गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

आंदोलन या सत्ता का युद्ध

सत्ता के लिए युद्ध आज भी होते हैं, पर तलवारों से नहीं, स्वयं राजा भी अब युद्ध में प्रत्यक्षतः कहाँ दिखाई देते हैं! सत्तालोभियों के क्रीतदास पत्थरों, लाठियों, लोहे की छड़ों, तमंचों और पेट्रोल बम से घात लगाकर युद्ध करते हैं । निहत्थी निरीह प्रजा मारी जाती है, घायल होती है और उनकी सम्पत्तियाँ जलाकर भस्म कर दी जाती हैं । इन युद्धों को भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धरना, विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन कहा जाता है । युद्ध का नाम और तरीका बदल गया है । इस युद्ध में लड़ने वाला दूसरा पक्ष नहीं होता, उसके स्थान पर निहत्थे आमनागरिक होते हैं । युद्ध एकपक्षीय होता है जिसे रोकने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बल डिफ़ेंसिव युद्ध करते हैं ।  

दिल्ली कूच पर निकले ट्रैक्टर-सवार किसान वास्तव में खेतों में पसीना बहाने वाले किसान हैं ही नहीं, उनके चमचमाते हुए नये और मूल्यवान ट्रैक्टर्स उनके किसान होने की घोषणा करते हैं पर साधारण किसान को इतनी फ़ुरसत ही कब मिलती है कि महीनों तक अपने खेतों से दूर रहकर प्रदर्शन करें और वातानुकूलित मूल्यवान टेंट्स में कबाब-बिरियानी के व्यय का बोझ उठा सकें! फिर कौन हैं ये लोग?

कनाडा से गुरमीत सिंह पन्नू ने विरोध-प्रदर्शनकारियों से हिंसक होने, अराजकता फैलाने और प्रधानमंत्री की हत्या करने का आह्वान किया है । किसानों का यह कैसा विरोध-प्रदर्शन है?   

आंदोलन के नाम पर पञ्जाब में रेल यातायात को बाधित कर दिया गया है, पिछली बार महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे ने सारी व्यवस्थाओं को अस्तव्यस्त करते हुये सिंधुसीमा पर क्या कुछ् नहीं किया! क्या विरोध और प्रदर्शन के नाम पर किसी को यह अधिकार है कि वह सामान्य जनजीवन की गतिविधियों को बाधित कर दे!

किसान-आंदोलन के नाम पर पिछली बार टिकैत ने जाटों और सिखों को लेकर जिस तरह का आंदोलन किया उसमें करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये थे । ग़रीब किसान के पास इतने रुपये कहाँ से आते हैं ?

*मोदी की कुंडली में कालसर्प योग*

क्या आने वाले चुनाव में नरेंद्र मोदी की हार कांग्रेस की प्रियंका नेहरू गांढी बढेरा के हाथों होना तय है? कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के अनुसार नरेंद्र मोदी की जन्मकुंडली में कालसर्प दोष है इसलिए उनकी पराजय प्रियंका के हाथॉं होगी । कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, फिर कालसर्पयोग का और क्या परिणाम हो सकता है!

यूँ, मोदी जैसे लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग होना ही चाहिए । एक ओर कतर में मोदी को वहाँ के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया, दूसरी ओर कनाडा से पन्नू ने मोदी को मार डालने का संकल्प किया, यह है कालसर्पदोष । जिस मोदी को पिछली बार जाट और सिख महिलाओं ने “हाय-हाय मोदी मर जा तू” गा-गाकर छातियाँ पीटी थीं उसी मोदी का नाम इस बार नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया है, यह है कालसर्पदोष । मोदी ने अबू धाबी में हिन्दूमंदिर का उद्घाटन किया फिर कतर जाकर नौसैनिकों को मुक्त करवा लिया इधर रौल विंची ने मोदी को अमर्यादित शब्दों के साथ जमकर कोसा, यह है कालसर्पदोष । कालसर्पदोष में मुकाबला फूल और काँटों का नहीं, फूल और भालों का है, वह भी जहर बुझे । ऐसा ही कालसर्पदोष दो-चार और नेताओं की कुण्डली में होता तो भारत का भविष्य उज्ज्वल हो जाता ।

*मज़हब के ख़िलाफ़*

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी सहयोग से संयुक्त-अरब-अमीरात के अबूधाबी में हिन्दू मंदिर का निर्माण हुआ तो भारत सहित पाकिस्तान के कई मुल्लों-मौलवियों ने विरोध किया, कहा- “यह हमारे मज़हब के ख़िलाफ़ है, किसी मुस्लिम देश में हिन्दूमंदिर नहीं बनना चाहिए” ।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ तो भारत सहित पाकिस्तान के कई नेताओं ने इसका विरोध तो किया ही, यह भी कह दिया कि –“इंशा अल्लाह एक दिन जब हमारी हुकूमत होगी तब हम इस मंदिर को गिरा देंगे और बाबरी मस्ज़िद को फिर से बना देंगे”।

