शनिवार, 7 मार्च 2020

न्यू कोरोना वायरस


अफ़वाह खण्डन के भ्रम से रहें सावधान ...

टीवी पर कोरोना के सम्बंध में लोगों को सावधान करने की मुहिम चल रही है । यह मुहिम उन तथाकथित अफ़वाहों का खण्डन करती है जो स्वयं में कितनी वैज्ञानिक है, यह आपको ही तय करना है –
टी.वी. पर होने वाला प्रचार -
1-  लहसुन या गोमूत्र के एंटीवायरल इफ़ेक्ट के बारे में कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं पाए गए हैं ।
2-  कम्मोडिटीज़ पर लगे हुए कोरोना वायरस 24 घंटे से अधिक जीवित नहीं रहते ।  

वास्तविक तथ्य –
1-  लहसुन और गोमूत्र का बायोलॉजिकली एंटीवायरल इफ़ेक्ट नहीं होने का अभी तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है ।
2-  किसी भी वायरस के ज़िंदा या मुर्दा होने का सवाल ही नहीं होता क्योंकि वह जीवित और निर्जीव के बीच की एक ऐसी कड़ी है जिसमें जीव और निर्जीव दोनों के गुण पाए जाते हैं । जबतक कोई वायरस किसी निर्जीव वस्तु की सतह पर रहता है तब तक वह पैथोलॉजिकली इफ़ेक्टिव नहीं हो सकता । किसी जीवित कोशिका के सम्पर्क में आने के बाद ही उसके पैथोलॉजिकली एक्टिव होने की सम्भावनाएँ हो सकती हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि होस्ट लिविंग सेल में रोगप्रतिरोध क्षमता की स्थिति क्या है!

मैं इसी संदर्भ में हल्दी, नीम और गाय के घी के बारे में लम्बे समय तक फैलाई जाती रही वैज्ञानिक अफ़वाहों के बारे में आपको याद दिलाना चाहूँगा जिसके अनुसार लगभग चार दशक तक इन चीजों को अवैज्ञानिक (और घी को तो स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक) प्रचारित किया जाता रहा । बाद में हल्दी और नीम के पेटेंट को लेकर हुयी एक लम्बी उठा-पटक से आप सभी परिचित हैं । गाय के घी के बारे में उड़ाई गयी वैज्ञानिक अफ़वाह पर विराम तक लगा जब फ़्रेंच पैराडॉक्स ने दुनिया की आँखें खोलीं और दुनिया को यह पता लगा कि जिन देशों में गाय का घी पर्याप्त मात्रा में खाया जाता है उन देशों में हृदयरोगों की सम्भावनाएं बहुत न्यून होती हैं जबकि गाय के घी से परहेज़ करने वाले लोगों में हृदयरोग होने की अधिकतम सम्भावनाएं पायी गईं ।    

अब आप एक वैज्ञानिक प्रपञ्च कथा पढ़िए ...

कोरोना के ख़िलाफ़ कदम उठाते हुये एक कम पढ़ा-लिखा आदमी नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट्स का सेवन कर रहा था, पास में खड़े वैज्ञानिक ने देखा तो चेताया – “यह अफ़वाह है कि नेचुरल एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में वायरस को प्रभावी नहीं होने देते, इस सम्बंध में अभी तक कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है । पुष्टि होने में कम से कम अठारह माह लगेंगे, उसके बाद ही इनका सेवन किया जाना उचित होगा”।

कम पढ़े-लिखे आदमी ने बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे आदमी से पूछा – “यानी मुझे अठारह माह तक प्रतीक्षा करनी होगी? तक तक मुझे क्या करना होगा ? इस बीच यदि मुझे इनफ़ेक्शन हो गया तो?”

बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे आदमी ने कहा – “जब तक रिसर्च नहीं हो जाती हम बचाव के किसी देशी उपाय के स्तेमाल की वैज्ञानिक स्वीकृति नहीं दे सकते”।

फिर हुआ यह कि कम पढ़े-लिखे आदमी ने बहुत ज़्यादा पढे-लिखे आदमी की स्वीकृति के बिना ही ...यानी नियम के विरुद्ध नेचुरल एण्टीऑक्सीडेंट्स का सेवन कर लिया । एक माह बाद ... कम पढ़ा-लिखा आदमे स्वस्थ्य बना रहा जबकि बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे आदमी को कोरोना वायरस से ग्रस्त पाया गया ।
   
बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे आदमी ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोरोना वायरस की दवाई और वैक्सीन के सम्बन्ध में कोई रिसर्च नहीं हो जाती ..वह किसी दवा का सेवन नहीं करेगा । वह अठारह माह तक इंतज़ार करेगा ...और तब तक कोरोना वायरस को भी इंतज़ार करना ही होगा ....शायद कोरोना लोगों को पता लग चुका है कि भारत में एक ज़ल्लाद निर्भया के गुनहगारों को फाँसी देने के लिए अदालत की कानूनीपुष्टि का इंतज़ार कर रहा है ।

https://youtu.be/DtEFVxP3NEg


रिहर्सल ...


