई बढ़्ती जा रही है और लोगों का जीवनयापन मुश्किल होता जा रहा है । रोटी, कपड़ा, मकान और नागरिक सम्मान जैसी चीजें दुर्लभ होती जा रही हैं । सरकार और जनसामान्य के बीच का सम्वाद कठिन होता जा रहा है । सम्वाद से सरकार और नागरिकों के बीच सरोकार बनता है जो किसी देश को रहने के योग्य बनाता है । समाज के बीच भी सहज भरोसे का सम्वाद समाप्त होता जा रहा है”।

पूर्व विधान सभा सचिव भाई अशोक चतुर्वेदी जी का आकलन गम्भीर है । समाज का समाज से सम्वाद, समाज का सरकार से सम्वाद ...। समाज है, सरकार है, सम्वाद कहाँ है?

मैंने गोरखपुर वाले ओझा जी से पूछा – “सम्वाद से सरकार और नागरिकों के बीच सरोकार बनता है जो किसी देश को रहने के योग्य बनाता है । समाज के बीच भी सहज भरोसे का सम्वाद समाप्त होता जा रहा है । समाज है, सरकार है, सम्वाद कहाँ है?”

गोरखपुर वाले ओझा जी ने नखरे दिखाये– “जा ...तुहीं खोजा ...सम्वाद कहाँ बाटे”।

मैंने कहा, “मैं गम्भीर हूँ, आपसे अपेक्षा है कि आप सोच-समझकर उत्तर देंगे”।

ओझा जी गम्भीर हो गये, बोले – “चीन में समाज बा, सरकार बा, …सम्वाद सुनले हौ का? सम्वाद एगो स्वस्थ प्रक्रिया बा ...होखे के चाहीं ...के करी सम्वाद? केकरा से करी सम्वाद? भेंड़ से सम्वाद ना करल जाला ...हाँकल जाला । चीन मं सम्वाद नइ खे ...तभियो समृद्धि बाटे ..चीन के इकोनॉमी देखले हौ?”

मैंने पूछा – “लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं क्या?”

वे बोले – “दुनिया के कवनो तंत्र ..कतना हू नीमन होखे... कुछ दिन के बाद भ्रष्ट हो जाला । लोकतंत्र त एगो ग़ुस्ताख़ तंत्र बाटे ...कुल बुड़बक बनाये वाला तंत्र”।

तान्या शुक्ला को कैलीफ़ोर्निया में रहते हुये दूसरा साल है । मैंने पूछा – “नये भारत के निर्माण में तुमने अपनी क्या भूमिका निर्धारित की है?”

सुभाष चंद्र बोस को भारत का प्रथम प्रधानमंत्री मानने वाली तान्या ने उत्तर दिया – “किसी मृत समाज का क्या निर्माण! हमारे सामने बहुत से भारतवंशी हैं जिन्होंने अमेरिका के निर्माण में अपनी भूमिका तय कर ली है । रही बात राष्ट्रवाद की तो आपका राष्ट्रवाद एक ऐसे देश की भौगोलिक सीमाओं में सिमटा हुआ है जो अभी तक अपनी दिशा तक तय नहीं कर सका है ...युवापीढ़ी के पास इतना समय नहीं है कि वह सुभाषचंद्र बोस बनकर एक मृत समाज के लिये अपनी आहुति दे दे । यह दुनिया आने वाले समय में किसी भारतवंशी को अमेरिका का उपराष्ट्रपति ही नहीं राष्ट्रपति भी बनते हुये देखने वाली है । हम जीवित समाज के लिये अपनी भूमिकायें निर्धारित करने वाले लोग हैं”।

मेरे सामने एक नया विषय आ गया है ...भारतवंशियों का विराट राष्ट्रवाद!  

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

इस विरोध पर पटक के मारूँ या हँसूँ

भारत के वैज्ञानिकों ने एण्टी कोरोना वैक्सीन बनाया ...दुनिया के कई ग़रीब देशों के नागरिकों को सच्ची वाली ख़ुशी हुयी पर भारत के नेतागण प्रसन्न नहीं हुये, विरोध के बादल फटने लगे – “मोदी फेकू है, वैक्सीन बनाने से पहले कम से कम कोरोना वायरस के बारे में जान तो लेता, वायरस को जाने बिना वैक्सीन बना दिया? और फिर वैक्सीन से अधिक आवश्यक है गलवान और अरुणांचल में चीनियों की घुसपैठ को रोकना जिसके बारे में मोदी गूँगा बना रहता है, मोदी देश को चीनियों के सामने प्लेट में सजा कर दिये दे रहा है। हम मोदी को उखाड़ फेकेंगे।

भारत को यू.एन. की अध्यक्षता का अवसर मिला, भारत के नेतागण और अतिबुद्धिजीवी ख़फ़ा हो गये, विरोध का बादल फटा – “मुल्क में कोरोना फैला है और मोदी को भाखन देने से फुरसत नहीं । मोदी हटाओ देश बचाओ”।

भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना की पहली औषधि खोज ली, देव-किन्नर-गंधर्व सब हर्षित हुये, भारत के “नेतागन आ बेसीबुद्धी बाला बिदवान लोग” रिसिया गया, विरोध का एक हथगोला फेंक कर मारा – “मोदिया अकदमे पगला गिया है, ममता भनर्जी क गाँव में रोज रतिया के एगो भेड़िया आता है कब्बो किसी का त कब्बो किसी का एगो बकरा-बकरी-मुर्गा-मुर्गी ले जाता है। गरीब का चिंता नहीं है मोदिया को के बेचारा जिएगा कइसे? कोरोना का दबइया से भेड़िया भागेगा...सुने हैं कब्बो?”

इसरो या डी.आर.डी.ओ. की कोई बड़ी उपलब्धि की ख़बर आते ही भारत के नेताओं और अतिबुद्धिजीवियों में मातम छा जाता है, विरोध के रॉकेट पर रॉकेट दागे जाने लगते हैं – “दिल्ली में दूध नकली बिक रहा है, मेरी दाढ़ी के बाल सफ़ेद होने लगे हैं, नेलकटर बाज़ार से ग़ायब हैं, नाख़ून बढ़ते जा रहे हैं, कुत्ते का पिल्ला नाली में गिर गया, फ़िरोज़ भाई के घर में चोरी हो गयी, चोर अभी तक पकड़े नहीं जा सके, दिल्ली में मोदी की नाकारा पुलिस सो रही है और मोदी मजे से चाय पी रहा है...इसरो और डीआरडी के नाम पर झूठ बोलने से जनता माफ़ नहीं करेगी मोदी को”।        

मोतीहारे वाले बाबा मिसिर जी गुस्से में हैं कि बड़का-बड़का पढ़ा-लिखा नेता लोग जनता को सरेआम अतना बुड़बक काहें बूझता है!


शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

था वो वक्त शब, वक्त ये है सहर

 

यह दुर्घटना जिहाद नहीं, कुचलू जिहाद है 

दिल्ली की सिंधु सीमा पर लग एक साल से किसान आंदोलन चल रहा है । इस बीच कई अप्रिय, हिंसक और राष्ट्रविरोधी घटनायें भी किसान आंदोलनकारियों के नाम से की जाती रहीं । नवरात्रि के पवित्र दिनों में एक बार फिर सिंधु सीमा पर एक दलित समुदाय के युवक की नृशंस हत्या, यह आरोप लगाकर कर दी गयी कि उसने गुरुग्रंथ साहिब का अपमान किया था । हत्या का तरीका तालिबान तरीके की तरह ही वीभत्स और क्रूर था । हत्या करने के बाद निहंगों ने इस हत्या का दायित्व स्वीकार करने की घोषणा करके एक और ग़ुस्ताख़ी की और सीधे-सीधे भारत की सरकार को चुनौती दे दी है ।


निहंगों का आरोप है कि इस दलित युवक ने गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान किया था जिसकी उसे सजा दी गयी है 

किसी एक घटना की पीड़ा अभी कम भी नहीं हो पाती कि अगली कुछ और घटनायें हो जाती हैं जिससे पुरानी सारी घटनायें एक-एक कर मन के कोने में रिसने लगती हैं ।

दुर्गापूजा के दिनों में पूजा के विरोध में हिंसक और उत्तेजक घटनायें फिर होने लगी हैं । छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखण्ड आदि प्रांतों में हिन्दुओं की आराध्या देवी दुर्गा का अपमान करके हिन्दुओं को स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि भारत में हिन्दुओं को धार्मिक स्वतंत्रता आने वाले समय भी बिल्कुल भी नहीं दी जायेगी ।

इस तरह के कलमतोड़ संदेशों और धमकियों का क्रम बना हुआ है । अपराधियों को दण्ड देने के स्थान पर संरक्षण और महिमामण्डित करने की परम्पराओं पर भी विराम नहीं लग सका है । यही कारण है कि ऐसी घटनायें बारम्बार होती जा रही हैं ...पहले से भी अधिक उत्तेजना और क्रूरता के साथ ।

कुछ साल पहले एक सरकारी चिकित्सालय की महिला चिकित्सक द्वारा अपने रोगियों के प्रिस्क्रिप्शन में इस्लामिक क़ायदों का पालन करने की हिदायतें लिख कर वर्षों तक दी जाती रहीं । शिकायतें होती रहीं और महिला चिकित्सक अपना कार्य बदस्तूर करती रही । हो सकता है कि मीडिया में हंगामे के बाद उस पर कुछ कार्यवाही की गयी हो किंतु इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्तियाँ थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं । पिछले साल एक मसीही चिकित्सक सर्जन ने आयुर्वेद की वैज्ञानिकता को लेकर बड़ा हंगामा किया और उसे प्रतिबंधित करने की माँग कर दी ।

शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को भी धार्मिक उन्माद और ध्रुवीकरण ने अपना शिकार बना लिया है । कुछ ही दिन पहले छत्तीसगढ़ के एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक द्वारा उन छात्रों की पिटायी गयी जिन्होंने अपने घर में दुर्गापूजा की थी और जो ईश्वर में आस्था रखते थे । शिक्षक ने छात्रों को धमकाते हुये प्रभु यीशु में अपनी धार्मिक आस्था बनाने के लिये कहा ।

जुलाई सन् 2020 में झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूमि जिले के घाटशिला में एक शिक्षिका ने छोटे बच्चों को पाकिस्तान और बांग्लादेश के राष्ट्रगानों को याद करने और उनका अभ्यास करने का ऑन लाइन गृहकार्य दिया था । पालकों ने इस पर संज्ञान लिया तो प्राचार्य ने उस आदेश को वापस लेने की घोषणा कर दी और शिक्षिका को निलम्बित कर दिया । प्रश्न यह है कि किसी मुस्लिम शिक्षक या शिक्षिका के मन में इतना दुस्साहस कब और कैसे उत्पन्न हो गया ? निश्चित ही यह सब अनायास नहीं हुआ ..हो ही नहीं सकता ...यह वर्षों से चले आ रहे मस्तिष्क प्रक्षालन का परिणाम है । माओ ने खाँटी” कम्युनिस्ट पीढ़ी उत्पन्न करने के लिये आयुर्वेदोक्त “मासानुमासिक गर्भिणी परिचर्या” का पालन करते हुये कम्युनिस्ट विचारधारा वाले कट्टर युवकों-युवतियों के आपस में विवाह करवाये और फिर गर्भावस्था में गर्भिणियों का मस्तिष्क प्रक्षालन करवाया जाता रहा । चिकित्साविज्ञान की ओलम तक न जानने वाले माओ को यह दृढ़ विश्वास था कि इस तरह उत्पन्न होने वाले बच्चे “खाँटी” कम्युनिस्ट होंगे । माओ के बाद शी-जिन-पिंग सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर तिब्बतियों के जातीय उन्मूलन के लिये खाँटी कम्युनिस्ट युवकों को तिब्बती लड़कियों से बच्चे पैदा करने का आदेश जारी कर दिया । वैचारिक दृढ़ता, निर्भीकता, और किसी स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने का दुस्साहस यूँ ही नहीं हो जाता ।

भारतीय सूचनातंत्र की दयनीय मानसिकता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि धार्मिक दंगों का समाचार प्रकाशित या प्रसारित करते समय “एक धर्म के लोग” या धर्म विशेष के लोग” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो उस दहशत को दर्शाता है जिसे सुनियोजित तरीके से उत्पन्न किया जाता रहा है । ये अपरोक्ष शब्द इस बात की भी चीख-चीखकर घोषणा करते हैं कि भारत में हिन्दुओं के लिये एक धर्म विशेष के अपराधी का नाम लेना या उसका धर्म बताना सुरक्षित नहीं है । क्या हम इसे गांधी और नेहरू के सपनों का भारत मान लें ।

भारत के हिन्दू इन सारी बातों को बहुत हल्के में लेते हैं या फिर सब कुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ देते हैं । गांधार देश, पचिमी भारत, पूर्वी भारत आदि अखण्ड भारत के भूखण्डों के हिन्दुओं की रक्षा उनके ईश्वर ने नहीं की, उन्हें मुसलमान बन जाना पड़ा । क्या आपको नहीं लगता कि आप इस्लामिक कानूनों वाले एक मुल्क में तब्दील होते जा रहे हैं ?