भारत के बहुत से लोग समान नागरिक अधिकार का विरोध कर रहे हैं, वे भारत में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग नियम और अधिकार चाहते हैं । ऐसी विचारधारा स्वतंत्र कबीलों की तो हो सकती है पर किसी सम्प्रभु देश की नहीं । यह अराजकता, निरंकुश स्वेच्छाचारिता और अ-राष्ट्रवाद का स्पष्ट संकेत है । क्या मज़हबी उसूलों के नाम पर एक बार फिर भारतविभाजन की तैयारी हो रही है? कब तक होता रहेगा भारत विभाजन, और क्यों?   

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

राम जी व्यस्त हैं

*राम जी व्यस्त हैं*

 मंदिर तो बन गया, प्राणप्रतिष्ठा भी हो गयी और इसके साथ ही राम जी की व्यस्तता भी बढ़ गयी है । आजकल वे रूठे राजनेताओं को निमंत्रणपत्र देने के लिये निकले हुये हैं ।

रूठे राजनेताओं ने राम जी को धमकी दे दी है कि यदि उन्हें अपना अस्तित्व बचाना है और माननीय नेताओं से अपने दर्शन करवाने हैं तो उनके राजमहल आकर या सपने में आकर निमंत्रण दें अन्यथा उनके दर्शन नहीं किये जायेंगे ।

..और बनवाओ अपना मंदिर! बैठे-ठाले काम बढ़ गया न! अब जाओ घर-घर माननीयों को न्योता देने ।

*अविश्वसनीय होते विधायक*

राजनीतिक दलों के मालिक अपने-अपने विधायकों को समय-समय पर दृष्टिबंध करते रहते हैं, कभी अपने महल में तो कभी अन्य प्रांत के किसी पंचसितारा होटल में । दृष्टिबंधन में होने वाले व्यय की चिंता किसी को नहीं होती, न मालिक को और न उस जनता को जिनका पैसा इस तरह उड़ाया जाता है ।

ढोल पीट-पीट कर यह सत्य प्रकाशित किया जा रहा है कि माननीय विधायकगण अपने मालिकों की दृष्टि में अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं ।

लोकतंत्र की रक्षा के ठेकेदारों के सामने “दृष्टिबंधन” जैसे अलोकतांत्रिक उपायों के अतिरिक्त अब कुछ बचा ही नहीं है । प्रजा बहुत भोली है जिसे अभी भी यह विश्वास है कि विधायकगण जनता के कार्यों के लिये बहुत विश्वसनीय हैं और इस बार उनका भला अवश्य करेंगे । प्रजा मतदान करती रहेगी ...उन्हीं के पक्ष में ...सदा की तरह ।

*आग है कि बुझती ही नहीं*

“अब एक साथ रहना सम्भव नहीं, हमें अपने लिए एक अलग देश चाहिए” –कहकर भारत विभाजन करने वाले लोग आज भी भारत में क्यों हैं? अब वही लोग फिर कह रहे हैं कि उन्हें भारत की नीतियों-रीतियों और न्यायालय के निर्णयों का पालन स्वीकार नहीं । यदि उन पर यह सब थोपा गया तो वे इसे “बर्दाश्त नहीं करेंगे”। स्पष्ट है कि गजवा-ए-हिंद के लिये अब उन्हें पूरा भारत चाहिये ।

शांत रहने वाले उतराखण्ड में आग यूँ ही नहीं लगी । भारत को मध्य एशिया बना देने की चाहत रखने वाले लोग पूरे देश को जला देने के लिए उतावले हैं । हमें यह स्वीकार करना होगा कि हिन्दूराष्ट्र की सहिष्णु और समावेशी अवधारणा विभाजनकारी लोगों के असैद्धांतिक विचारों और उद्देश्यों के विरुद्ध है । वे जिस भी देश में जाते हैं वहाँ की मूल अवधारणाओं को समाप्त कर अपनी अवधारणायें थोप देने के लिए हिंसा करते हैं । मौलिकता का विरोध, असहिष्णुता, हिंसा और लूटपाट ही उनका जीवन है, यही उनके जीवन का लक्ष्य है । उदारवादी माने जाने वाले यूरोप ने समझ लिया है, भारत को भी समझ लेना चाहिए । सनातन परम्परा तुम्हारा विरोध नहीं करती किंतु तुम हमारा विरोध करो यह हमें स्वीकार नहीं ।