सीरिया जैसी हिंसक घटनाएँ कभी सदा के लिए ख़त्म नहीं होतीं, महाभारत का युद्ध कभी अंतिम नहीं होता, राक्षसीवृत्ति मनुष्य का वह तामसिक और दुःखद पक्ष है जो सदा से रहा है... आगे भी रहेगा । दैवीय और मानवीय शक्तियों को इन सभी समस्याओं से सदा ही जूझना पड़ा है ...आगे भी यह परम्परा बनी ही रहने वाली है ।
सी.ए.ए. को लेकर दिल्ली में हुए हिंसक दंगों के बर्बरतापूर्ण तरीकों में सीरियायी गृहयुद्ध के रिहर्सल की झलक मिलती है जिसमें दो बातें प्रमुख हैं – एक तो यह कि इसमें बर्बरता की आइसिस वाली सीमाओं तक पहुँचने का सफल प्रयास किया गया. दूसरा यह कि इस रिहर्सल से भारत सरकार की सुरक्षा व्यवस्था, हिंदुओं की भीरुता और गद्दारों की स्वामिभक्ति की गहराइयों को मापने का प्रयास किया गया । यह दंगा राक्षसी तत्वों के शक्ति प्रदर्शन और भविष्य की योजनाओं की नींव के लिए मज़बूत ज़मीन की तलाश में भी सफल हुआ है ।

“मैंने भाजपा को छोड़ा है हिंदुत्ववाद को नहीं” – उद्धव ठाकरे ।
मेरी आज की टिप्पणी उद्धव ठाकरे के इसी वक्तव्य के संदर्भ में है । सनातन धर्म के मौलिक तत्वों, षड्दर्शनों और अध्यात्मिक सम्पदा का प्रबल समर्थक होते हुए भी मैं हिंदुत्व-वाद का उतना ही विरोधी हूँ जितना कि इस्लाम-वाद और ईसाई-वाद का । कोई भी वाद सहिष्णुता को स्वीकार नहीं करता इसलिए वह अपनी सीमाओं के विस्तार की असीमित अपील करता है जो वास्तव में सनातनमूल्यों के विरुद्ध है । वास्तव में मैं इसे कबीलाई परम्पराओं के रूप में ही देख पाता हूँ जो अस्तित्व के सांखिकीय विस्तार के लिए हिंसक संघर्षों का पोषण करती है ।
मैं दो शब्दों की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा – एक है धार्मिकआस्था और दूसरा है धार्मिकतत्व । हमें इन दोनों शब्दों की सूक्ष्मता को समझने का प्रयास करना होगा ।
धार्मिक आस्थाओं के बारे में एक जटिलता यह है कि उसके जड़ता में बदल जाने का संकट रहता है जबकि धार्मिक तत्व अपने सात्विक मूल्यों की वैज्ञानिकता को प्रदर्शित करने के कारण हर प्रकार की जड़ता से मुक्त रहते हैं । अब हम पुनः वाद पर आते हैं । कोई भी धार्मिकवाद धार्मिकतत्वों की हत्या के बाद ही प्रकाशित हो पाता है । यदि हिंदुस्तान में रहने के कारण हमें हिंदुत्ववाद की वकालत का अधिकार है तो असदुद्दीन और अकबरुद्दीन ओवेसी को इस मुल्क पर आठ सौ साल तक हुक़ूमत करने के पट्टे की विरासत में इस्लाम-वाद की वकालत का अधिकार है ...और इसी तरह अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपने-अपने धार्मिक-वादों को लेकर जंग छेड़ने और गज़वा-ए-हिंद का शक्तिपूर्ण अधिकार है । इस तरह के संघर्षों से मुक्ति का एक ही रास्ता है कि हम धार्मिकवादों के अहंकारपूर्ण संघर्षों से समाज को किसी भी तरह मुक्त करने का प्रयास कर सकें । किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम किसी भी थोपे जा रहे धर्मयुद्ध से मुँह मोड़कर आत्मघाती बन जाएँ और राक्षसी तत्वों को पूरी स्वच्छंदता के साथ पनपने का भरपूर अवसर उपलब्ध कराते रहें । 


