बुधवार, 8 जून 2022

वेश्यावृत्ति और उलझती परिभाषाएँ

        सर्वोच्च न्यायालय ने वयस्क स्त्रियों द्वारा की जाने वाली स्वैच्छिक वेश्यावृत्ति को संविधान की धारा 21 के अंतर्गत विधि विरुद्ध मानने से इंकार कर दिया है। तीन न्यायामूर्तियों की पीठ ने वेश्यायों के देह व्यापार को एक व्यवसाय मानते हुये संविधान की धारा 142 के अंतर्गत उन्हें परिचयपत्र प्रदान किए जाने के निर्देश भी दिए हैं। भारत जैसे देश में जहाँ नैतिक और मानवीय मूल्यों को बड़े सम्मान के साथ देखे जाने की दीर्घ परम्परा रही है, इस तरह के आदेश ने एक नए विमर्श की भूमिका उत्पन्न कर दी है।

विधिवेत्ताओं द्वारा माना जा रहा है कि इससे वेश्याओं के शोषण को नियंत्रित करने में सहयोग मिलेगा। किंतु व्यवसाय होने के कारण क्या इस व्यवसाय से होने वाली आय पर वेश्याओं को आयकर भी देना होगा? यह भावनाओं को आहत करने वाला एक प्रश्न हो सकता है। आम भारतीय नहीं चाहेगा कि वेश्याओं से आयकर लिया जाय, किंतु कालाधन कमाने वाले अपराधियों द्वारा इसका दुरुपयोग किए जाने की पूरी आशंका है। यह एक ऐसी आसन्न समस्या है जिसका समाधान कठोर ही हो सकता है।

आदिम यौनस्वच्छंदता से उपजने वाली हिंसाओं पर अंकुश लगाने के लिए मानव सभ्यताएँ समय-समय पर कई तरह के प्रावधान करती रही हैं जिसमें पारस्परिक सहमति, विवाह, बहुपत्नीविवाह, बहुपतिविवाह, विवाहेतर सम्बंध, लिव इन रिलेशनशिप, वेश्यावृत्ति और यौनदासी जैसी व्यवस्थाएँ प्रचलित रही हैं।

जब किसी समाज में कोई अप्रिय व्यवस्था मान्य हो तो वहाँ नैतिक और वैज्ञानिक मूल्य शिथिल हो जाते हैं। रिश्वतखोरी और वैज्ञानिक उपकरणों का दुरुपयोग ऐसी ही व्यापक व्यवस्थाएँ हैं। भारत में ऐसे कई समुदाय हैं जिनमें वेश्यावृत्ति पारम्परिक व्यवसाय है। ऐसे समुदाय औरों की दृष्टि में निंदनीय हो सकते हैं किंतु स्वयं उनकी दृष्टि में वे निंदनीय नहीं हैं। ऐसे लोग अपने परिवार के साथ रहते हैं, जिसमें बच्चे भी होते हैं और वयोवृद्ध भी।

किसी व्यवस्था को समाज या सत्ता से मिलने वाली स्वीकृति में नैतिक मूल्यों का होना आवश्यक नहीं। इसी के ठीक विपरीत नैतिक मूल्यों को समाज या सत्ता से मिलने वाली स्वीकृति आवश्यक नहीं। इन बातों की कई तरह से व्याख्याएँ की जा सकती हैं जिनसे व्याख्याओं का एक जंगल तैयार किया जा सकता है और जिसमें आम आदमी भटक कर रह जाएगा।

जैसे-जैसे हम सभ्य होते गये वैसे-वैसे व्याख्याओं में उलझते गये हैं। नैतिकता-अनैतिकता और पुण्य-पाप जैसे विषय हमारे चिंतन और आचरण को प्रभावित करते हैं, किंतु कई बार ये सब नितांत व्यक्तिगत विषय हो जाते हैं और उपभोक्तावादी भीड़ का इनसे कोई लेना-देना नहीं होता।  

मुख में राम बगल में मौला

            माथे पर काली बिंदी और कांधे पर काला उत्तरीय देखते ही आजमगढ़ वाले क्रांतिकारी बाबा की स्मृति में रामलीला में देखी रावण की वेशभूषा का दृश्य जीवंत हो आता है। अहमदाबाद वाली भावना बेन बताती हैं, काला रंग तो राक्षसों और इस्लामिक स्टेट वाले जिहादियों का प्रिय रंग है। राम कथा में शक्ति, हिंसा और शोक के रंग का क्या औचित्य!