भारत की तरह अब यूरोप भी जलने लगा है, अफ़्रीका के कुछ देश तो पहले से जल ही रहे थे । अब और क्या समझना शेष है? हम जानते हैं कि कुछ समुदाय सदा से हिंसक रहे हैं, हर युग में रहे हैं और हर युग में उनके विरुद्ध रचनात्मक शक्तियों को उठकर खड़े होना पड़ा है । असुर-दानव-राक्षस आदि विचारों का संहार किसी को तो करना ही होगा, जो उठकर आगे बढ़ेगा वह मनुष्य से ऊपर उठकर देव हो जायेगा । हममें से कितने लोग देव होने के लिये प्रस्तुत हैं ...और कितने लोग किसी देवशक्ति का साथ देने के लिये संकल्पित हैं ? …इसका उत्तर हमें बताता है कि यह आग अभी बुझने वाली नहीं है । हमारे बीच अभी कई दशानन हैं जो अपने ब्राह्मणधर्म को छोड़कर राक्षसधर्म अपना चुके हैं । ये राक्षस ही हमारे शांति और समृद्धता के सबसे बड़े बाधक हैं जो भारत में लूटमार के लिए आयातित साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ खड़े दिखायी देते हैं ।       

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024

कैंसर से बचाव के लिए टीका

वित्तमंत्री जी की घोषणा के अनुसार 9 से 14 वर्ष की बच्चियों को सर्वाइकल कैन्सर से बचाने के लिये एण्टी एच.पी.वी. टीका लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा येगा । निजी चिकित्सालयों में इस टीके की एक मात्रा के लिये चार हजार रुपये देने होते हैं । बच्ची को छह महीने के बाद एक मात्रा और लेनी होगी, यानी पूर्ण टीकाकरण के लिये आठ हजार रुपये । सरकार इस टीके को इम्म्यूनाइजेशन कार्यक्रम में सम्मिलित करेगी ।

टीकाकरण राजकाज का एक अंश है । यदि जीवन के सभी पक्षों से धर्म को अलग न किया गया होता तो आज इस राजकर्म की आवश्यकता नहीं पड़ती । गाँव में आग लगने पर उसे बुझाने का काम शासन करता है, “गाँव में आग न लगे” ऐसी व्यवस्था करने का काम धर्म करता है ।

एण्टी एच.पी.वी. टीका पश्चिमी समाज के लिये आवश्यक है जहाँ जीवनशैली और शिक्षा पर धर्म का कोई अंकुश नहीं होता ।

हम पश्चिमी देशों का अनुकरण करते हैं इसलिये इन टीकों की आवश्यकता हमें भी होने लगी है । वास्तव में जो लोग ह्यूमन पैपिलोमा वायरस से संक्रमित हो जाते हैं उन्हें बाद में सर्वाइकल कैंसर होने की आशंकायें होती हैं । ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का संक्रमण यौनसम्पर्कों से एक-दूसरे में होता है । यदि हमारी जीवनशैली पर पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर सनातनधर्म का प्रभाव होता तो न तो हम ह्यूमन पैपिलोमा वायरस से संक्रमित होते और न उसके कारण सर्वाइकल कैंसर होता । यह भी वैज्ञानिक सत्य है कि संक्रमण से होने वाले रोगों को धर्मप्रेरित मर्यादापूर्ण जीवनशैली से सीमित किया जा सकना सम्भव है ...और यही निरापद है ।

धार्मिक परम्परायें हमें मर्यादापूर्ण जीवनशैली के लिये प्रेरित करती हैं जबकि धर्म-विरत राजकर्म हमें दोषपूर्ण जीवनशैली के लिये शिथिलता का एक अवसर उपलब्ध करवाते हैं । नौ साल की बच्चियों को नवरात्रि में दुर्गा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा किये जाने वाले देश में हमारे विकृत-यौन सम्बंधों के कारण अब उन्हें एण्टी-ह्यूमन-पैपिलोमा वायरस के दो टीके लगवाने होंगे ।

क्या वैचारिक और अध्यात्मिक दृष्टि से हम इतने विपन्न हो गये हैं कि अब अपनी जीवनशैली को भी विकृत-भोग से बचा नहीं पा रहे हैं! यदि यह हमारा अध्यात्मिक और सामाजिक पतन है तो क्या इसे रोकने के लिये हमारे पास टीकाकरण के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है? यह टीका हमारी बच्चियों को अधिकतम दस वर्ष तक ही सुरक्षाकवच उपलब्ध करवा सकता है, फिर इसके बाद?