रविवार, 23 फ़रवरी 2020

तू चल मैं आता हूँ



एक समय था जब वैज्ञानिकों के लिए बहुत आदर था मेरे मन में । उनकी विलक्षण बुद्धि, चमत्कारी उपलब्धियाँ, जीवन को सरलतम बनाने की क्षमताएँ ...किसी के लिए भी आकर्षण और जिज्ञासा का कारण हो सकती हैं । किंतु अब मेरा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया है । अब मैं देख पा रहा हूँ उस क्रूर अभिषाप को भी जो समवाय सम्बंध से जुड़ा हुआ है इन तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ ।
कोई वैज्ञानिक अपने पास नहीं रखता अपनी कोई उपलब्धि, अपना कोई चमत्कार ...अपना कुछ भी । वह दे देता है सब कुछ उस लोक को जो नहीं होता है उसके लिए लेश भी उपयुक्त पात्र । परिणाम होता है वैज्ञानिक उपलब्धियों का दुरुपयोग ।
आप मेरी दृष्टि से देखेंगे तो दिखाई पड़ जायेगा कि हर नवीन वैज्ञानिक उपलब्धि पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले व्यापारी वैज्ञानिक उपलब्धियों का निर्मम दोहन करने के अभ्यस्त हुआ करते हैं । ...और इस सबको रोकने की ज़िम्मेदारी ले रखी है जिन्होंने वे सब कोर्निश करने लगे हैं रोटेशील्ड के दरबार में । व्यापारी विष का सौदागर बने या एटम बम का, इस सौदेबाजी से जनजीवन पर क्या दुष्परिणाम होंगे ..इससे भी कोई प्रयोजन नहीं होता सरकारों को । कोई वैज्ञानिक नई खोज करता है, एक नयी डिवाइस बनती है, व्यापारी उसका उत्पादन करता है और फिर उस उत्पाद को सौंप देता है उन असंख्य अकुशल हाथों में जिन्हें नहीं पता होता उस उत्पाद का ‘क ख ग’ भी । मोबाइल फ़ोन जैसे एक आम डिवाइस का सही उपयोग कितने लोग कर पाते हैं ? …और दुरुपयोग कितने लोग करते हैं ...किन-किन रूपों में करते हैं ...यह अब किसी से छिपा नहीं रहा । दूरसंचार की इसी उपलब्धि ने सायबर क्राइम को जन्म दिया और आज पूरी दुनिया के लिये एटम बम से भी अधिक बड़ा ख़तरा सायबर क्राइम से हो गया है । दुनिया भर के दिव्य-आयुध मूर्खों के हवाले कर दिए गये हैं और हम गर्वोन्मत्त हैं कि हमसे बड़ा सभ्य और विकसित और कोई प्राणी नहीं ।
दर-असल यह सब लिखने से पहले मेरे मन में एक दुःख था ...देशी गाय के शुद्ध दूध की अनुपलब्धता को लेकर । वर्षों बाद एक बार मुझे गाँव जाने का अवसर मिला । मैंने देखा कि जिस गाँव में कभी हर दरवाजे पर कुछ पशुधन खड़ा दिखायी दिया करता था वहाँ अब सूनापन है । बैलों का स्थान ट्रेक्टर ने ले लिया, गोबर का स्थान केमिकल फ़र्टीलाइज़र्स ने ले लिया और गाय-भैंस का स्थान शहर से आने वाले डेयरीवाले के इंतज़ार ने ले लिया है । गाँव के लोग अब शहर की डेयरी से आने वाले दूध पर निर्भर हैं जो पानी मिला हो सकता है, नकली हो सकता है ...या फिर बॉस टॉरस नामक एक नकली गाय का हो सकता है जिससे मोटापा-हृदयरोग-मधुमेह या कैंसर होने की सम्भावनायें होती हैं । मुझे आश्चर्य हुआ था, गाँवों की दुनिया इतनी कैसे बदल गयी ...और बदलाव भी कैसा ...इतना दुःखदायी ...इतने अभावों और वंचनाओं  से भरा हुआ !
गाँव के लोग अब अपनी फसलों की निराई नहीं किया करते, हर्बीसाइड्स जो आ गये हैं ..जिन्होंने छीन लिया है गायों-भैंसों के मुँह का हरा निवाला और किसानों की मांसपेशियों को बना दिया है शिथिल । नन्हें बच्चों की किताब से वह कविता भी हटा दी गयी है जिसमें खेत के साझेदारों - कौवे और गिलहरी का काव्यात्मक संवाद हुआ करता था । गिलहरी किसी भी काम के लिये कहती तो कौवा एक ही उत्तर देता – तू चल मैं आता हूँ, चुपड़ी रोटी खाता हूँ, ठण्डा पानी पीता हूँ, हरी डाल पर बैठा हूँ । कमेरी गिलहरी खेत जोतने से लेकर बीज बोने, निरायी करने, पानी देने और फसल काटने तक के सारे काम अकेले ही करती रही । आलसी कौवे ने कुछ भी नहीं किया, यहाँ तक कि अपने हिस्सा का अनाज उठाकर घर भी नहीं ले गया जो अंततः वारिश में बह गया ।
अब इस प्रेरणास्पद कहानी का कोई औचित्य नहीं रहा । नई रोशनी के बच्चे नहीं जानते कि निराई किसे कहते हैं । हर्बीसाइड्स ने खा डाली हरियाली ...और खा डालीं हमारी इकोफ़्रेण्ड्ली कृषि परम्परायें ।
कुछ दशक पहले तक जो बीमारियाँ राजरोग के नाम से जानी जाती थीं वे अब निहायत ग़रीबों और मेहनतकश मज़दूरों को भी होने लगी हैं । चिकित्सा के ढेरों सिद्धांत उलट-पुलट होने लगे हैं, विज्ञान का सत्य अब यूनीवर्सल ट्रुथ नहीं रहा । ...और मैं इस सबको एक आसन्न संकट की पदचाप के रूप में सुन पा रहा हूँ ...स्पष्ट सुन पा रहा हूँ । शायद हर बार किसी सभ्यता के नष्ट होने का प्रमुख कारण वैज्ञानिक ही होते होंगे जो आज तक यह नहीं समझ पाये कि कोई दिव्यायुध किसी मूर्ख हाथ को नहीं सौंपा जाता ।  