 .किंतु कुछ तो औचित्य होगा तभी तो सादी सफ़ेद बण्डी या कुर्ता, सफ़ेद धोती, कंधे पर काला उत्तरीय (दुपट्टा) और मस्तक पर काली बिंदी वाले शायरी के शौकीन बाबाजी राम कथा सुनाते हैं। भारत में कथा सुनाना कोई जागरण नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ सालाना कमाई वाला एक व्यवसाय है। देश से बिदेश तक उन्होंने न जाने कितने कथाप्रेमियों को राम की कथा सुनायी। काले उत्तरीय वाले बाबा दिग्दिगंत में प्रसिद्ध हो गये, और एक दिन सनातन का उपदेश करते-करते अली-मौला... अली-मौला गाते हुये जग्गी वासुदेव की तरह नाचने लगे।

राम कथा में अकर्मण्यता और नपुंसकता का रस घोलने के लिए संगीतकार गीत गाते हैं, वाद्ययंत्र बजाते हैं। उसकी कथामंडली के संगीतकारों में प्रसिद्ध फ़िल्मी कलाकार होते हैं, कथा राम की होती है, बात गली-गली में मस्ज़िद की होती है और गीत होता है – “अली मौला... अली मौला...”

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की कथा सुनाते-सुनाते एक दिन कथावाचक के ज्ञानचक्षु उन्मीलित हुए, और वे इस्लाम से इतने प्रभावित हुए कि अपनी कथामण्डली के मुस्लिम तबलावादक को अपनी बेटी का हाथ सौंप कर धन्य हो गए।

आपको याद है न! वह गुजराती, “ईश्वर अल्ला तेरो नाम” गाया करता था। एक दिन उसने सूफ़ियाना गाना गाते-गाते भारत का एक बड़ा हिस्सा अल्लाह के बंदों को दे दिया। अल्लाह के बंदे आबाद हो गए और ईश्वर के बंदे उसी दिन से भाड़ में तिल-तिल कर जलने लगे।

आजमगढ़ि क्रांतिकारी के ये शब्द ट्रिलियन डॉलर कीमत के हैं –“कोई अध्यात्मिक काफ़िर जब प्रसिद्ध हो जाता है तो उसके भीतर से सेक्युलरिज़्म प्रकट होता है और तब उसका आराध्य अली मौला हो जाता है”।

राजनीतिक विकल्प

                भारत इस समय नेतृत्वविहीनता और बहुत गहरे वैचारिक संकट से जूझ रहा है। परिस्थितियाँ बहुत प्रतिकूल हैं, जिन पर भरोसा था वे विश्वासघाती निकले। सनातनी एक बार फिर बहुत बुरी तरह छला गया है। हिन्दुओं के स्वयम्भू ठेकेदार के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सनातनियों की पीठ में छुरा भोंक दिया है और भाजपा सत्यवादियों को दण्ड देने के लिए तत्पर हो गयी है। पालघाट में संतों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी, लालकिले पर ख़ालिस्तानी ध्वज लहराया गया, टिकैत के सामने प्रधानमंत्री ने घुटने टेक कर क्षमायाचना की, साधुसंतों के अपमान और उनको दी जा रही यातनाओं पर गहन मौन छाया रहा और शाहीनबाग गुण्डई साल भर निर्बाध चलती रही। अराजकता, अलगाववाद और अराष्ट्रवाद जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं के समाधान में असफलता जैसे अनेक प्रकरण हैं जिन्हें भारत की जनता ने बड़ी बेबसी के साथ सहन किया, किंतु अब और नहीं।   