टीका तो वह जुगाड़ है जो आपतकाल में समाधान के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, समस्या का स्थायी समाधान तो स्वयं हमें ही करना होगा । सिगरेट पीने के बाद लौंग-इलायची मुँह में रख लेने से प्राप्त सुविधा हमें बारम्बार सिगरेट पीने के लिये अवसर उपलब्ध करवाती है, सिगरेट से मुक्ति का उपाय नहीं । ह्यूमन-पैपिलोमा-वायरस का टीका भी हमें स्वच्छंद यौनसम्बंधों के लिये बार-बार अवसर उपलब्ध करवाता है, उससे मुक्ति का अवसर नहीं ।

सोमवार, 29 जनवरी 2024

एक व्यक्ति चार आत्महत्यायें

“अस्सलाम, नमस्कार, वणक्कम, सतश्री अकाल और गुड-मॉर्निंग” के साथ अपनी बात प्रारम्भ करने वाली पाकिस्तानी टीवी एंकर आरजू काज़मी ने आत्महत्या कर ली । भारतीय दर्शकों के लिये उनका “भेजा फ़्राई” नाम से एक यू-ट्यूब चैनल भी है । गौरव आर्या जैसे भारत के कई राष्ट्रवादियों के साथ आरजू को कई वार्ताओं में देखा जा सकता है जिनमें वे भारत की प्रशंसा के साथ पाकिस्तान की आलोचना करती हुयी दिखायी देती हैं । उन्हें भारत के कई पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के साथ वार्ताओं में देखा आ सकता है, आज भेजा फ़्राई की आरजू काज़मी ने भी आत्महत्या कर ली । पाकिस्तान में एक और आरजू काज़मी है, उसने भी आत्महत्या कर ली ।  

सोशल मीडिया पर भारत के लोग पाकिस्तान के जिन बुद्धिजीवियों से प्रभावित होते रहे हैं, उनमें से एक आरजू काज़मी भारतीय दर्शकों में बहुत लोकप्रिय हुयी हैं । उनकी साफगोई के लिये आप सबकी तरह मैं भी उनका प्रशंसक रहा हूँ । विभाजन के समय उनके बाबा इलाहाबाद के किसी गाँव से पाकिस्तान चले गये थे । विशेष अवसरों पर उन्हें अपनी दादी या नानी की लाल रंग की एक साड़ी पहने हुये देखा जा सकता है । भारत से अपनी जड़ें जोड़ने वाली आरजू अब नहीं है ।  

राजस्थान के अरविंद सहारन न्यूजीलैण्ड में प्रवासी हैं और शांति एवं भारत-पाक सम्बंधों पर काम करते हैं । अरविंद के एक वीडियो को देखने के बाद निश्चित हो गया कि आरजू अब नहीं रहीं । मुझे आश्चर्य से अधिक दुःख हुआ, आरजू काज़मी दो हत्यायें और चार आत्महत्यायें करने की दोषी हैं । घटनाक्रम बताने से पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि डाकू खड्ग सिंह कैसा भी क्यों न रहा हो पर उसने बाबा भारती को निराश नहीं किया । आरजू ने बाबा भारती के विश्वास के साथ-साथ डाकू खड्ग सिंह की भी हत्या कर दी है ।   

पाकिस्तान की ही एक और एंकर हैं अमारा इफ़्तिखार । अरविंद सहारन की बात की पुष्टि के लिये मुझे अमारा इफ़्तिखार के चैनल पर जाना पड़ा, अरविंद की बात सच निकली ।

कुछ दिन पहले आरजू ने दाउद इब्राहिम को विष दिये जाने के कारण उसकी मृत्यु की आशंका प्रकट करते हुये बताया था कि वे अपने सूत्रों से इस समाचार की पुष्टि करने का प्रयास कर रही हैं । अरविंद ने आरजू के इस समाचार का खण्डन किया और बताया कि आरजू भारतीय दर्शकों को आकृष्ट करने के लिये इस तरह के झूठे वीडियोज़ बनाती हैं । अरविंद ने यह भी बताया कि आरजू पाकिस्तानी टीवी पर भारत के विरुद्ध जमकर आग ही नहीं उगलतीं बल्कि अमर्यादित भाषा का भी प्रयोग करती हैं । वहीं भारतीय दर्शकों के लिए उनके अपने यू-ट्यूब “भेजा फ्राई” पर उन्हें भारत का पक्ष लेते और पाकिस्तानी शासन की कटु आलोचना करते हुये देखा जाता है । आरजू ने अभिनंदन के लिए कहा कि “उनका पायलट तो यहाँ से खूब जूते खा के गया है” । एक अन्य कार्यक्रम में आरजू ने मोदी को “गुजरात का कसाई” सम्बोधित किया है ।

एक्सपोज़ होने के बाद आरजू ने अरविंद पर व्यक्तिगत और पारिवारिक आरोप लगाने प्रारम्भ कर दिये, वह भी अमर्यादित भाषा और अपमानजनक शब्दों के साथ । आरजू की भाषा सुनने के बाद मुझे आश्चर्य से अधिक दुःख हुआ । भेजा-फ़्राई वाली एक हँसमुख लड़की इतनी उग्र और अमर्यादित हो सकती है!

