मंगलवार, 30 नवंबर 2010

ठहरी हुयी ज्यों ओस सी

क्या हो तुम ...कैसे कहूं
वह गंध शब्दों में कहाँ !
हूँ, खो गया पाकर तुम्हें 
है साक्ष्य मेरे नयनों में.
  
नख से शिखर तक हो ग़ज़ल 
हौले से थिरकीं नयनों में, 
सरगम उमड़ता जा रहा  
आ भर लूं अपने नयनों में.

कितनी गहरी झील को 
ले घूमती हो नयनों में, 
कहीं फिसल कोई गिर न जाए 
डूब जाए नयनों में.

पांखुरी की कोर पर 
ठहरी हुयी ज्यों ओस सी, 
रूप तेरा ढल न जाए 
आ भर लूं अपने नयनों में.

सबसे खतरनाक प्राणी

आज एक पुरानी डाक भेज रहा हूँ ........आपको याद होगा सन २००५ में ह्त्या के आरोप में किसी तथाकथित शंकराचार्य को बंदी बनाया गया था, निंदनीय कृत्य के लिए दोषी को दंड मिलना ही चाहिए........पर प्रश्न और भी हैं ....उसी सन्दर्भ में तभी की लिखी एक रचना ....प्रस्तुत है आप सबके मंथन के लिए -


" सत्यमेव जयते " के  उद् घोषक    देश में        
बड़ा कठिन है यह समझ पाना 
कि सत्य को 
क्यों प्रतीक्षा रहती है सदैव 
धरती के फटने की ......
और ........
सीता का सत्य 
क्यों नहीं स्वीकारा जाता 
प्राणों का उत्सर्ग किये बिना !

मैं  आश्चर्य  चकित  हूँ ........
पूरे देश में फैले मंदिरों से 
निकलते ही बाहर 
न जाने क्यों बदल जाता है चरित्र 
पूरे देश का .
कुछ क्षण का पुजारी 
बन जाता है ........दिन भर का अत्याचारी.
धार्मिक.....आध्यात्मिक बने रहने के लिए
इतना ही पर्याप्त मान लिया है सबने,
इसलिए किसी को अधिकार नहीं 
कि दोष दे सके वह 
किसी ओसामा बिन लादेन को 
या
ह्त्या के आरोप में बंदी 
किसी शंकराचार्य को .

मैं आश्चर्य- चकित    हूँ .......
इतने लोग ............!
इतने रास्ते .............!
इतना ज्ञान ................!
पर ....
सब तिरोहित हो जाता है ........
न जाने कहाँ, .........न जाने क्यों ? 
और  मिलता नहीं कोई प्रमाण 
प्रतिदिन होते बलात्कारों का .
"बलात्कार" .........
यह शब्द इतना कुंठित हो गया है अब  
कि कोई आँच नहीं आती ....... 
हमारी  नैतिक  और आध्यात्मिक श्रेष्ठता  पर.
चाहे  कितनी  ही बार  ....क्यों न घटित  होती  रहें  
इस  कुण्ठित  शब्द  की शर्मनाक  घटनाएं  .
........................................................
ऐसी  ही श्रेष्ठताओं  के सहारे  
विकास  ( ? ) के सोपानों  पर चढ़कर  
बन गए  हैं हम  
धरती के सबसे खतरनाक प्राणी .
मैं, 
इसीलिये  
अधार्मिक  हो जाना  चाहता  हूँ अब  
ताकि  बची  रहे  ...................
थोड़ी  बहुत  मनुष्यता  
इस  धर्म  प्राण  देश में . 



सोमवार, 29 नवंबर 2010

अंधेरों नें कहीं ज़श्न फिर .........

मुस्कुराके चाँद नें
पूछा है बार-बार
कहीं ख़्वाब में वो फिर से
आया तो नहीं .


सूरज से रोज़ लड़ रही
सागर की हर लहर
किसी पोखरे को फिर कहीं
सुखाया तो नहीं .