नूपुर शर्मा को बलात्कारी भेड़ियों के आगे फेक देने वाली सत्तालोभी भाजपा देश के सनातनियों की कितनी रक्षा कर सकेगी यह अनुमान लगाया जा सकता है। कई बार ऐसा होता रहा है कि भारत के सनातनी लोग राजनैतिकविकल्प के अभाव में भाजपा की आत्मघाती चालों की अनदेखी करते रहे हैं, किंतु पानी अब सिर से बहुत ऊपर हो चुका है। भाजपा और संघ ने पूरी निर्लज्जता के साथ अपना नकाब पूरी तरह उतार कर फेक दिया है और ये दोनों सनातनियों के धोखेबाज शत्रु के रूप में सामने आ चुके हैं। इन्हें न तो राष्ट्र से कोई प्रयोजन है और न सनातन से, इनका लक्ष्य एन-केन प्रकारेण केवल सत्ता है जिसके लिए इन्हें भारत की बहुसंख्य जनता के साथ विश्वासघात करने में भी कोई लज्जा नहीं आती।

स्मरण कीजिए, हाल ही में केरल के किसी मुस्लिम नेता का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें अंग्रेज़ी में बोलने वाले वक्ता को यह कहते हुये सुना गया कि केरल में इस्लाम की हुकूमत 2031 में होगी, रा.स्व.संघ का ख़ात्मा 2040 तक हो जाएगा, भारत पर मुसलमानों की हुकूमत 2047 तक हो जायेगी और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने की घोषणा 1 जनवरी 2050 की सुबह कर दी जाएगी। उनका मिशन साफ है। इस वीडियो पर मोहन भागवत और भाजपा मौन रहते हैं। मौलाना महमूद मदनी द्वारा हिन्दुओं को भारत छोड़ देने की धमकी देने पर मोहनभागवत और भाजपा में मौन छाया रहा, कश्मीर घाटी में एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ प्रारम्भ हो गयी हैं, मोहनभागवत मुसलमानों को अपना भाई मान कर मुग्ध हुये जा रहे हैं। आस्तीन के साँप स्वयं बाहर आने लगे हैं। भारत के सनातनियों को वास्तव में भाजपा और संघ से गम्भीर ख़तरा है। ये अफगानिस्तान के राष्ट्रपति की तरह अवसरवादी और भगोड़े मानसिकता वाले लोग हैं जिनमें दृढ़ता और पुरुषार्थ का कहीं कोई अता-पता नहीं है।   

भारत भर के सनातनी राष्ट्रवादियों से आह्वान है कि अब और विलम्ब करने का समय नहीं रहा, हमें अविलम्ब एक नये राजनीतिक दल के गठन की आवश्यकता है जो धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि पूरी तरह धर्मसापेक्ष और प्राणिमात्र के लिए हितकारी सिद्धांतों पर आधारित होगा – “सनातनी राष्ट्रवादी दल”।

मोहन भागवत और मुसलमानों के पूर्वज

            बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में कश्मीर घाटी के कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ होती रहीं, पंडितों की लड़कियों से यौनदुश्कर्म किए जाते रहे, सनातनियों की सम्पत्ति लूटी जाती रही और उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया। सन् 1991 में एक अल्पविराम के बाद यह क्रम अब 2022 में एक बार फिर शुरू हो गया है।

शिवलिंग का अपमान करने वाले से, कुरान के इतिहास के एक तथ्य का उल्लेख करने पर नूपुर शर्मा से बलात् यौनदुष्कर्म करने और सिर काट कर लाने वाले को एक करोड़ के इनाम की घोषणा होती है जिस पर कार्यवाही करते हुये नूपुर शर्मा को उनकी पार्टी से छह साल के लिए निलम्बित कर दिया जाता है। इनाम की घोषणा करने वाले वकील साहब की विजय को भारत के लोकतंत्र ने गर्व से स्वीकार किया, जिसका मौन समर्थन मोहन भागवत द्वारा किया गया। 

मोहन भागवत कहते हैं कि 1991 से पहले के इतिहास को छोड़ो अब उसके बाद की स्थिति को स्वीकार कर लो। मोहन जी! इस महीने हिन्दू-उत्पीड़न की जो घटनाएँ हुयी हैं उन्हें इतिहास माना जाय या नहीं? मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा प्रतिक्षण जो अपमानजनक और हिंसा का इतिहास रचा जा रहा है उसे याद रखें या भूल जायँ?