पाकिस्तानी दर्शकों के लिये भारत को गरियाने वाली आरजू ने वर्चुअल आत्महत्या कर ली । भारतीय दर्शकों के लिये पाकिस्तान का मज़ाक बनाने वाली आरजू ने भी आत्महत्या कर ली । बाबा भारती के विश्वास को तोड़ने वाली आरजू भी मर गयी । डाकू खड्ग सिंह के चरित्र की हत्या करने वाली आरजू भी मर गयी । आरजू ने मानवीय मूल्यों की भी हत्या कर डाली है ।

पाकिस्तान की अमारा इफ़्तिखार और भारत की अम्बर ज़ैदी ने भी आरजू के कई मुखौटों पर दुःख व्यक्त किया है । इससे भी बड़े दुःख की बात यह है कि आरजू ने अरविंद के एक भी आरोप का उत्तर देने के बजाय केवल व्यक्तिगत आरोपों की बौछार की है ।

आरजू काज़मी ! आज तुम भारत के लाखों दर्शकों की दृष्टि में मर चुकी हो । तुमने अपने सभी मुखौटों के साथ एक-एक कर कई बार आत्महत्यायें कर डाली हैं ।

बाबा भारती से अधिक दुःखी तो डाकू खड्ग सिंह है जिसके चरित्र की आरजू ने हत्या कर दी । दो हत्यायें और चार आत्महत्याओं की दोषी आरजू काज़मी को आज मैंने अनसब्स्क्राइब कर दिया है । इस प्रकार की आत्महत्यायें बहुत त्रासदीपूर्ण होती हैं ।

पाकिस्तान ! तुम अपने विश्वासघाती बुद्धिजीवियों के कारण ही दुनिया भर में कहीं मुँह दिखाने लायक भी नहीं रहे हो ।

रविवार, 28 जनवरी 2024

झूठों का महिमा मण्डन, सच्चों का सर तन से जुदा

सरकारों द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों की सत्यता आपके अंदर वितृष्ण उत्पन्न कर सकती है । इस तरह के पुरस्कार पाने वालों के प्रति विश्लेषकमन में एक प्रतिकूल धारणा उत्पन्न हो सकती है और वह व्यक्ति आपकी दृष्टि में गिर सकता है ।

तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सरकार के मंत्री एम.के.स्टालिन ने गणतंत्र दिवस पर *आल्ट न्यूज* की आई.टी. सेल में काम करने वाले मोहम्मद जुबैर को “फर्ज़ी समाचारों के कारण समाज में होने वाली हिंसा को रोकने में मदद” के लिये सम्मानित किया है जबकि सत्य यह है कि वह व्यक्ति फ़र्जी समाचार फैलाकर सामाजिक हिंसा को बढ़ाने का काम करने और सनातनविरोधी गतिविधियों में दक्ष है । इन कुकृत्यों के लिये वह *फ़ैक्ट चेक* का दावा करके सनातन और हिन्दुओं से सम्बंधित सही समाचारों को झूठ सिद्ध करने के लिए आईटी का सहारा लेता है जिनके लिये वह कभी-कभी तो अच्छी खासी फ़ीस भी वसूल करता है । एक विशेष ट्वीट के लिए बारह लाख और एक अन्य ट्वीट के लिए दो करोड़ रुपये फीस लेने का आरोप स्वीकार करने वाले जुबैर को मात्र बीस हजार रुपये के बॉण्ड पर न्यायालय द्वारा जमानत दे दी जाती है जिससे जुबैर जैसे लोगों का दुस्साहस बढ़त है और वे *सच को झूठ एवं झूठ को सच* सिद्ध करने के राष्ट्रविरोधी कुकृत्यों में लिप्त बने रहते हैं । हमारे न्यायालय इसीलिए अपने प्रति विश्वास और सम्मान की हत्या स्वयं ही करते जा रहे हैं । किसी भी देश के लिए यह सर्वाधिक घातक स्थिति है ।