हाल ही में घाटी में सिख शिक्षिका-शिक्षक की हत्या के बाद वहाँ के मुसलमानों ने सड़क पर निकलकर हिन्दुओं के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करने का साहस किया । हिंदुओं के पक्ष में शायद पहली बार मस्ज़िदों से भी ऐलान किये गये हैं । यह एक मानवीय, अनुकरणीय और प्रशंसनीय पहल है । घाटी में बहुत लम्बी शब के बाद एक सहर की शुरुआत सी लग रही है ।

वक्त के नाम से एक आई ख़बर

वक्त को वक्त की ना लगे फिर नज़र ।

वक्त के ख़ौफ़ से वक्त दहशतज़दा  

आज हर कोई है हर किसी से ख़फ़ा ।

वक्त मुशरिक है तू, वक्त मैं बुतशिकन

वक्त तू शिर्क है, वक्त मैं हूँ सबब ।

वक्त ने वक्त का है कतल फिर किया

फिर ख़ुदा ने बुझाया ख़ुदा का दिया ।

वक्त ने वक्त को फिर से दी धमकियाँ

ख़ौफ़ से क्यों ख़ुदा की ये नजदीकियाँ । 

वक्त ने वक्त को एक ख़त है लिखा

वक्त बीमार वो, वक्त ये है दवा ।

था वो वक्त शब, वक्त ये है सहर

वक्त कमजोर एक, वक्त दूजा ज़बर ।

सम्वेदनाओं के व्यापार

         नृशंस हत्या, यौनदुष्कर्म, लूटपाट और मंदिर विध्वंस की पीड़ायें झेलना हमारी नियति बन चुकी है । 

समाज में नैतिक क्षरण से होने वाले अपराधों और शासन-प्रशासन के विभिन्न तंत्रों में होने वाले क्षरण को दूर करने के स्थान पर उन्हें संरक्षण दिये जाने की परम्परा ने राजनीति का अर्थ, उद्देश्य और सीमायें बदल कर रख दीं हैं । राजनीति में अब राजा की सु-नीति नहीं होती, गुण्डों और अपराधियों के कुचक्र और षड्यंत्र होते हैं जिनके सहारे देश की विशाल जनसंख्या को अपने नियंत्रण में रखने की प्रतिस्पर्धा कुछ लोगों के बीच होती रहती है । राजनीति के नाम से किये जाने वाले सुनियोजित अपराधों और षड्यंत्रों का धरातलीय सत्य एक बहुत बड़ा छल बन कर उभरता जा रहा है । भारत की हिन्दू जनता ने इस सत्य से अपनी आँखें फेर ली हैं, भ्रष्टाचार को मधुमेह जैसी व्याधि मानकर आम लोगों ने उसके साथ जीना सीख लिया है ।

जम्मू-कश्मीर में अक्टूबर 2021 के प्रथम सप्ताह के प्रथम छह दिनों में सात ग़ैरमुस्लिमों की हत्या कर दी गयी । परिचय-पत्र देखकर ग़ैरमुस्लिमों की हत्यायें की जा रही हैं । मुस्लिम नेताओं की छोड़िए, हिन्दुत्व विरोधी हिन्दूगुट अभी भी अपनी बात पर अड़ा है कि इस्लाम का विस्तार कभी तलवार के सहारे नहीं किया गया । सात अक्टूबर के दिन भी दो शिक्षकों - सुपिंदर कौर और दीपक चंद मेहरा को, विद्यालय में जाकर हिंदू होने के अपराध में मृत्युदण्ड दिया गया । मिथ्या भाईचारे की बात करने वाले मुसलमानों की प्रतिक्रिया हिन्दुओं को आश्वस्त नहीं करती, जिससे भय का वातावरण और भी गहरा हो गया है ।

पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह भारत में भी हिन्दू होना एक गम्भीर अपराध माना जाता है इसलिए हर बार की तरह इस बार भी हिन्दुओं की नृशंस हत्या पर किसी की सम्वेदना जाग्रत नहीं हुयी । हमने अपने जन्म से लेकर अब तक ऐसा ही भारत देखा है ।

सोलह अगस्त 1946 में हिन्दुओं और सिखों के विरुद्ध ब्रिटिश इण्डिया में छेड़े गये वीभत्स जिहाद की निरंतरता भारतीय उपमहाद्वीप में आज तक समाप्त नहीं हो सकी है । मानवीय संवेदना जैसे भावनात्मक शब्द भी गहन हाइबरनेशन में जा कर निष्क्रिय हो गये और “ईश्वर-अल्ला तेरो नाम” जैसे खोखले और भ्रामक गीतों को उनके मूल गीतों से पृथक कर देश और दुनिया को बेवकूफ़ बनाने का जो क्रम प्रारम्भ किया गया था वह आज भी यथावत है ।

1946 में मुस्लिम लीग ने तत्कालीन अंतरिम सरकार की कैबिनेट मिशन की योजना से स्वयं को अलग करते हुये  पाकिस्तान के लिये 16 अगस्त का दिन सीधी कार्यवाही दिवसके लिये मुकर्रर कर दिया जिसके बाद देश भर में हिन्दुओं का नरसंहार प्रारम्भ हो गया । हिंसा की पहली लहर कलकत्ता में 16 से 18 अगस्त के बीच शुरू हुई जिसे ग्रेट कैलकटा किलिंग्स के नाम से जाना जाता है । इसमें लगभग चार हजार लोग मारे गये, हजारों घायल हुये और लगभग एक लाख लोग बेघर हुये । इस हिंसा की आग पूर्वी बंगाल के नोआखाली जिले और बिहार तक फैल गयी ।

 3 मार्च 1947 में रावलपिण्डी में धार्मिक दंगे हुये, थोहा खालसा गाँव में सिख स्त्रियों ने मुस्लिम उत्पीड़न से बचने के लिये कुओं में छलाँग लगाकर आत्महत्या कर ली । अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर में पञ्जाब के गाँव–गाँव और शहर-शहर में अल्पसंख्यक स्त्रियों पर कहर ढाया जाने लगा । पाकिस्तान में ग़ैरमुस्लिमों के उत्पीड़न के वीभत्स दृश्य आज भी जारी हैं जिससे वहाँ के अल्पसंख्यक अब लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं ।

जुलाई 1947 से देश में फिर धार्मिक दंगे शुरू हो गये । पश्चिमी पञ्जाब से हिन्दुओं और सिखों का नरसंहार किया जा रहा था जबकि इसकी प्रतिक्रिया पूर्वी बंगाल में देखी जाने लगी जहाँ मुसलमानों की हत्या शुरू कर दी गयी ।