गुमसुम हुयी हवा है
जंगल की आज फिर
कहीं आदमी नें शेर फिर  
खाया तो नहीं.


बदलियों से घिर गया
चाँद आज फिर
अंधेरों नें कहीं ज़श्न फिर
मनाया तो नहीं.


न जाने क्यों
मन मेरा
आज फिर उदास है
कहीं फिर किसी नें आपका
दिल दुखाया तो नहीं.

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

गंगा स्नान का पुण्य कैसे ले पाऊँ ?


दिनांक २४ नवम्बर, स्थान -ब्रह्मावर्त, जिला कानपुर.
टैक्सी से उतरकर गंगा की ओर जा रहा हूँ. कई पण्डे आकर घेर लेते हैं.......पूजा....संकल्प......स्नान ......?
मैं विनम्रता से मना कर देता हूँ ...पर वे मानने वाले कहाँ ! जैसे-तैसे पीछा छुड़ाकर घाट तक पहुँचा.
लीजिये, वहां के कुछ दृश्य आपके  लिए  भी -
सीढ़ियों पर फ़ैली गन्दगी का ढेर ......जूते..चप्पल....पोलीथिन....मूर्तियाँ (जो पूजा के बाद शायद सम्मान के योग्य नहीं रह गयीं थीं और उन पर किया गया विषाक्त रासायनिक रंग मछलियों को आत्महत्या करने के लिए सहज ही उपलब्ध कराने के लिए गंगा में विसर्जित की गयीं थीं  )...सड़े फूल...निर्विकार लोग .......शिक्षा का बढ़ता स्तर .......पब्लिक स्कूलों की भरमार .......देश में बढ़ती उच्च .. शिक्षा.....गंगा प्रदूषण .......गंगा बचाओ अभियान......ऊंह छोडो न यार ! चलो आगे चलते हैं .........    
एक ओर किसी परिवार को खड़े होकर संकल्प दिलाते हुए पंडा जी . एक ओर दक्षिणा के लिए झगड़ते पंडा जी. लुब्ध द्रष्टि से जजमान को तलाशते पंडा जी....युवा पंडा.....अधेड़ पंडा...वृद्ध पंडा ....भाँति-भाँति के पंडा जी....मुझे लगा....बिना पंडा को मध्यस्थ बनाए गंगा - स्नान भी संभव नहीं...... क्या स्वतंत्रतापूर्वक, बिना मंत्रोच्चारण के स्नान कर लेने पर कोई पाप लग जाएगा ? गंगा और श्रद्धालु के बीच ये मध्यस्थ क्यों ? आम आदमी की स्वतंत्रता का हरण करने वाले ये ठेकेदार कहाँ से आ गए ? उत्तर पूरे समाज को देना ही होगा.  आज ...नहीं तो कल ......समय आपसे पूछेगा अवश्य.
मैं आगे बढ़ा .....नालियों का गंदा पानी गंगा में गिर रहा है ...उससे मात्र दस फिट की दूरी पर ही एक युवा श्रद्धालु जी हाथ में गंगा जल लेकर आचमन कर रहे थे .उनकी श्रद्धा देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक था, तुलना करके देखा ....मैं सचमुच "नास्तिक" होता जा रहा हूँ . चलो, जब  कोलायीटिस होगा न! तब पता चलेगा   कौन   कितना नास्तिक है .