मुख्यमंत्री स्टालिन ने जुबैर को गणतंत्र दिवस के अवसर पर वर्ष 2024 के लिये कोट्टई अमीर सद्भावना पुरस्कार से यह उल्लेख करते हुये सम्मानित किया है कि “उनका काम फर्ज़ी समाचारों के कारण समाज में होने वाली हिंसा को रोकने में मदद करता है”। जबकि वास्तविकता यह है कि उसके ऊपर 30 से भी अधिक फर्ज़ी समाचार प्रसारित करने का आरोप लगाया जा चुका है । नूपुर शर्मा के बारे में जुबैर द्वारा फैलाये गये झूठ के बाद पूरे देश में *ग़ुस्ताख़-ए-रसूल की एक ही सजा, सर तन से जुदा सर तन से जुदा* करने की धमकियों की बाढ़ सी आ गयी थी और राजस्थान में कई हिन्दुओं की ईशनिंदा के नाम पर हत्यायें कर दी गयीं । तमिलनाडु सरकार जुबैर को दिये गये प्रशस्तिपत्र में यह उल्लेख करके कि “उनका काम फर्ज़ी समाचारों के कारण समाज में होने वाली हिंसा को रोकने में मदद करता है” जुबैर को सारे आरोपों से मुक्त कर देने की घोषणा करती है ।

क्या यह सच नहीं है कि हमारे देश में कई देश बन गये हैं जो भारत के विरुद्ध सांस्कृतिक आक्रमण करते रहते हैं । इन आक्रमणों से स्वयं की और देश की रक्षा करने का एक ही उपाय है – झूठ का सशक्त विरोध करते हुये सच को सच कहने का साहस ।

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

बार-बार राष्ट्रद्रोह

अयोध्या में श्रीरामलला मंदिर का इतिहास भारत का इतिहास है जो हमें त्रेतायुग के आदर्श मानवमूल्यों में ले जाता है । जो लोग इस इतिहास से घृणा करते हैं और इसे स्वीकार नहीं करना चाहते उन्हें हम भारत के प्रति निष्ठावान कैसे मान सकते हैं! ऐसे लोगों का भारत के विकास में क्या योगदान हो सकता है सिवाय विध्वंस के!

...और अब जबकि हमने सन् 1528 में हुये अपने पराभव के उस कलंक को 9 नवम्बर 2019 को मिटाकर अपने प्राचीन गौरवमयी इतिहास को पुनः स्थापित कर दिया है तो एक बार फिर शोएब जमई और ओवैसी जैसे विषाक्त विचारधारा वाले लोग फुफकारने लगे हैं । आश्चर्य है, इन विषाक्त लोगों पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं होती, इन्हें निरंकुश क्यों रहने दिया गया है?

कल अयोध्या में प्राणप्रतिष्ठा हुयी, पूरे देश में दीपावली मनायी गयी, मुम्बई में उत्साही लोगों ने जय श्रीराम का उद्घोष करते हुये मीरारोड-भायंदर से होते हुये एक शोभायात्रा निकाली जिसपर राष्ट्रद्रोहियों की हिंसक प्रतिक्रिया देखने को मिली । भारत में हर बार ऐसा क्यों होता है ? बात-बात में संविधान की दुहाई देने वाले धूर्त कहाँ हैं?  

समाचार है कि कल भायंदर में शोभायात्रा पर पथराव किया गया, गाड़ियों को आग लगा दी गयी और विष्णु जायसवाल के गाल पर चाकू से आक्रमण किया गया । अभी तक तेरह लोगों को बंदी बना लिया गया है जिनमें चार किशोरवय भी हैं । किशोरों और लड़कियों को आगे करके विध्वंस करने की इस दुष्टनीति को रोकने के लिए हमारी केंद्रीय और राज्य सरकारें कब तक भीरु बनी रहेंगी?  

पाकिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यकों द्वारा इस तरह की घटना की कल्पना भी नहीं की जा सकती । प्रश्न उठता है कि इतनी जघन्यता और राष्ट्र को बारबार चुनौती देने वाली घटनायें भारत में ही क्यों होती हैं ? सन् 1946 से 1948 तक का इतिहास बताता है कि भारत के कम्यूनल दुर्भाग्य का बीजारोपण तत्कालीन दो महान लोगों द्वारा किया गया और बाद में मनमोहन सरकार द्वारा लिये गये कुछ निर्णयों ने इसे पल्लवित-पुष्पित करने का काम किया ।

दुष्टों के दुस्साहस और शोएब जमई एवं ओवेसी जैसे कुछ लोगों की विध्वंसक चेतावनी को देखते हुये अयोध्या जाने वाले दर्शनार्थियों को धैर्य से काम लेना होगा । ध्यान रखिए, फ़िदायीन आक्रमणकारी भीड़ का दुरुपयोग कर सकते हैं ।