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

गंगाजमुनी संस्कृति का मदरसों में ज्ञान


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों, आस्था, व्यक्तिगत विचार, क्रिटिक और लोकतंत्र के सेफ़्टी बॉल्व के नाम पर कोई भारत के प्रधानमंत्री के चित्र पर जूते मारने और थूकने का वीडियो बनाकर अपलोड करता है तो कोई गालियों के साथ-साथ अमर्यादित टिप्पणियाँ करता है । विरोध और आलोचना लोकतंत्र की पवित्रता बनाए रखने के लिये आवश्यक हैं किंतु विरोध का स्वरूप क्या यही होना चाहिए? यह कैसी अमर्यादित और ज़ाहिलाना स्वतंत्रता है? बेशक! इस तरह की ज़ाहिलाना हरकतों ने मुझे इस तरह की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का पूरी दृढ़ता के साथ विरोध करने के लिए मज़बूर कर दिया है ।
निस्संदेह, यह मोदी के राजनीतिक विरोध के बहाने हिंदुत्व का खुला विरोध है …गज़वा-ए-हिंद का आग़ाज़ है । मैं इसे कम्युनो-एथ्निक-रिलीजियस मॉब लिंचिग मानता हूँ ...जो हिंदुत्व के साथ-साथ इस्लाम में आस्था न रखने वालों के भी ख़िलाफ़ एक खुली जंग है । अब हमें यह मानने से कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिये कि गंगा जमुनी तहज़ीब के ढकोसले के बाद भी भारत में धार्मिक ध्रुवीकरण को कभी भी रोका नहीं जा सका । और आज की स्थिति यह है कि भारतीय समाज एक और भारत विभाजन की ओर बहुत आगे तक बढ़ चुका है । इसे रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी है? यह हिंदुत्व पर धार्मिक मॉब लिंचिंग है जो सही अर्थों में सेक्युलरिज़्म का वास्तविक चेहरा है ।

मदरसों में गंगाजमुनी संस्कृति और भाईचारे के अद्भुत ज्ञान की छटा अब बाहर भी रिसकर आने लगी है, यह भयानक है ...पूरी तरह दहशत फैलाने वाले इरादों से परिपूर्ण...!  मदरसों और मदरसा कल्चर वाले सेक्युलरिस्ट शिक्षण संस्थानों की तस्वीर अब बहुत कुछ साफ़ हो चुकी है । सोने वाले अभी भी सो रहे हैं, दूसरी ओर सेना और सुरक्षा बलों पर आये दिन होने हमलों से देश की नब्ज़ को टटोला जा चुका है । तालिबानों यानी किशोरवय छात्र-छात्राओं के मुँह से प्रधानमंत्री मोदी को गालियाँ दिलवायी जा रही हैं, कहीं नाटक के माध्यम से, कहीं वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के माध्यम से तो कहीं गीतों और कविताओं के माध्यम से । और जब इन पर कानूनी कार्यवाही होती है तो भारत का अतिबुद्धिजीवी वर्ग “नन्हें बच्चों के प्रति हुकूमत की क्रूरता”, “दमनात्मक कार्यवाही”, “सत्य का दमन”, “कला और साहित्य को बंधक बनाने की कोशिश”, “फासीवाद”,”अभिव्यक्ति की आज़ादी” और “क्रिटिक-कल्चर” जैसे जुमलों के साथ सुरक्षाकवच बन कर मैदान में कूद पड़ता है । अब इस धोखे में रहने की ज़रूरत नहीं कि सारी दुनिया की निगाहें हमारी इन हरकतों पर नहीं हैं । सारी दुनिया समझ रही है कि हम कितने खोखले और अपने घर के गद्दारों से घिरे हुये असहाय और निर्बल प्रजा हैं । दुनिया में चीलों और सियारों की कमी नहीं जो मौका पाते ही हमारे ऊपर झपट पड़ने के लिए तैयार बैठे हैं । और हम हैं कि बा-ख़बर होते हुये भी बे-ख़बर होने का अभिनय कर रहे हैं ।      
हमारा समाज एक और भारत विभाजन की दिशा में निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है, भले ही कुछ लोग इसके लिए तैयार न हों । इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा ...सब कुछ अनियंत्रित किंतु पूर्वनियोजित है और हम सब भीड़ के चुंगुल में फँसते जा रहे हैं । गान्धी भी तैयार नहीं थे किंतु भारत विभाजन हो कर रहा । “ले के रहेंगे हिंदुस्तान”, “इस्लाम की हुकूमत”, “शरीया कानून लागू करके रहेंगे”, हिंदुओं का नाम-ओ-निशान मिटा देंगे” ...जैसे उत्तेजक नारे ख़ुले आम लगाये जा रहे हैं और हम अपने पूर्वजों की विरासत को सहेजने के लिये “हिंदू राष्ट्र की अवधारणा” का नाम तक लेने में काँप जाते हैं । क्या अब भी किसी को यह बताने की आवश्यकता है कि वैचारिक मॉब लिंचिंग का दायरा बढ़ता जा रहा है ....पूरी राजनीति मॉब लिंचिंग का शिकार हो चुकी है!

भारत के इस अराजक होते अभारतीय समाज को अंकुश में करने के लिये लोकतंत्र के स्वरूप पर गहन चिंतन मंथन करना होगा । हिंदुत्व पर चारों ओर से हो रहे प्रहार से स्पष्ट है कि भारत को एक और इस्लामिक देश बनने के लिये तैयार किया जा रहा है । मदरसे अराजकता और आतंक के केंद्र हो चुके हैं । बच्चों के कोमल मस्तिष्क में बोये जाने वाले ये नफरत के बीज किसी राजनीतिक दल विशेष के लिए नहीं बल्कि किसी क़ौम के लिये हैं । हम एक और भारत विभाजन नहीं चाहते इसलिए संविधान में एक और संशोधन की आवश्यकता है ...धार्मिक आधार पर खोले गये सभी विद्यालय बंद होने चाहिये । शिक्षा में एकरूपता ज़रूरी है । मैं समझना चाहता हूँ कि गंगा जमुनी तहज़ीब और भाई चारे की अद्भुत मिसाल पेश करते इन मदरसों की ज़रूरत दुनिया की किसी भी कौम के लिये क्यों होनी चाहिये ? मैं यह भी समझना चाहता हूँ कि शिक्षण संस्थाओं और सामाजिक जीवन में व्यक्तिगत आस्थाओं के सार्वजनिक प्रदर्शनों, विरोध का स्तर और उसकी तीव्रता कितनी होनी चाहिये ? दुर्भाग्य से लोकतांत्रिक देश भारत में आज तक इसके लिए कोई पैमाना नहीं निर्धारित किया जा सका है ...फ़िर भी यह अंदाज़ तो लग ही चुका है कि यह थ्रेश होल्ड से कहीं बहुत ज़्यादा है ! क्या अब एक कानून ऐसा भी नहीं बनना चाहिए जो विरोध का स्तर और उसकी मर्यादा को तय कर सके ?