एक ही घाट पर स्त्री-पुरुष सभी का स्नान ....वहीं खुले में कपडे बदलतीं श्रद्धालु नारियां ...जो अन्य अवसरों पर अत्यंत लाजवंती   हुआ करती हैं .......गंगा-स्नान के पुण्य-लोभ  में कुछ समय के लिए  "लोक-लाज बिसराय"  परमहंस की गति को प्राप्त हो गयीं सी प्रतीत हो रही थीं.
आगे बढ़ा .....एक युवा पंडा जी एक लडके को सीढ़ियों पर पड़े गन्दगी के ढेर को गंगा में जल्दी-जल्दी फेकने का निर्देश दे रहे थे ......लड़का बड़ी तत्परता से आज्ञा का पालन कर रहा था. मैंनें कहा गंगा को साफ़ करने के स्थान पर आप बाहर पड़ी गन्दगी गंगा में क्यों फिकवा रहे हैं ? पंडा जी नें अपने श्री मुखारविंद से उवाचा - यह सब तो प्रशासन को करना चाहिए...अधिकारी ध्यान ही नहीं देते, मैं क्या करूँ ?
मैंने कहा - गंगा सफाई अभियान के लिए सरकार करोड़ों रुपये  खर्च कर रही है और आप गंगा को गंदा कर रहे हैं.
उन्हें अवसर प्राप्त हो गया .....शायद फूटने के लिए तैयार बैठे थे .....उवाचने लगे - ये करोड़ों रुपये अधिकारियों की जेब में जाते हैं, चारो ओर भ्रष्टाचार है ,गंगा की ओर कोई ध्यान ही नहीं देता...इसीलिये तो गंगा इतनी गंदी होती जा रही है.....
ब्रह्मावर्त के घाट पर, जहां पृथ्वी का केंद्र माना जाता है कई श्रद्धालु लोग पुण्य लाभ ले रहे थे ......पंडा जी उच्च स्वर में प्रशासन को कोसे जा रहे थे  और  श्रद्धालु  निर्विकार  भाव  से  पुण्य  लूटे जा रहे थे.....
धन्य है भारत भूमि ! यहाँ सब कुछ कितने निस्पृह भाव से होता रहता है ......पाप भी, पुण्य भी ....
इतने  अविचारी   पंडों   को  पुण्य का  मध्यस्थ  बनाने  वाले  लोगों  की  जय  हो  !
गलत  मंत्रोचारण  कर  लोगों  को  पुण्य दिलाने के ठेकेदार  .......ब्राह्मणत्व  (??????) को  अधोगति  की  ओर  धकेलते  पंडों  की  जय  हो  !!
भारी  मन  से वापस  आ गया  ...बिना  गंगा  स्नान   किये  ...
पुण्य नहीं  लूट  सका  ....मेरा  तो  नरक  में  जाना  तय ही समझो  .
वापस  जाते  समय  पंडों  नें  विचित्र द्रष्टि से द्रष्टिपात  किया  , जैसे  कह  रहे हों   ......वंचित  रह  गया  बेचारा  ब्रह्मावर्त  आकर  भी पुण्य नहीं  ले सका  ....मति  मारी  गयी  है ...पुण्य हर  किसी  के  भाग्य  में  लिखा  भी कहाँ  विधाता  नें  ?
हाँ ! ठीक  ही  तो  विधाता  नें  ऐसा  पक्षपात  किया  ही  क्यों  ? मैंने  तो  तय  कर  लिया  है नरक  में  जाऊंगा  तो  पूछूंगा  ज़रूर  .