मोहन भागवत मुसलमानों को अपना भाई बता रहे हैं किंतु अपने उन्हीं भाइयों के किसी अत्याचार के विरुद्ध बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। भाजपा और संघ ने सनातनियों के सामने बड़ी विचित्र स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। किंतु सनातनी इन सबसे निराश नहीं है। भारत को एक वैकल्पिक राजनीतिक दल की आवश्यकता है। आमजनता में सुगबुगाहट होने लगी है कि राष्ट्रवादी लोगों को एक पृथक दल गठित करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

लक्ष्मण रेखा

         भाजपा ने अपने कई सदस्यों को लक्ष्मण रेखा के लिए चिन्हित किया है। लक्ष्मण रेखा, गरिमापूर्ण भाषा और सौम्य विमर्श का स्वागत है। यदि आपके पास तर्क हैं तो शालीनतापूर्वक प्रस्तुत किए गए विमर्श प्रभावी होते हैं, अन्यथा वितण्डा ही होता है । किसी भी स्थिति में सभ्यता, शालीनता और सौम्यता की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। यह सभी के लिए होना चाहिए। किंतु टीवी विमर्श में होने वाली जिस अभद्रता, उग्रता और असभ्यता को हम सब देखते आ रहे हैं वही तो वितण्डावाद का मूल सिद्धांत है, “न श्रुणुतव्यं न मन्तव्यं वक्तव्यं तु पुनः पुनः”-वितण्डावादी उसे कैसे छोड़ सकेंगे! यह सबसे बड़ी चुनौती है जिससे सरकार, मीडिया और जनता सभी को जूझना है। दुर्भाग्य से इस तरह के आचरण और प्रदर्शन पर अंकुश लगाने के लिए आज तक किसी भी स्तर पर कोई प्रयास ही नहीं किया गया।   

टीवी विमर्श में हमने अपने बच्चों के साथ अभद्रता और असभ्यता की सीमाएँ बारम्बार तार-तार होते हुए देखी हैं। क्या ऐसे निरंकुश और अराजक लोगों के लिए भी कोई लक्ष्मण रेखा बनेगी?

मुझे उन सभी टीवी चैनल्स से शिकायत रहती है जो ऐसे असभ्य लोगों को बारम्बार डिबेट के लिए आमंत्रित करते हैं। डिबेट्स में होने वाली निम्नस्तरीय निंदा और कलह को सनसनी की तरह प्रस्तुत कर टी आर पी बढ़ाने वाले टीवी चैनल्स का दायित्व है कि वे विकृत मानसिकता वाले लोगों को मीडिया पर प्रस्तुत करने से परहेज करें। पीएच.डी. कर लेना मनुष्यता का प्रमाण नहीं है, उसके लिए तो अशिक्षित लोग भी पात्र हैं। सभ्य समाज को स्वस्थ विचारों और स्वस्थ विमर्श की आवश्यकता होती है, तू-तू मैं-मैं की नहीं।

टीवी चैनल्स को हाइपरबोल से भी बचना चाहिए, देश में बढ़ती उग्रता के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है। नूपुर शर्मा प्रकरण में मुस्लिम देशों का विरोध एक राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसका तार्किक और सफल समाधान सम्भव है किंतु टीवी चैनल्स और विपक्षी दलों ने इस बात का जो बतंगड़ बनाया उससे भारत की छवि ख़राब हुयी है। सरकार को भी चाहिए कि वह धार्मिक तुष्टीकरण से पूर्ण परहेज करे। हम इसके परिणाम देख चुके हैं, धमकियाँ भी सुन चुके हैं। यह भी सुन चुके हैं कि “दुनिया भर के मुसलमान किसी भी देश में क्यों न रहते हों किंतु हम सब एक हैं”। इस्लामियत के लिए मुस्लिम राष्ट्रवाद का यह वास्तविक स्वरूप अन्य धर्मावलम्बियों के लिए अध्ययन और चिंतन का विषय है। और आज की अंतिम बात यह कि नूपुर शर्मा के क्षमायाचना के बाद उस प्रकरण को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, मौलाना महमूद मदनी की यह ज़िद कि नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को कानून के दायरे में सजा दी जानी चाहिए, पूरी तरह अनुचित और अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने का अस्तरीय तरीका है। तथापि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भारत का सनातनी समाज इस तरह की किसी कानूनी प्रक्रिया का सामना करने से भयभीत है या सच कहने से पीछे हट जाएगा।