सी.ए.ए. का विरोध यानी मानवीय संवेदनाओं का विरोध


भारतीय नागरिकता कानून संशोधन के विरोध प्रदर्शन के एक मामले में मुम्बई हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवायी करते हुये निर्णय सुनाया है कि किसी कानून का विरोध प्रदर्शन करना राष्ट्रद्रोह या देश के साथ गद्दारी करना नहीं है । सुप्रीम कोर्ट के भी एक न्यायाधीश डी. वाय चंद्रचूड़ मानते हैं कि असहमति पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल डर की भावना पैदा करता है । अहमदाबाद में गुजरात हाई कोर्ट के ऑडिटोरियम में 15वें पी. डी. मेमोरियल लेक्चर में डी. वाई. चंद्रचूड़ ने 'असहमति' को लोकतंत्र का 'सेफ्टी वॉल्व' भी बताया । उन्होंने कहा, 'असहमति को एक सिरे से राष्ट्र-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी करार देना संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण एवं विचार-विमर्श करने वाले लोकतंत्र को बढ़ावा देने के प्रति देश की प्रतिबद्धता की मूल भावना पर चोट करती है”।
सेफ़्टी बॉल्व वाली बात मनोवैज्ञानिक है और लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी । किंतु यह भी सत्य है कि देश-काल और वातावरण को देखते हुये कही गयी किसी बात के अर्थ भी संदर्भनिरपेक्ष नहीं हो सकते । एक आम आदमी होने के नाते, न्यायाधीशों की समसामयिक टिप्पणियों के अर्थ ग्रहण करने की स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त है ।   
हम पुनः आते हैं मुम्बई हाईकोर्ट के ताजे फैसले पर, जिसमें कहा गया है कि “किसी कानून का विरोध प्रदर्शन करना राष्ट्रद्रोह या देश के साथ गद्दारी करना नहीं है”। .. अर्थात सीएए, एनआरसी और एनपीआर का विरोध करना लोकतांत्रिक है जबकि इनका समर्थन करना अलोकतांत्रिक और फासीवाद है । हर प्रकार के विचार और क्रियान्वयन का विरोध यदि उचित है और विरोध करने वाले का अधिकार है तो उसी विचार और क्रियान्वयन के समर्थन को अनुचित और अनधिकार स्वीकार करना होगा । दूसरी ओर इस अर्थ की एक ध्वनि यह भी है कि हमें भी जज साहब के निर्णयों और प्रतिक्रियाओं के विरोध प्रदर्शन का मौलिक अधिकार प्राप्त है । किंतु तब ऐसी स्थिति में न्यायालय की अवमानना का कोई अर्थ नहीं रह जाता ।  
जज साहबान बड़ी चालाकी से अपने निर्णय और अपनी प्रतिक्रियाओं को विवादास्पद बना कर लोकतंत्र का बहुत बड़ा अहित करने का शौक फ़रमा रहे हैं । सीएए के विरोध प्रदर्शन को जज साहब आम आदमी की असहमति और मौलिक अधिकार मानने का निर्णय लेते समय असहमति के स्वरूप और मौलिक अधिकार की सीमा की बात को गोल कर जाते हैं । इसे भूल कहा जाय या धूर्तता यह आम आदमी के विवेक पर छोड़ देना उचित होगा ।
तो मामला यह है कि कुछ लोग जो संविधान और सर्वोच्च न्यायालय को मानने से इंकार कर देते हैं, वे सीएए के सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की अनुमति न दिये जाने के विरोध में स्थानीय प्रशासन के विरुद्ध मुम्बई की शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का पाखण्ड करते हैं । शीर्ष अदालत सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन को नागरिकों का मौलिक अधिकार मानते हुये उनके पक्ष में फैसला सुनाती है । वे भारत के एक ऐसे कानून का विरोध कर रहे हैं जिससे किसी को कोई क्षति होने की सम्भावना नहीं है बल्कि धार्मिक भेदभाव के कारण दुःखी और पीड़ित भारतवंशियों के साथ मानवीय न्याय होने की सुनिश्चितताएँ हैं । सीएए का विरोध मानवीय संवेदनाओं का विरोध है । सीएए का समर्थन मानवीय करुणा का समर्थन है । और अदालत कहती है कि सीएए का विरोध आम आदमी का मौलिक अधिकार है । मैं भी इस देश का एक आम आदमी हूँ और इस नाते यह जानना चाहता हूँ कि क्या किसी समाज को ऐसे भी किसी मौलिक अधिकार की आवश्यकता है?
किंतु-परंतु की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं है । विरोध प्रदर्शन कब हिंसक हो जाय इस बात की सुनिश्चितता कोई नहीं करना चाहता, इसमें किसी की कोई रुचि नहीं । शाहीन बाग में विरोधियों द्वारा हिंसा किए जाने की ख़बर नहीं है । हिंसा के कितने स्वरूपों को जानते और पहचानते हैं आप? एक आदमी अपनी हर उचित या अनुचित बात को मनवाने के लिए अन्न-जल त्यागने की धमकी देता है, लोग उसकी इस धमकी से डर जाते हैं और एक ज़िद्दी आदमी के प्राणों की रक्षा के लिए उसकी हर बात को मान लेते हैं ...ऐसी बातों को मान लेते हैं जिनका दुष्प्रभाव अनिश्चित काल के लिए एक विराट जन समुदाय पर पड़ने वाला है । वैचारिक हिंसा के इस सर्वाधिक क्रूर स्वरूप में किसी भी कोण से मैं आज तक अहिंसक स्वरूप को नहीं देख सका ...और आप इसे अहिंसा कहते हैं!