लाहौर, मुल्तान, बहावलपुर, कराची और मीरपुर ख़ास आदि से भारत की ओर आने वाली रेलगाड़ियों को रास्ते में रोक-रोक कर यात्रियों का सामूहिक नरसंहार और हिन्दू स्त्रियों से यौनदुष्कर्म किये जा रहे थे । 15 अगस्त के दिन जब गांधी नोआखाली में हुये दंगों में मुसलमानों की हत्या से पीड़ित होकर अपनी एकांगी संवेदनाओं का दरिया बहा रहे थे ठीक उसी समय दिल्ली में आज़ादी की ख़ुशियाँ मनायी जा रही थीं और कुछ मोहल्लों में हिन्दू औरतों के ज़िस्म नोचे जा रहे थे । यही स्थिति लाहौर और कराची में भी थी ।  

कराची में 1948 तक दंगे, आगजनी और कत्लेआम होते रहे । जब लाहौर में हिन्दू और सिखों को मारा-काटा जा रहा था, उनकी बहू-बेटियों के साथ यौनदुष्कर्म किये जा रहे थे, उनकी सम्पत्तियाँ लूटी जा रही थीं तो मोहनदास करमचंद गांधी की संवेदना जाग्रत नहीं हो सकी, वहीं जब नोआखाली में हिन्दुओं ने प्रतिक्रियास्वरूप मुसलमानों को मारना-काटना शुरू किया तो मोहनदास करमचंद गांधी की सुकोमल भावनायें आहत हो गयीं, उनकी संवेदना अचानक गहन निद्रा से जाग्रत हो गयी, वे अनशन करके हिंदुओं पर दबाव डालने और मुसलमानों से माफ़ी माँगने के लिये नोआखाली पहुँच गये । स्वेच्छाचारी संवेदना के कहीं जाग्रत होने या कहीं सुषुप्त होने के घुमक्कड़ी आचरण को अब हमारे देश में प्रशंसनीय और अनुकरणीय माना जाने लगा है ।

अक्टूबर 2021 के प्रथम सप्ताह में ही लखीमपुर खीरी में स्वयं को किसान कहने वाले सिखों की भीड़ ने केंद्रीय मंत्री के दौरे को प्रभावित करते हुये उन्हें घेरने का प्रयास किया । केंद्रीय मंत्री ने अपना मार्ग बदल दिया, भीड़ विरोध प्रदर्शन करने नये मार्ग के बीच में भी पहुँच गयी, भगदड़ मची, हिंसा हुयी, नौ लोग मारे गये, केंद्रीय मंत्री के बेटे पर आरोप लगाये गये । सियासत बुज़कशी का एक निर्मम खेल है, अवसर मिलते ही घोड़े दौड़ने लगते हैं ।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सभी आठ मृतकों के घर वालों को पैंतालीस-पैंतालीस लाख रुपये और परिवार के किसी एक सदस्य को शासकीय नौकरी देने की घोषणा की तो जवाब में छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्यमंत्री भी गये और पीड़ित परिवारों में से केवल चार मृतकों के घर वालों को, जिन्हें “किसान”, “अन्नदाता” और “शहीद” नामक संज्ञायें दी गयी थीं, पचास-पचास लाख रुपये क्षतिपूर्ति की घोषणा कर दी, जबकि शेष चार मृतकों को “हार्दिक या आर्थिक संवेदना” का पात्र नहीं मानते हुये न तो उनसे सम्पर्क किया गया और न उन्हें कोई क्षतिपूर्ति राशि दी गयी । यह हार्दिक संवेदना से अधिक आर्थिक संवेदना का प्रदर्शन था जिसमें संवेदना को तौलने का एक आर्थिक पैमाना निर्धारित करते हुये पाँच-पाँच लाख रुपये अधिक देकर यह बताने का प्रयास किया गया कि पञ्जाब और छत्तीसगढ़ की संवेदनायें उत्तर प्रदेश की सम्वेदना से कहीं अधिक संवेदनशील है ।

1947 के विभाजन में पाकिस्तान से लखीमपुर आने वाले सिखों की अधिकता है जिनमें से अधिकांश लोग अपने पुरुषार्थ के बल पर अब सम्पन्न हो गये हैं और दुर्भाग्य से उन्हीं में से कुछ लोग खालिस्तान के समर्थक भी हो गये हैं । यह एक विचित्र त्रासदी है । इस्लामिक आतंक से पीड़ित होकर भारत के पश्चिमी छोर से भगाये गये सिख आज उन्हीं आतंकियों के समर्थन से भारत में अपने लिये एक और नया देश बनाना चाहते हैं ।

अस्सी करोड़ रुअप्ये की मिल्कियत वाले ग़रीब टिकैत का किसान आंदोलन बीच-बीच में उबाल मारता रहता है । जिस देश में किसान आत्महत्यायें करते हैं वे अचानक हत्यायें करने लगे, अपनी बात मनवाने के लिये धरना-प्रदर्शन और अराजक घटनायें करने लगे । “किसान आंदोलन” अब एक राजनैतिक शब्द बन गया है जिसका किसान आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है । अब पूरे देश में कहीं भी कोई भी घटना होगी उसे केवल किसान आंदोलनही कहा जायेगा भले ही उसमें खालिस्तानी हों या अराजक तत्व ।  

सी.एन.बी.सी. आवाज ने लखीमपुर खीरी में हुयी हत्याओं को लेकर हो रही राजनैतिक हलचलों पर आधारित “राजनैतिक पर्यटन” विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी । गम्भीर चर्चा के लिये केवल पत्रकारों को ही आमंत्रित किया गया । वार्ता प्रारम्भ हुयी तो एक बार फिर प्रमाणित हुआ कि आमंत्रित पत्रकारों की प्रतिबद्धतायें पत्रकारिता के प्रति बहुत न्यून किंतु राजनीतिक दलों के प्रति बहुत अधिक थीं । गम्भीर चर्चा को आरोप-प्रत्यारोप में बदलते देर नहीं लगी ।

अधिकांश पत्रकारों ने इस बात का समर्थन किया कि मृत्यु किसी भी कारण से क्यों न हुयी हो, सार्वजनिक जीवन वाले राजनीतिज्ञों को वहाँ जाना ही चाहिये । यह अनिवार्यता अब एक परम्परा बना दी गयी है किंतु मैं यह समझ पाने में असमर्थ रहा हूँ कि तब फिर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के क्या दायित्व रह जाते हैं ?