अभी अभी... धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म पर टिप्पणी करना भाजपा के सदस्यों के लिए वर्ज्य विषय और दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है। धर्म पर हर तरह की टिप्पणी करने और अमर्यादित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सर्वाधिकार केवल उनके पास सुरक्षित हैं जो भाजपा के सदस्य नहीं हैं।          


मंगलवार, 7 जून 2022

घरेलू धार्मिक शिक्षा

             धर्म एक विज्ञान है, और जीवन की एक कला भी। धर्ममूलक शिक्षा बच्चों को संस्कारवान बनाती है। इसके लिए घर ही सर्वाधिक उपयुक्त पाठशाला है, विद्यालयों में यह सम्भव नहीं। अर्थात बच्चों के संस्कार का 49 प्रतिशत दायित्व माता-पिता पर निर्भर करता है, 50.9 प्रतिशत बच्चे की मौलिक प्रकृत्ति पर और 0.1 प्रतिशत समाज पर। यह मेरा आकलन है, इसमें भिन्नता हो सकती है।  

मैंने अपने बेटे की बालसुलभ जिज्ञासाओं के समाधान के लिए उसे जो बताया वह उसके लिए पर्याप्त नहीं था। मुझे आगे बढ़कर वैशेषिक और सांख्य दर्शन को सामने लाना पड़ा। कुछ समय बाद उसकी जिज्ञासाओं ने फिर सिर उठाना प्रारम्भ कर दिया। मुझे कैमिस्ट्री और फ़िजिक्स को भी सामने लाना पड़ा। बेटा बड़ा हुआ तो उसने अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए क्वांटम फ़िज़िक्स को भी खँगाला।

बेटा बाहर रहने लगा, एक बार घर आया तो मुझे लगा कि वह कम्युनिस्ट हो गया है। मैंने परखने का प्रयास किया तो पता चला कि वह निर्गुण ब्रह्म का उपासक है। उसने बताया कि साधक के लिए सगुणब्रह्म की उपासना प्रारम्भिक स्थिति है, अगली स्थिति निर्गुणब्रह्म है। उसकी दृष्टि कृष्ण को एक धार्मिक कम्युनिस्ट के रूप में पहचानती है। मैं उसे धर्मसापेक्ष्य कम्युनिस्ट कहने लगा हूँ।     

राजनीतिक विवशताएँ

         राजनीति बहुत टेढ़ी-मेढ़ी और ऊँची-नीची पगडंडी है। राजनीतिक निर्णयों के बारे में हमारी धारणाओं और विचारों में भिन्नता हो सकती है। राजनीतिक गलियारों में छद्माचारियों के कूट-प्रमाणों और चिल्ल-पों (जिसे वे तर्क कहते हैं उसे यही संज्ञा दी जा सकती है) से जनता के सामने बड़ी भ्रम की स्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। उनके निर्णयों और जनता की समझ में तालमेल का हो पाना एक दुर्लभ स्थिति है। तो समझ का यह संकट जनता के सामने भी है जिसके लिए सरकारें और विपक्षी दल दोनों ही कहीं अधिक उत्तरदायी हैं।

व्यक्ति और समाज की समस्याएँ अब धार्मिक ध्रुवीकरण और उसके सहारे सत्ता की छीना-झपटी के चारो ओर बड़ी तीव्रता से घूमने लगी हैं। समाज के आधुनिकीकरण, विकास और आर्थिक सम्पन्नता के साथ यह छीना-झपटी और बढ़ेगी। जनता को बहुत समझदारी और धैर्य के साथ स्वयं और समाज को बचाने के लिए आगे बढ़ना होगा, सरकारों से अधिक यह दायित्व हम सबका है।