 

*मंदिरों का बँटवारा*

मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में श्रीराम कारसेवकों पर गोली चलवाकर इतिहास रच दिया था । मुलायमपुत्र अखिलेश यादव ने राजनीतिक कारणों से रामलला की प्राणप्रतिष्ठा का बहिष्कार किया और इससे होने वाली राजनीतिक क्षतिपूर्ति को कम करने के लिए सैफई में श्रीकृष्ण का भव्यमंदिर निर्माण किये जाने के समाचार उनके समर्थकों द्वारा प्रसारित किये जाने लगे हैं । अयोध्या में निर्मित श्रीरामलला के मंदिर से भी अधिक बड़ा और भव्य मंदिर बनवाना चाहते हैं अखिलेश । अखिलेश यादव को बधाई! ...किंतु अयोध्या के साथ श्रीरामलला का जो सम्बंध है वैसा सम्बंध श्रीकृष्ण जी का सैफई से कैसे स्थापित कर सकेंगे आप? प्रतिस्पर्धा करते समय सम्बंधों, प्रतीकों और प्रभावों को भी ध्यान में रख जाना चाहिये महोदय जी!  

श्रीराम के विरोधी मुलायमपुत्र श्रीकृष्ण का मंदिर क्यों बनवाना चाहते हैं? क्या हमारे आदर्शों का भी राजनीतिक बँटवारा कर लिया गया है? सूर्यवंशी राम से शत्रुता और चंद्रवंशी श्रीकृष्ण से निकटता! धार्मिक प्रतीकों और सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को लेकर इस तरह का बँटवारा देश के लिये बहुत घातक है ...और समाज को तोड़ने वाला भी । हम इस तरह की दूषित मानसिकता का विरोध करते हैं । भारत की आम जनता श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवनमूल्यों को अपना आदर्श मानती रही है और उनमें किसी भी तरह का विभेद या विद्वेष स्वीकार नहीं कर सकती । मंदिर निर्माण का उद्देश्य यदि सात्विक और पवित्र न होकर स्वार्थपूर्ण हो तो ऐसे मंदिर कभी लोककल्याण नहीं कर सकते ।

आश्चर्यजनक बात तो यह है कि मंदिर का निर्माण राजसत्ताओं द्वारा किया जाता रहा है लेकिन मंदिरों को लेकर गालियाँ ब्राह्मणों को दी जाती रही हैं । राजनीति की इस प्रमेय को बूझना सरल नहीं है ।

रविवार, 21 जनवरी 2024

प्राणप्रतिष्ठा का विज्ञान

प्राणप्रतिष्ठा के मुहूर्त को लेकर शंकराचार्यों और नेताओं द्वारा की गयी टिप्पणियों से जनमानस में कुछ शंकायें उत्पन्न हो गयी हैं । जब विद्वानों द्वारा किसी विषय पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ की जाने लगें तो आमजन का सशंकित होना स्वाभाविक है । हमने इस विषय पर मोतीहारी वाले मिसिर जी से चर्चा की जो मुहूर्त से होकर आगे बढ़ती हुयी प्राणप्रतिष्ठा के भौतिक शास्त्र तक पहुँच गयी । इस चर्चा में हुये प्रश्नोत्तरों के कुछ महत्वपूर्ण अंशों को हम यहाँ यथावत् प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं ।

प्रश्न – एक संत ने चेतावनी दी है कि प्राणप्रतिष्ठा की प्रक्रिया में सही विधान का पालन नहीं किया जा रहा है, मुहूर्त भी शुभ नहीं है, यदि अमुहूर्त में प्राणप्रतिष्ठा की जायेगी तो मंदिर के चारों ओर नकारात्मक सूक्ष्मशक्तियाँ एकत्र होने लगेगीं जिसके दुष्परिणाम भोगने के लिए सभी को तैयार रहना होगा । क्या सचमुच अयोध्या का मंदिर भारत के लिए अभिषाप बनने जा रहा है?

उत्तर – मंदिर कभी अभिषाप नहीं होते । नकारात्मक सूक्ष्म शक्तियों के एकत्र होने की बात भयादोहन है, ऐसा कुछ नहीं होता । दिव्यशक्तियों के आह्वान और आराधना के लिये हर क्षण मुहूर्त होता है । दिक् और काल की सृष्टि करने वाले ईश्वर ने अपने आह्वान और आराधना के लिए कोई भी क्षण ऐसा नहीं बनाया जो अ-मुहूर्त हो ।

प्रश्न – मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा आवश्यक क्यों है ?