जनता ने भाजपा को शासन का अधिकार दिया, राजनीति के मठाधीशों ने इसे स्वीकार नहीं किया, वे लगातार न केवल मोदी का व्यक्तिगत विरोध करते रहे बल्कि निरंतर अपदस्थ करने के कुचक्र में भी व्यस्त रहे इस बीच विपक्ष की मृत्यु हो गयी, किसी की सम्वेदना नहीं जागी । महाराष्ट्र के पालघर में हिन्दू संत की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है, राजनैतिक दलों की सम्वेदना जाग्रत नहीं होती, कोई राजनैतिक हलचल नहीं होती । भारत में सम्वेदना स्वेच्छाचारी है, वह कभी जागती है, कभी गहरी नींद में सोती रहती है ।

बहुत साल पहले की बात है, कांग्रेस के चुनाव में सुभाष चंद्र बोस जीत गये, नेहरू हार गये किंतु जम्हूरियत के अलम्बरदार बनने वाले नेहरू और गांधी ने उनकी जीत को कभी स्वीकार नहीं किया । राजनीतिक मठाधीश किसी भी सत्य को स्वीकार नहीं करते और उन्हें मानसिक सम्बल देने के लिये “सत्य हिन्दी” के फ़ाउण्डर आशुतोष और उनकी मण्डली के लोग “असत्य की स्थापना और प्रतिष्ठा” में तत्काल प्रभाव से कटिबद्ध हो खड़े हो जाया करते हैं ।

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

तमसोमा ज्योतिर्गमय

 ब्राह्मण, मूलनिवासी और पूर्वज

 

भारत के ब्राह्मणविरोधी मूलनिवासी उवाच – ब्राह्मण विदेशी हैं, रूस और ईरान से आये हैं किंतु पौलस्त्य रावण जी हमारे पूर्वज हैं, हम दशहरा में उनका वध नहीं होने देंगे

ब्राह्मणों को विदेशी मानने और छत्तीसगढ़ को उनसे मुक्त करने का स्वप्न देखने वाले छत्तीसगढ़ के एक मंत्रीपिता ने कुछ गाँवों के लोगों को दशहरा के अवसर पर रावणवध न करने के लिये तैयार कर लिया है ।

मंत्रीपिता का अनायास ही हृदयपरिवर्तन हो गया है और ब्राह्मणविरोधी होते हुये भी अब वे ब्राह्मणपुत्र रावण की पूजा करने के लिये छत्तीसगढ़ के लोगों को तैयार करने के अभियान में जुट गये हैं । यह वही छत्तीसगढ़ है जहाँ रावण वध करने वाले श्रीराम की ननिहाल हुआ करती थी । यानी श्रीराम की ननिहाल में कुछ लोग उनके शत्रु की पूजा की तैयारियों में जुट गये हैं ।

श्रीकृष्ण को जहाँ अपने जन्म के पूर्व से ही अपनी ननिहाल का तीव्र विरोध झेलना पड़ा वहीं राम को अपने स्वर्गवासी होने के बाद अपनी ननिहाल का विरोध झेलना पड़ रहा है । अद्भुत कुयोग है! 

भारत के आदिवासीबहुल कुछ क्षेत्रों में रावण और महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले आदिवासी दुर्गापूजा में महिषासुर वध और दशहरा में रावणवध का समय-समय पर विरोध करते रहे हैं । ब्राह्मणों को विदेशी मानने वाले ये ब्राह्मणविरोधी लोग स्वयं को भारत का मूलनिवासी मानते हैं किंतु पता नहीं क्यों ब्राह्मणपुत्र रावण को अपना पूर्वज मानते हैं ।

 “धार्मिक अभिव्यक्ति” और “नासा के वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किये गये इतिहास को नकारने की अभिव्यक्ति” की स्वतंत्रता का यह एक अद्भुत उदाहरण है । भारत में स्वतंत्रता का जिन्न सिर पर चढ़कर नाचता है । 

इजाज़त और अधिकार

 कुछ समय पूर्व गुजरात के भरूच में मुस्लिमबहुल हो गये एक क्षेत्र से हिन्दुओं को मुसलमानों के हाथों अपने घर बेचकर पलायन करना पड़ा था, और अब उस क्षेत्र के मंदिर को बेचने की तैयारी की जा रही है ।

भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम टकराव थमने के स्थान पर बढ़ता ही जा रहा है । इस्लाम का यह टकराव विदेशों में वहाँ के स्थानीय धर्मावलम्बियों के साथ भी है जिसके कारण पूरी दुनिया में इस्लाम की नकारात्मक नहीं बल्कि एक विघटनात्मक छवि बनती जा रही है । इस्लामिक स्कॉलर्स ने इस्लाम के विस्तार और अन्य धर्मों के उन्मूलन के लिये नयीं-नयी परिभाषायें गढ़ ली हैं और और नये-नये मापदण्ड बना लिये हैं ।  

इस्लामिक स्कॉलर स्थान विशेष में कुछ कार्यों की “अनुमति के लिये कुरान को और कुछ कार्यों के अधिकार के लिये भारत के संविधान एवं धर्मनिरपेक्षता की सीमायें

हिन्दूविरोधी कार्यों के लिये धर्मनिरपेक्षता और भारत के संविधान को स्वीकार करने वाले इस्लामिक स्कॉलर

मंदिर में कुरान और दुर्गा पंडाल में अजान देने और नमाज पढ़ने को अपना संवैधानिक अधिकार मानने वाले इस्लामिक स्कॉलर्स तब तुरंत पाला बदल लेते हैं जब उन्हीं संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुये मस्ज़िद में भी आरती करने की बात की जाती है । मंदिर में नमाज पढ़ने और हिन्दू लड़की से विवाह करने को मुस्लिम स्कॉलर धर्मनिरपेक्षता और गंगाजमुनी तहज़ीब का नायाब उदाहरण मानते हैं किंतु मस्ज़िद में हनुमानचालीसा पढ़ने और मुस्लिम लड़की से हिन्दू लड़के के विवाह के सवाल पर वही स्कॉलर धर्मनिरपेक्षता और गंगाजमुनी तहज़ीब का चोला उतार फेंकते हैं और ऐसे विवाह को इस्लाम के ख़िलाफ़ मानते हैं । शोएब जमुई जैसे कई स्कॉलर कहते हैं कि इन कार्यों के लिये पवित्र कुरान में इजाज़त नहीं है । यानी “कहीं” वे अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं और “कहीं” उन्हें कुरान की इजाज़त नहीं होती जिसका अंतिम परिणाम होता है हिन्दू उन्मूलन ...जो गज़वा-ए-हिंद का लक्ष्य है ।

भारत का संविधान ऐसा क्यों है कि एक व्यक्ति हिन्दू-उन्मूलन के लिये तो उसका दुरुपयोग कर लेता है किंतु वही व्यक्ति हिन्दू-रक्षण का विषय आते ही शरीयत को संविधान से ऊपर मानने लगता है । यदि ऐसा है तब क्यों नहीं अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपने-अपने धर्मों को संविधान से ऊपर मानने की स्वतंत्रता होनी चाहिये?