मदरसे की एक बच्ची एक गीत पेश करती है जिसमें भारत के प्रधानमंत्री का नाम लेकर अपशब्द कहे जाते हैं । श्रोता बच्चे तालियाँ बजाते हैं और प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक नारे लगाते हैं । आप इसे एक नाबालिग बच्ची के मन की भावना और लोकतंत्र का सेफ़्यी ब्प्ल्व कह कर उसका बचाव करते हैं बिना कोई उत्तरदायित्व तय किए कि उस बच्ची को मदरसे में ऐसा करने की अनुमति देने वालों में सभी लोग बालिग और ज़िम्मेद्दार लोग मौज़ूद हैं । उधर दिल्ली में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री के लिए अपमानजनक टिप्पणी करने वाले के ख़िलाफ़ कार्यवाही की माँग की जाती है ...लेख लिखे जाते हैं ...और नैतिकमूल्यों-मानवीयमूल्यों-फासीवाद-हिंदूआतंकवाद जैसे भारीभरकम शब्दों के साथ बलात्कार किया जाता है ।

अगवा कर लिया गया है दीपक ...अगवा कर लिया गया है कानून... अगवा कर लिया गया है संविधान ....अगवा कर लिये गये हैं महापुरुष ...तुम किस सभ्यता की बात करते हो! देख कर भी नहीं देखतीं आँखें ....सुन कर भी नहीं सुनते कान...मनन करके भी नहीं मानता मन ...कि घिर आये हैं अँधेरे ...बेशुमार …गूँजते हैं अट्टहास ...चढ़ा दो फाँसी पर सत्य को ...जलता है जिसका मात्र एक ही दीपक ...पाता है ख़ुद को असहाय । मिटा दो दीपक का अस्तित्व ,,,पूरे मुल्क में खोद डालो कब्रें ...दीपक की क्या औकात ...कि रोक सके अँधेरों की हैवानियत ।

असली वाली आज़ादी के लिये यहाँ क्लिक करें ..   https://www.facebook.com/naramachandra.pai/videos/1212346585628594/