तर्क दिया जाता है कि मोदी और योगी की स्थिति “आगे नाथ न पीछे पगहा” वाली है, वे भ्रष्टाचार या छल किसके लिए करेंगे! उनका सदाचार हो या भ्रष्टाचार, निष्ठा हो या छल... जो भी है वह सब समाज और देश के लिए ही तो है।

यह एक वजनदार तर्क है, फिर भी कुछ प्रश्न उठते हैं। दुनिया के किसी देश की आपत्ति पर हम अपने आंतरिक मामलों के निर्णयों को पलट देने के लिए क्यों तैयार हो जाते हैं? हम आस्ट्रेलिया और फ़्रांस की तरह दृढ़तापूर्वक सामना क्यों नहीं कर पाते? हम उनके सामने क्यों झुक जाते हैं जिन्हें यदि चावल न दें तो त्राहि-त्राहि मच जाए? मुस्लिम देश के राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु पर भारत का राष्ट्रध्वज झुका दिया जाता है, प्रधानमंत्री की आँखों से अश्रुप्रवाह होने के समाचार आने लगते हैं किंतु नूपुर शर्मा के मामले में सारे मुस्लिम देश भारत के विरुद्ध एकजुट होकर मुआफ़ी माँगने के लिए अड़ जाते हैं। क्या राष्ट्रध्वज झुकाकर हमने उनके प्रति अपनी चाटुकारिता प्रदर्शित की थी? यदि नहीं तो हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का इन राष्ट्रों का इतना दुस्साहस कैसे हुआ? हम तथ्यों को पूरी दुनिया के सामने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ क्यों नहीं रख पाते? हम यह क्यों नहीं बता पाते कि हिन्दुओं को काट डालने और भारत को इस्लामिक देश बनाने जैसी धमकियों का हमारे देश में एक लम्बा सिलसिला है जिसके परिप्रेक्ष्य में इस बेबात की बात को देखा जाना चाहिए! क्या हमारी विदेशनीति इतनी शिथिल है? नूपुर शर्मा और नवीन पर तो निष्कासन की कार्यवाही हो जाती है पर नूपुर का बलात्कार करने और हत्या करने पर एक करोड़ के इनाम की घोषणा करने वाले वकील पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं होती? सनातनी देवी-देवताओं पर राणा अयूब और सवा नकवी जैसे सैकड़ों लोगों की अपमानजनक टिप्पणियों को ईशनिंदा क्यों नहीं माना जाता?

मौलाना महमूद मदनी जैसे तमाम मौलानाओं की धमकी पर कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता? पञ्जाब में खालिस्तान की आज़ादी का संघर्ष अब खुलकर सड़कों पर आ गया है, आम जनता को लगता है कि इस दुस्साहस का कारण वह प्रोत्साहन है जो लाल किले पर खालिस्तानी झण्डा लहराने की घटना को गम्भीरता से न लेने के कारण उत्पन्न हुआ है। आम जनता को लगता है कि किसान आंदोलन में टिकैत की निरंकुश भूमिका पर कोई कानूनी कार्यवाही न करने और किसानबिल वापस लेने से अराजकतत्व प्रोत्साहित हुये हैं। वे कौन सी विवशताएँ हैं जिन्हें हम समझ नहीं पा रहे हैं और विश्व के इतने बड़े लोकतांत्रिक देश को एक कदम बढ़ने पर दस कदम पीछे पलटने के लिए विवश होना पड़ता है?

ईशनिंदा (जो कि नूपुर शर्मा के ऊपर मिथ्या आरोप है) के विषय पर पूरी दुनिया के मुस्लिम राष्ट्र एक हो कर अपनी मनमानी शर्तें भारत के ऊपर थोप देते हैं, बिना इस बात का परीक्षण किए कि आरोप में कितनी सत्यता है। हम गलत नहीं हैं फिर भी हम इन राष्ट्रों के आगे, …इन ओवेसियों और मौलवियों के आगे क्यों झुकते हैं? मोहन भागवत के सामने ऐसी कौन सी विवशता है जो उन्हें मुसलमानों को अपना भाई मानने किंतु अपने उन्हीं भाइयों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों पर मौन रहने के लिए प्रेरित करती है? “बच्चा-बच्चा राम है गली-गली में सीता है” गाने वाले को नूपुर शर्मा के साथ यौनदुष्कर्म करने की धमकी पर दुःख क्यों नहीं होता, उनका मुँह बंद क्यों हो जाता है? और सबसे बड़ी बात यह कि सदा गहरी नींद में सोई रहने वाली जनता आखिर इस बार अपनी असुरक्षा और आसन्न संहार को लेकर इतनी उद्वेलित क्यों है? 