धर्म जब इतना विकृत हो जाय कि उसके नाम पर स्वेच्छाचारिता और अराजकता का ही राज्य हो जाय तब धर्म को अफीम मानकर उसका तिरस्कार ही मानवता को बचा सकता है । मूर्खों और निरंकुश असुरों का धर्म से कोई लेना देना नहीं हुआ करता । 

स्वतंत्र भारत में असुरक्षित हिन्दू

 जिस देश में ...धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर बलपूर्वक कहीं भी मजार या मस्ज़िद बना ली जाती हो (हालिया घटनायें दिल्ली की हैं जहाँ ये कार्य पुलिस संरक्षण में किये गये हैं), …मंदिर में घुसकर नमाज पढ़ने को धार्मिक सौहार्द्य माना जाता हो किंतु मस्ज़िद में रामायण पढ़ने को इस्लाम के विरुद्ध माना जाता हो, …सड़क पर कहीं भी नमाज पढ़ने के कारण आवागमन बाधित हो जाता हो, …कभी भी ...कहीं भी हिन्दुओं के साथ मारकाट होने लगती हो, …हिन्दुओं की लड़कियों से छलपूर्वक निकाह कर लिया जाता हो, …वक्फ़बोर्ड को भारत भर में किसी भी इमारत या ज़मीन को मुसलमानों को सौंप देने के लिये कलेक्टर को आदेश देने के कानूनी अधिकार दे दिये गये हों, …रोहिंग्यायों और बांग्लादेशियों को भारत में बसाकर जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने की सरकारी दीवानगी परवान चढ़ती रहती हो, …हिन्दुओं को भारत के किसी भी प्रांत के किसी भी हिस्से को छोड़कर भाग जाने का फ़तवा देने की बढ़ती धार्मिक आज़ादी परवान चढ़ती रहती हो, …दुर्गा-पूजा के पंडाल में जूते सजाने को धर्म और कला की अभिव्यक्ति मान कर चुपचाप रहने की दबंगई दिखायी जाती हो, …मुस्लिम दंगाइयों से पीटे गये पीड़ित हिन्दू लोगों के ही विरुद्ध भारत की पुलिस अपराध दर्ज़ करती हो और फिर उन्हें घर से उठाकर गायब कर देती हो (हालिया घटना कवर्धा दंगे की है), …शरीयत लागू करने और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने का खुलेआम ऐलान किया जाता हो, …मौलानाओं और नेताओं द्वारा हिन्दुओं का नाम-ओ-निशान मिटा देने वाले उत्तेजित भाषणों से दहशत का वातावरण तैयार किया जाता हो फिर भी सरकारें बेबस बनी रहती हों, …स्वतंत्रता के बाद से ही पाठ्यक्रमों में मनगढ़ंत और भारतीय गौरव के विरुद्ध अपमानजनक इतिहास पढ़ाया जाता रहा हो जिसके कारण हिन्दुओं की नयी पीढ़ी में आधुनिकता के नाम पर अपने ही धर्म के विरुद्ध दीवानगी बढ़ती जा रही हो, …जहाँ हिन्दुओं को काफिर और मुशरिक माना जाता हो, …जहाँ का हिन्दू स्वयं को दूसरी श्रेणी का नागरिक अनुभव करने लगा हो, … तो मुझे संदेह होने लगता है कि पंद्रह अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता क्या केवल मुसलमानों के लिये ही थी या उसमें से कुछ हिस्सा हिन्दुओं के लिये भी था ...और तब मैं यह भी सोचने के लिये विवश हो जाता हूँ कि क्या गांधी और नेहरू के सपनों का भारत अब सचमुच अपना आकार लेने लगा है और आने वाले दिनों में हिन्दुओं के लिये इस धरती पर कोई स्थान नहीं होगा?

रविवार, 10 अक्टूबर 2021

सब कुछ बिक जाएगा, जो बेच सके सो बेच

         भारतीय संस्कृति और सभ्यता से प्रभावित ज़र्मनी की कैरोलिना को अंततः एक नया उपनाम मिल ही गया और अब वे कैरोलिना गोस्वामी के नाम से जानी जाती हैं जो भारतीय समुदाय के लिये एक पोस्टमार्टम गर्ल बन गयी हैं । हाँ! वे पश्चिमी देशों में पनप रही नयी-नयी मानव प्रवृत्तियों और जीवनशैली का पोस्टमार्टम करती हुयी दुनिया को चेतावनी देती हैं । इस लेख को आगे पढ़ने से पहले सभी पाठकों से अनुरोध है कि एक नग छोटी इलायची अपने मुँह में अवश्य रख लें । यदि आप अधिक कल्पनाशील और संवेदनशील हैं तो आपको वमन हो सकता है, ऐसी स्थिति में आपसे विनम्र अनुरोध है कि इस लेख को और आगे मत पढ़ें ।

मुझे आश्चर्य हुआ जब कैरोलिना गोस्वामी ने अपने एक वीडियो में योरोपीय देशों की एक नयी प्रवृत्ति का पोस्टमार्टम करते हुये बताया कि वहाँ की लड़कियाँ अपनी पढ़ायी का खर्च निकालने के ऐसी-ऐसी चीजें बेच देती हैं जो अकल्पनीय हैं । बाजार में इन अकल्पनीय चीजों के ख़रीददारों की भीड़ बढ़ती जा रही है । इतना ही नहीं, इन चीजों को बेचने के लिये इण्टरनेट पर एक बहुत बड़ा बाजार भी खड़ा कर लिया गया है ।

हाँ! तो ये चीजें हैं –“अनवाश्ड एण्ड डर्टी अण्डरगार्मेंट्स”। जो अधोवस्त्र जितने अधिक दिन तक बिना धोये हुये पहनने के बाद बेचा जायेगा बाजार में उसकी कीमत उतनी ही अधिक होती है । जर्मनी के एक विश्वविद्यालय की छात्रा ने बताया कि एक जोड़ी अण्डरगार्मेण्ट को पाँच हजार डॉलर में बेचने के लिये कम से कम तीन हफ़्ते तक बिना धोये हुये पहनना पड़ता है । इस तरह उसे प्रतिमाह अच्छी खासी रकम की कमायी हो जाया करती है ।