रविवार, 19 जनवरी 2020

नागरिकता पर टकराते नागरिक


वैचारिक क्षमता मनुष्य के लिये प्रकृति की एक अनुपम देन है । किंतु वैचारिक भिन्नताओं ने इस देन को मनुष्य के लिये श्रापित कर रखा है जिसके कारण वैचारिक टकराव पूरी दुनिया के लिये सदा से गम्भीर समस्या रही है । आधुनिक शिक्षा ने वैचारिक भिन्नताओं को और भी धारदार बनाने में बड़ी सक्रिय भूमिका निभायी है । यह धार पारस्परिक टकराव को और भी जटिल बनाती है और हम प्रायः आसन्न विश्वयुद्ध से सशंकित हो उठते हैं । मुश्किल तब और बढ़ती है जब शिक्षित वर्ग अतीत की घटनाओं से कुछ न सीखने की हठ करने और  वर्तमान घटनाओं की उपेक्षा करते हुये भविष्य की मनमानी तस्वीर बनाने के अपने विचार पर अड़ जाता है ।
मैं भारतीय नागरिकता संशोधन कानून पर छिड़ी एक अनावश्यक और घटिया बहस की बात कर रहा हूँ । लोग इस कानून और राष्ट्रीयनागरिकता पंजी के विरोध में सड़क पर उतर आये हैं । पूरे देश में हिंसा और आगजनी हो रही है, पुलिस पर पथराव हो रहे हैं, लोग हिंदुओं की कब्र खोदने और इस धरती से हिंदुओं का नाम-ओ-निशान मिटा देने के नारे लगा रहे हैं । इन घटनाओं को अंजाम देने वाली सक्रिय भीड़ को यह नहीं पता कि वे यह सब क्यों कर रहे हैं । बस, कुछ लोगों द्वारा उनसे कहा गया है और वे यह सब कर रहे हैं । कहने वाले लोग विशेष वर्ग के दूरदर्शी हैं जिन्हें वैचारिक पोषण देने के लिये उठ खड़े हुये हैं शिक्षित लोग, साहित्यकार, फ़िल्मकार, शिक्षार्थी और शिक्षक । ये वे लोग हैं जो भारत के अतीत को नकारते हुये बड़े शातिराना तरीके से हिंदुस्तान से हिंदुओं का अस्तित्व समाप्त कर देने पर तुले हुये हैं । ये लोग इस तथ्य को सिरे से नकार रहे हैं कि भारत विभाजन के बाद से पृथक हुये देशों में भारतीय मूल के हिंदुओं और उनके अन्य मतावलम्बियों को धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाता रहा है, उनके साथ बलात यौनदुष्कर्म और धार्मिक हिंसा होती रही है जिसके कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश में उनकी जनसंख्या आनुपातिक रूप से कम होती रही है । वे गुलदस्ते की ख़ूबसूरती और गंगा-जमुनी संस्कृति का बखान करते हुये मुस्लिमों के पक्ष में खड़े होकर हिंदुओं के साथ होने वाले षड्यंत्र को बनाये रखना चाहते हैं – यह जानते हुये भी कि मुस्लिम ज़िहादियों ने पूरी दुनिया में अपने आतंक को बनाये रखने में अग्रणी भूमिका निभायी है और वे ज़ेव्स, यहूदियों, पारसियों, यज़ीदियों एवं कुर्द आदि अन्य धार्मिक समुदायों को अपनी हिंसा का लक्ष्य बनाते रहे हैं । ये अतिबुद्धिजीवी और आत्मघाती लोग सीरिया की तबाही के कारणों पर चर्चा भी नहीं करना चाहते । सीरिया ही नहीं, इससे पहले पर्सिया और अखण्ड भारत के अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर घाटी में होते रहे जातीय जनसंहार पर भी चुप रहना चाहते हैं । निश्चित ही यह सब हिंदुओं के अस्तित्व के लिये गम्भीर चुनौती है । चुनौती देने वालों में गज़वा-ए-हिंद के गाज़ियों के साथ वे शिक्षित हिंदू भी सम्मिलित हैं जो धर्मनिरपेक्षता की ढाल लेकर मुस्लिमों के पक्ष में हिंदुओं के ख़िलाफ़ मैदान में उतर चुके हैं । ये धर्मनिरपेक्ष लोग मुसलमानों के लिये तो धार्मिक आधार पर चिंतित होते हैं किंतु धार्मिक आधार पर ही हिंदुओं के साथ होने वाले धार्मिक उत्पीड़न को बनाये रखना चाहते हैं । पुरानी शैली में कहूँ तो राक्षसी मानसिकता अपनी सम्पूर्ण विद्वता के साथ सीता के अपहरण के लिये सदा ही प्रयासरत रही है ...आज भी है ।
नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय-नागरिकता पंजीयन दोनों अलग-अलग विषय हैं जिन्हें विरोधियों द्वारा एक साथ मिलाकर पेश किया जा रहा है । दूसरी बात यह कि नागरिकता संशोधन कानून विदेशी भारतवंशियों को नागरिकता देने के लिये है, भारत में रह रहे नागरिकों की नागरिकता छीनने के लिये नहीं, जैसा कि दुष्प्रचार किया जा रहा है । आज जब विदेशी अल्पसंख्यक भारतवंशियों को भारत की नागरिकता देने के वादे को पूरा किया जा रहा है तो हमें यह स्मरण कर लेना चाहिये कि भारत विभाजन के समय मोहनदास करमचंद गांधी और समकालीन अन्य ज़िम्मेदार नेताओं द्वारा खंडित देश के विदेशी हो चुके अल्पसंख्यकों को, वे जब चाहें तब भारत आ सकते हैं, के वादे के साथ भरोसा दिलाया था ।   
नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों का एक अज़ीब सा तर्क है कि वे इसका विरोध केवल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस संशोधन के द्वारा धार्मिक आधार पर भेदभाव करते हुये मुस्लिमों को वंचित कर दिया गया है । मैं इसे कुतर्क ही कहना चाहूँगा, जैसे कोई अमीर आदमी यह कहे कि वह कुपोषित बच्चों को दूध देने का विरोध केवल इसलिये कर रहा है क्योंकि सरकार उस अमीर आदमी के बच्चे को भी यही सुविधा क्यों नहीं दे रही है ।  
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर की जा रही काँव-काँव में इसे मनुवादी घातक प्रभाव, दलित विरोधी मानसिकता, समाज विध्वंसक कार्यवाही, देश विभाजनकारी भूमिका और हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिये किये जा रहे षड्यंत्र की संज्ञा दी जा रही है । यह अद्भुत है कि इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना पर किसी को ऐतराज़ नहीं होता किंतु हिंदुस्तान में हिंदू राष्ट्र की कल्पना से ही लोग चीखना शुरू कर देते हैं ।
नेताओं, सेलिब्रिटीज़ और शिक्षित लोगों द्वारा यह लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा है कि नागरिकता संशोधन कानून लागू होने से मुसलमानों और दलितों को भारत छोड़ना पड़ेगा, भ्रष्टाचार बढ़ जायेगा और ग़रीबों पर टैक्स की चोट पड़नी शुरू हो जायेगी । यानी हमारे देश के लुछ शिक्षित लोग आम जनता और पूरी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि यदि आम के वृक्ष नहीं काटोगे तो लीची के वृक्ष का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, धरती पर केवल आम ही आम दिखायी देंगे, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ जायेगी और गेहूँ की फसल की जान निकल जायेगी । यहाँ बड़े शातिराना तरीके से दलितों को हिंदुओं से पृथक किए जाने की अवसरवादिता का भी एक नमूना दिखायी देता है ।
कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने पूरे विश्वास के साथ यह भी कह दिया कि यदि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान के करोड़ों नागरिकों को भारत की नागरिकता दे दी जायेगी तो हमारे हिस्से के रोजगार के अवसर समाप्त हो जायेंगे और हमारे लिये भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी । यह उतना ही अच्छा कुतर्क है जितना अच्छा यह कि यदि किसी मरीज के नासूर का इलाज़ करना शुरू कर दिया जायेगा तो देश के हर नागरिक को अपना सीज़ेरियन ऑपरेशन करवाना पड़ेगा जिसका दुष्प्रभाव यह होगा कि धरती से मेढकों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, चिड़ियाँ उड़ना बंद कर देंगी और तितलियों के पंख जल जायेंगे ।
इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिये कि भारत का बेड़ा गर्क करने वालों की भीड़ में उच्च शिक्षितों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जिसके कारण “शिक्षित” और “बुद्धिजीवी” जैसे शब्द पिछले कुछ दशकों से गालियों के प्रतीक बन गये हैं ।
हे आत्मघाती अतिबुद्धिजीवी शिक्षित लोगो! भारत का आम नागरिक जानना चाहता है कि आपकी चिंताओं के केंद्र में केवल मुसलमान ही क्यों है, यज़ीदी, ज़ेव्स, कुर्द या कश्मीरी पंडित क्यों नहीं है? आपकी धर्मनिरपेक्षता ठहरी हुयी क्यों है, उसमें तरलता क्यों नहीं है? आपको हिंदुओं के साथ होने वाले अत्याचार दिखायी क्यों नहीं देते? आपको हिंदू लड़कियों के साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश में होने वाली यौनहिंसा की क्रूरता और बलात धर्मांतरण की पीड़ा व्यथित क्यों नहीं करती?
भारत के सुषुप्त नागरिको! हमें धार्मिक सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता के बीच पसरे विस्तृत मरुस्थल को देखना होगा । हमें धर्मनिरपेक्षता के पक्षपातपूर्ण छल को समझना होगा । हम किसी भी धर्म के अस्तित्व को समाप्त किये जाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं और यह चाहते हैं कि सभी समुदाय अपने-अपने विश्वासों और मतों की तो रक्षा करें किंतु अन्य लोगों के विश्वासों और मतों को उपहत करने का हठ छोड़ दें । अपने निजी विश्वासों के साथ स्वतंत्रता की एक सीमा होनी ही चाहिये जिससे दूसरों के विश्वासों को आघात न पहुँचे । ध्यान रहे, हमारी असीमित स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित ही नहीं करती बल्कि बंदी बना लेती है ।        