भारतीयता क्यों नहीं

         वे भारत के पुरातात्विक सत्य को नहीं मानते, भारत के इतिहास को नहीं मानते, अपने सनातनी पूर्वजों को नहीं मानते, भारत के संविधान को नहीं मानते, भारत की संसद के निर्णयों को नहीं मानते, भारत की संस्कृति को नहीं मानते, भारत की सभ्यता को नहीं मानते, वे भारत और भारत की भारतीयता को भी नहीं मानते किंतु... वे सब मोहन भागवत के भाई-बहन हैं। मोहन भागवत ने भीमराव आम्बेडकर की दूरदृष्टि के विरुद्ध अपने गांधीवादी विचार से भारतीय समाज को उद्वेलित और चकित कर दिया है।   

जो सनातनियों को काफिर मानते हैं, अपने अलावा दुनिया की किसी अन्य सभ्यता या संस्कृति या धर्म का अपमान करना सबब का काम मानते हैं, काफिरों से मेलजोल न रखने की शिक्षा अपने बच्चों को देते हैं, काफ़िरों को “रमजान के पाक महीने के बाद जहाँ पाओ कत्ल कर दो” को ख़ुदा का हुक्म मानते हैं, मोहन भागवत उन्हें अपना भाई मानते हैं। जो शरीयत के कानून को दुनिया के सारे कानूनों से ऊपर मानते हैं, और मनुस्मृति को जूतों तले रौंदते हैं, जो हमारी लड़की तो छल-बल से ले लेते हैं किंतु अपनी लड़की देने के लिए कत्ल पर आमादा हो जाते हैं, जो भारत में इस्लामिक परम्परा लाना चाहते हैं किंतु हम सनातनी सभ्यता और हिन्दुत्व की बात भी करें तो उसे गुनाह समझते हैं, मोहन भागवत उन्हें अपना भाई-बहन मानते हैं। यह कैसी विचित्र गंगा-जमुनी तहज़ीब है और सरकारें इस तहज़ीब की इतनी दीवानी क्यों हैं?

वे भारत में रहना चाहते हैं किंतु भारतीयता को अपना शत्रु मानते हैं। वे भारत को इस्लामिस्तान बनाना चाहते हैं और हिंदुत्व को अपना शत्रु मानते हैं। यह कैसा देश है जहाँ हिन्दुओं को आज भी जजिया देना पड़ता है जिसका उपयोग मुस्लिम धार्मिक कार्यों और उनके अन्य हितों के लिए किया जाता है, किंतु वही हुक्मरान सनातनियों के धर्मिक कार्यों पर सेक्युलर हो जाते हैं?

मौलाना महमूद मदनी जब यह कहते हैं कि “हम अपने मुल्क से समझौता नहीं करेंगे, इंशा अल्लाह! हमारा मज़हब अलग है, हमारा लिबास अलग है, हमारी तहज़ीब अलग है, हमारा खाना-पीना अलग है, हमारा सब कुछ अलग है। जिन्हें हमारा मज़हब... हमारे तौर-तरीके पसंद नहीं वे कहीं और चले जाएँ” तो उनके लिए “अपने मुल्क” का अर्थ भारत नहीं होता बल्कि दारुल हर्ब होता है, एक उर्वर विस्तृत भूभाग होता है जिस पर एक इस्लामिक हुकूमत कायम की जानी है और जिसके आदर्श भारतीय न होकर अरबी होने वाले हैं।  

यह इस्लामिक सभ्यता के वर्चस्व से जूझने और अपनी सभ्यता के अस्तित्व का संघर्ष है। सनातनी इसे कब समझेंगे!