विकसित देशों में प्रचलित इस नवीन व्यापार का पोस्टमार्टम करने से पहले मैं यह बता दूँ कि एक गंदे और अनहाइजेनिक अण्डरगार्मेण्ट से हजारों डॉलर कमाने के लिये इन पढ़ी-लिखी लड़कियों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी होती है । हफ़्तों तक किसी अण्डरगार्मेण्ट को पहनने से योरोप की लड़कियाँ “वेजाइनोसिस” नामक व्याधि की शिकार होती जा रही हैं ।

आज मुझे वर्षों पहले फ़िनलैण्ड से बस्तर आयी एक लड़की की याद आ रही है जिसने बस्तर की गर्मी में भी बिना स्नान किये दो सप्ताह गुजार दिये थे । हम उसे रोज उन्हीं कपड़ों में देखते थे ।

एक बार दो युवा फ़्रांसीसी महिलायें मुझसे मिलने आयीं । उनके चले जाने के बाद भी मेरे कमरे में बहुत देर तक भयानक बद्बू आती रही थी । यूके में रह रही शिखा ने एक बार बताया था कि सुबह-सुबह वहाँ की बसों, ट्राम और ट्रेन में चलना मुश्किल हो जाता है, शायद यूके के लोग सुबह-सुबह हाज़त रफ़ा करने के अभ्यस्त नहीं होते । यूँ हमेशा ही ऐसा नहीं होता, भारत आने वाले विदेशी पर्यटक भारतीयों की संवेदनशील नाक का यथोचित सम्मान करते हैं और अपने कमरे से बाहर निकलने से पहले ख़ूब सारा पर्फ़्यूम अपने ऊपर स्प्रे कर लिया करते हैं । यह तो योरोप की बात हुयी, किंतु “माथा घुमाऊ इंसानी गंध” के मामले में अमेरिका भी कोई कम नहीं है । मैं तो आपको केवल इतना ही बताना चाहता हूँ कि फ़िलाडेल्फ़िया और लास एंजेलेस जैसे अत्याधुनिक महानगरों की लड़कियाँ भी डर्मेटाइटिस जैसी बीमारियों की ख़ूब शिकार होती हैं ।

          अब बारी है पोस्टमार्टम की । पूँजीवाद के विरुद्ध कई क्रांतियाँ करने और कम्युनिज़्म को खूँटे से बाँध कर रखने के बाद भी पश्चिमी देशों में सम्पत्ति के ध्रुवीकरण को रोका नहीं जा सका । लास एंजेलेस में बहुत अमीरी है, ठीक उतने ही अनुपात में बहुत ग़रीबी भी है । ऐसे समाज में कुछ अकल्पनीय शौक नये-नये व्यापारों को जन्म देते हैं । ग़रीबों को जीवित रहने के लिये पैसा चाहिये, और वे इसके लिये कुछ भी कर सकते हैं । अमीरों को अपना बेशुमार पैसा ख़र्च करने के लिये कुछ शौक पालने होते हैं जिनके लिये वे कुछ भी कर सकते हैं । मैं जर्मनी की बात कर रहा था ...जर्मनी की उन छात्राओं की जो अपने “अनवाश्ड, डर्टी एण्ड अनहाइजेनिक अण्डरगार्मेण्ट्स” को हजारों डॉलर्स में बेच कर अपनी ज़रूरतें पूरी कर रही हैं । अमीर ख़रीददारों की कमी नहीं है । प्रश्न उठता है कि वे इन बद्बूदार कपड़ों का करते क्या हैं?

           पैसा जब बेशुमार होता है तो शौक भी बेशुमार होते हैं जो अंततः “पर्वर्टेड सेक्सुअल बिहैवियर” का कारण बनते हैं । डर्टी अण्डरगार्मेंट्स के सारे ख़रीददार इसी बीमारी के शिकार होते हैं । छात्राएँ इस बीमारी का इलाज़ गंदे कपड़े बेच कर करती हैं । मेडिकली यह सही इलाज़ नहीं है बल्कि सिम्प्टोमैटिक है जिससे रोगियों को थोड़ी देर के लिये एक्सटेसी की अनुभूति हो जाया करती है । कुछ चतुर लड़कियाँ सोशल मीडिया पर इश्तहार भी देती हैं और अण्डरगार्मेण्ट्स के डर्टी होने के प्रमाणस्वरूप उन्हें पहन कर अपने फ़ोटो भी ऊँची कीमत पर ग्राहक को बेच देती हैं । सोशल मीडिया पर ऐसे चित्रों की बोलियाँ लगती हैं । कमाल है, एक तो डर्टी गार्मेण्ट्स की बिक्री और फिर उसके विज्ञापन की भी बिक्री, डॉलर्स कमाने का डबल धमाकेदार तरीका ...वह भी उस देश में जहाँ के लोग साम्यवादी क्रांतियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं । यानी योरोप में तो “सब कुछ बिक जाएगा, जो बेच सके सो बेच”। सचमुच, कमाल का व्यापार है, कमाल के व्यापारी हैं, कमाल के ख़रीददार हैं ।

          बहरहाल कैरोलिना गोस्वामी योरोपीय देशों में अध्ययन के लिये जाने वाली भारतीय लड़कियों से अपेक्षा करती हैं कि वे स्थानीय छात्राओं की देखा देखी किसी लालच में न आयें बल्कि अपनी महान सभ्यता, संस्कृति और संतुलितजीवनशैली को बचा कर रखें ।  

देवभूमि

             धरती की सृजनात्मक शक्तियों की ऊर्ध्वगामी दिशा हमें प्रायः पठारी और मैदानी क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जबकि इनकी अधोगामी दिशा प्रायः मरुभूमि में दिखायी देती है । पर्वत और समुद्र, धरती की शक्तियों को संतुलित करने में लगे रहते हैं ।

धरती की भौगोलिक स्थितियाँ विविधता से भरी हुयी हैं । भारत अपनी अध्यात्मिक और दार्शनिक उन्नति के लिये सदा से विशिष्ट रहा है । सनातन धर्म के लिये प्रकृति को भारत की भूमि ही सर्वाधिक उपयुक्त लगती रही है । सनातन धर्म भारत के लोगों का स्वाभाविक धर्म रहा है ।   

भारत में मोहम्मद बिन कासिम, चंगेज़ ख़ान, तैमूर लंग, बाबर, लेनिन, स्टालिन, माओ और शी जिनपिंग जैसा कोई क्यों नहीं जन्म लेता? दुनिया के अन्य किसी देश में याज्ञवल्क्य, वेदव्यास, विदुर, गार्गी, आत्रेयी, विश्ववारा. लोपामुद्रा, घोषा, शचि,  मैत्रेयी, राम, कृष्ण, परशुराम, शंकराचार्य, विक्रमादित्य और चाणक्य जैसा कोई क्यों नहीं जन्म ले सका?