और खरी बात यह कि लोकतंत्र की रक्षा के लिये तैनात व्यवस्था के पास यदि दण्ड की लाठी नहीं होगी तो लोकतंत्र को अलोकतंत्र बन जाने से कोई नहीं रोक सकेगा ।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

अप्सरायें और मेढक


तारों से
अब रोशनी नहीं मिलती,
गर्मी बहुत है फ़िज़ाँ में,
पता नहीं क्यों फिर भी
इस मुल्क में
अब बर्फ़ नहीं गलती ।

वे कलाकार थे
अब सौदागर हो गये हैं
कला भी बेचते हैं
और आदर्श भी
मौका मिले
तो मुल्क भी बेच देंगे
वे सौदागर हैं
सिर्फ़ सौदागर ।

अप्सराएँ भी कब नाची हैं भला
किसी गाँव की चौपाल पर
वे तो आरक्षित हैं
केवल देवलोक में नाचने के लिए ।
अप्सराओं से क्या आशा
वे थीं ही कब हमारी
जो अब होंगी ।

शादी होनी थी, नागरिकता संशोधन कानून की
रिश्ता तय हुआ ही था
कि कुछ उटकाने वाले आ गये
उटकाने लगे रिश्ता  
...करने लगे
यहाँ वहाँ दंगे ।
कुछ आगजनी हुयी
कुछ मौतें हुयीं
कुछ घर तबाह हुये
कुछ मुल्क तबाह हुआ
हल्ला हुआ
तो निकल आये मौसमी मेढक
जो निकलते हैं हरबार
सिर्फ़
अपने मतलब के मौसम में ही ।
टर्राने लगे मेढक
...एक ही राग में
...ले के रहेंगे आज़ादी ।

नागरिकता कानून फेक दिया नेपथ्य में
...सामने ले आये अ-नागरिकता कानून
...फैलाने लगे अ-राजकता
गाने लगे लाल सलाम लाल सलाम ।


बहुत पढ़े लिखे हैं
मेढक मेरे देश के
...कुछ विद्वान हैं
...कुछ गंधर्व हैं 
ये अपने ही मौसम को जानते हैं,
ये अपने ही राग को गाते हैं  
ये नहीं मानते
भारत के छह मौसम,
ये नहीं गाते राग पहाड़ी  
चीखते हैं सिर्फ़
गंगा-जमुनी तहज़ीब
...जो नहीं होती कोई तहज़ीब ।
किंतु मैं
शिकायत करूँ भी तो किससे?
धधक उठे हैं चिराग
घर के ही कुछ कोनों में ।
आओ! हम आग बुझाएँ  
अँधेरों से तो बाद में भी निपट लेंगे,
पहले घर तो बचाएँ ।