                   

शनिवार, 20 नवंबर 2010

मधुशाला का पात्र -परिचय

अभी तक जितनी रुबाइयां लिखीं ......आपको समर्पित कर चुका हूँ . मधुशाला के प्रतीक-पात्रों का कई रूपों में प्रयोग करने का प्रयास रहा है मेरा . एक दिन इन सभी पात्रों ने शिकायत की  ".......हर किसी नें हमारा स्तेमाल ही किया है ......आपने भी . क्या हम सिर्फ माध्यम ही बने रहेंगे ........हमारे दर्द को पूछा है आज तक किसी नें ? क्या हमारा अपना कोई अस्तित्व नहीं ?" 
बात सही थी ...सो हमें सोचना पड़ा.......फिर ख़याल आया ...कम से कम पूछें  तो सही ....कुछ जानें तो सही इनके बारे में ...... तो इन्होंनें अपनी बात कुछ यूँ रखी हमारे सामने  -

रहकर हाला के संग भी ना 
डूब सका उसमें कोई प्याला /
सबको रंगती साकीबाला
बैरागी पर "मधुशाला" //

नहीं किसी की फिर भी सबकी 
मैं तो चेरी सारे जग की /
कुछ पल को मैं ख़ास तुम्हारी
भूली-बिसरी "साकीबाला" //

अपनापन मैं खोज रहा था 
अधरों तक जा वापस आया /
प्यास बुझाई सबकी पर, मैं
रहा  अंत में रीता "प्याला" //
कितने भी हों दुर्गुण पर, कोई 
मुझे न चाहे हो न सकेगा /
प्यास बुझाकर भी हूँ वर्जित 
मैं हूँ सबकी प्यारी "हाला" //



शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

लीजिये .......एक बार फिर हाज़िर हूँ आपके सामने .......लेकर उत्तरमधुशाला.....

साकी इस बार पिलाई कैसी !     
मैं तो था इस जग से रूठा /
सारी दुनिया हो गयी मेरी 
ऐसी तूने ढाली हाला //

खोज रहा हूँ , न्याय कहाँ है ?
लेकर अपना खाली प्याला /
जिसने उसका मोल चुकाया 
हो गयी उसकी मधुशाला //

लोग उजाले से डरते हैं 
पीते हैं 'तम' की हाला /
हर कोई झूठे नशे में डूबा
सूनी रहती मधुशाला //

नयनों से ले मेरा काजल
उसने फिर श्रृंगार किया /
पीकर तारीफों की हाला 
तोड़ दिया मेरा ही प्याला //

ईमान दिया , ईनाम लिया  
कर मुह काला पहनी माला /
"नशा" शर्म से डूब मरा है
पानी -पानी हो गयी "हाला" //




बुधवार, 17 नवंबर 2010

फतवे से आगे की मधुशाला........

आज देव उठानी का पर्व है और बकरीद भी .....
सभी को मंगलकामनाओं के साथ शुरू करते हैं उत्तर मधुशाला का वह भाग जो लखनऊ के काजी साहब नें मधुशाला के ख़िलाफ़ फ़तवा ज़ारी करके मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया ......उन्हें तहे दिल से शुक्रिया ....बड़ी विनम्रता के साथ समर्पित हैं काजी साहब को ये रुबाइयां -

सभी धर्म ग्रंथों को जीकर  
सार सुनाती मधुशाला /
फ़तवा वही सुनाते जिनको 
समझ न आती "मधुशाला" // २१

बाह्य कलेवर में भटका जो 
पी न सकेगा वो हाला /
भीतर नेक उतर जो देखे 
पा जाएगा "मधुशाला" // २२

धर्म-धर्म की रट करते सब 
मर्म समझ ना कोई पाया /
कर्म संभालो अपने-अपने,
होगी मधुमय कड़वी हाला // २३

छोडो कटु  भाषा फ़तवे की
बोलो   प्रेम पगी भाषा /
खुली नज़र से देखो तो जग 
चलती-फिरती मधुशाला // २४

टूटा मन , ले टूटी आशा 
जो भी आ जाए मधुशाला /
सबको अपने-अपने रंग की 
मिल ही जाती थोड़ी हाला // २५

पाखण्ड नहीं है यहाँ लेश भी 
भग्न हृदय हो, मन हो साँचा /
तनिक लीक से हटकर आओ /
तुम्हें बुलाती है मधुशाला // २६

मान मिला कब जग से हमको,
सदा ही तरसी है "मधुशाला" /
नफ़रत कर लो कितनी भी, पर
भूल सकोगे ना ये हाला // २७

कितने ही रंगों की हाला 
देख भ्रमित है पीने वाला /
सच्चे मन से खोजे जो भी 
पा जाता है असली हाला // 28