धरती के कुछ हिस्से तीर्थ क्यों हो जाते हैं तो कुछ अभिषप्त क्यों हो जाते हैं? धरती के जिस हिस्से को आप देवभूमि कहते हैं क्या सचमुच वहाँ देवता निवास करते हैं? कैलाश पर्वत क्या सचमुच दिव्य है? ऐसे बहुत से प्रश्न बड़ी उत्सुकता से उत्तर की अपेक्षा करते हैं ।

जो देता है, लेता नहीं, वही देवता है । जो सदा लेता ही लेता है, कभी किसी को कुछ देता नहीं वह असुर है । विभिन्न देशों में विभिन्न विचारधाराओं और जीवनशैलियों के प्राधान्य ने समय-समय पर राज्य किया है । राक्षस, दैत्य, दानव और असुर आदि पृथक-पृथक विचारधाराओं को मानने वाले लोग हैं, जो सदा रहे हैं, और भविष्य में भी सदा रहेंगे । कोई भी विचारधारा कितनी भी शुभ या अशुभ क्यों न हो, वह कभी समाप्त नहीं होती, समय-समय पर प्रबल और दुर्बल होती रहती है । आज शुभ और अशुभ विचारधाराओं के बीच टकराव की स्थिति हर क्षण गम्भीर होती जा रही है । दोनों विचारधारायें अपने-अपने वर्चस्व के लिये संघर्ष कर रही हैं ।

          हम भारतीय धरती को माँ का सम्मान क्यों देते हैं! ऋषियों ने इसका उत्तर देते हुये बताया ...क्योंकि धरती हमें वह सब कुछ देती है जो दुनिया के हर शिशु को अपनी माँ से अपेक्षित होता है । यह माँ के फ़िज़िकल और मेंटल कॉन्स्टीट्यूशन पर निर्भर करता है कि वह शिशु को क्या दे सकती है । हम सब अपनी दैहिक और मानसिक प्रकृति ही नहीं बल्कि जीवनशैली और संस्कार भी अपनी माँ से ही प्राप्त करते हैं । सभी प्राणियों में कुलगत (स्पिशीज़-जन्य) लक्षणात्मक भिन्नतायें इसीलिये होती हैं । कश्मीर और केरल में उगाये जाने वाले सेव के गुण एक से नहीं हो पाते, देहरादून और केरल की लीची में भी अंतर को स्पष्ट देखा जा सकता है । मंगोलिया और मिथिला में जन्मे व्यक्तियों के गुण एक से नहीं होते । हमारी धरती से हमारा बहुत निकट का सम्बंध है जिसे आज के संदर्भों में समझने की आवश्यकता है ।

          पहले मंगोलिया चलते हैं जहाँ के खेल भी हिंसा और क्रूरता पर आधारित होते हैं । खेलों को सामूहिक मनोरंजन का एक मौलिक साधन माना जाता है, किंतु यदि किसी जीवित प्राणी को खेल का साधन बना लिया जाय तो यह क्रूरता पशु के लिये भयानक पीड़ादायक हो जाती है । एक समय था जब मंगोलिया के लोगों को उदरपूर्ति के लिये मांसाहार और कठिन शिकार पर निर्भर होना पड़ता था । धीरे-धीरे क्रूरता और हिंसा वहाँ की सभ्यता बनती चली गयी । अरब के बहुत से हिस्से आज भी उपजाऊ नहीं बन सके, वहाँ भी मांसाहार और शिकार की प्रबल परम्परा रही है जिसने वहाँ के लोगों को क्रूरता, हिंसा और लूटमार का पर्याय बना दिया । मंगोलिया का इतिहास हिंसा, क्रूरता और लूटमार की भयानक कहानियों से भरा पड़ा है ।

सरस्वती, सिंधु और गंगा जैसी नदियों से सिंचित भूमि ने भारत को अद्भुत उर्वराशक्ति से संपन्न किया है । यह उर्वरता न केवल धान्य और फलों के लिये, बल्कि मानसिक और वैचारिक भी रही है । भारत में उदरपूर्ति के लिये मांसाहार कभी आवश्यक नहीं रहा है । उदरपूर्ति के लिये यहाँ की धरती ने एक से एक अच्छे विकल्प हमें उपलब्ध करवाये हैं । भारत के लोग इसीलिये भौगोलिक विस्तार और हिंसा से दूर रहकर अध्यात्मिक और तात्विक चिंतन की ओर निरंतर आगे बढ़ते रह सकने में सफल होते रहे हैं ।

वैदिक ऋचाओं की रचना में स्त्री-ऋषियों की भूमिका भी प्रमुख रही है । वैदिक ज्ञान से साक्षात् जैसा कोई अद्भुत कार्य मंगोलिया और अरब में सम्भव नहीं हो सका । आज भी पूरे विश्व में वैज्ञानिक शोधकार्य करने में भारतीय वैज्ञानिक ही अग्रणी हैं ।

धरती के जिस क्षेत्र पर प्राणियों में भय की अनुभूति हो वहाँ राक्षसत्व का प्राधान्य होता है । महाबलशाली राक्षस धरती के बहुत बड़े हिस्से को आक्रांत कर सकते हैं ....किंतु यह अवधि दीर्घकालीन नहीं हो सकती । पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान की धरती भी कम उर्वर नहीं है किंतु वहाँ की धरती विदेशी आक्रांताओं के राक्षसत्व से आज आक्रांत हो चुकी । हम भारतीय उपमहाद्वीप के हर हिस्से को देवभूमि मानते हुये आशा करते हैं कि एक दिन यहाँ की धरती से राक्षसत्व का अन्त होगा, किंतु इसके लिये हमें अपने अंदर देवत्व और मनुष्यत्व को जाग्रत करना होगा । पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान जितने अधिक अशांत और हिंसाग्रस्त होते जायेंगे उतने ही अधिक राक्षसत्व से मुक्ति की ओर अग्रसर होते जायेंगे । पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान की राजनीतिक सीमायें विलीनता की ओर अग्रसर होती जा रही हैं । दिव्यता के लिये भारत की सृजनात्मक शक्तियों को एकजुट रहते हुये स्वयं को शक्तिसम्पन्न बनाना होगा ।  

दिव्य कैलाश पर्वत आज असुरों के अधीन है । इसीलिये उसकी दिव्यता का लाभ किसी को प्राप्त नहीं हो पा रहा । हमें दिव्य कैलाश को महाबलशाली राक्षसों से मुक्त करना होगा ।