उत्तर – यदि मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा नहीं की जायेगी तो मंदिर पर्यटन के केंद्र बनकर रह जायेंगे, शक्ति के केंद्र नहीं बन सकेंगे । प्राणप्रतिष्ठा की प्रक्रिया ध्वनिविज्ञान पर आधारित है । पूरी प्रक्रिया एक जटिल फ़ोर्टीफिकेशन की तरह होती है जिसे कई प्रकार की प्रोसेज़ से होकर गुजरना होता है । फ़ोर्टीफ़िकेशन के बाद कोई भी फ़ोर्टीफ़ाइड उत्पाद गुणकारी, शक्तिशाली और जनसामान्य के उपयोग के लिए उपयुक्त हो जाता है ।

सुपात्र साधकों द्वारा विधिवत किये गये वैदिक मंत्रोच्चारण से जो ध्वनि ऊर्जा उत्पन्न होती है उसे मूर्ति में पोटेंशियल एनर्जी के रूप में स्थापित किया जाता है । कोई भी साधारण मूर्ति केवल पांचभौतिक तत्वों का पुञ्ज भर होती है । किसी अनगढ़ पत्थर को मूर्ति का आकार देने वाला मूर्तिकार सामान्य लोगों की अपेक्षा महान होता है किंतु जब मंत्रजनित सात्विक पोटेंशियल एनर्जी से उसी मूर्ति को अनुप्राणित किया जाता है तो वह मूर्ति अपने निर्माता मूर्तिकार से शक्तिशाली हो जाती है । मूर्तिकार मनुष्य ही रह जाता है किंतु उसकी बनायी हुयी मूर्ति दिव्य हो जाती है । परमाणु बम बनाने वाला वैज्ञानिक मनुष्य ही रहता है पर उसका बनाया हुआ बम शक्ति का महापुञ्ज हो जाता है ।

प्रश्न – प्रसिद्ध मंदिरों में नित्य पूजन-अर्चन किया जाता है, वहीं कई मंदिर ऐसे भी हैं जहाँ महीनों कोई जाता ही नहीं । क्या इससे मूर्ति के दिव्यत्व पर कोई प्रभाव पड़ सकता है?

उत्तर – प्राणप्रतिष्ठित मूर्ति की नित्य पूजा-अर्चना आवश्यक है । धरती के भीतर दबा हुआ यूरेनियम किसी को हानि नहीं पहुँचाता, सोडियम जब तक खनिज के रूप में है तब तक शांत रहता है किंतु एक बार रासायनिक शोधन प्रक्रिया सम्पन्न हो जाने के बाद यूरेनियम हो या सोडियम उनका रखरखाव आसान नहीं होता । बम का रखरखाव साइंटिफिक श्रद्धा के साथ किया जाना अपरिहार्य है अन्यथा शक्ति का वह महापुञ्ज किसी दुर्घटना का कारण भी बन सकता है । यदि आप चाहते हैं कि न्यूक्लियर रिएक्टर का रचनात्मक उपयोग किया जाय, विध्वंसक नहीं तो उसका सम्मान करना होगा । विज्ञान की भाषा में सम्मान और श्रद्धा जैसे शब्द साइंटिफिक नॉर्म्स के विधिवत अनुपालन की अपेक्षा करते हैं । आप जानते हैं, न्यूक्लियर रिएक्टर को हैवी-वाटर अर्पित करना ही होगा अन्यथा वह कुपित जायेगा ।  

प्रश्न – दिव्य मूर्तियों को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा खंडित और अपमानित किये जाते रहने के इतिहास से पूरा विश्व परिचित है । हिन्दुत्वविरोधियों और नास्तिकों द्वारा प्रायः यह पूछा जाता है कि शक्तिकेंद्र माने जाने वाले मंदिरों की मूर्तियाँ मूर्तिभंजकों के प्रहार से अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकीं?

उत्तर – मूर्तियों द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रियाओं की एक सुनिश्चित् वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है, उनसे तलवार लेकर युद्ध करने की अपेक्षा अनुचित है । उनकी प्राभाविकता “देने” वाली होती है, “लेने” वाली नहीं, वे जीवन की शक्ति दे सकती हैं, किसी का जीवन ले नहीं सकतीं, इसीलिये वे दिव्य हैं अन्यथा किसी का जीवन लेने के लिए तो मनुष्य है ही । मूर्तियाँ प्रतिहिंसा नहीं करतीं । निश्चित ही प्राणप्रतिष्ठित दिव्यमूर्तियाँ शक्तिशाली होती हैं किंतु उनका शक्तिपात केवल रचनात्मक कार्यों के लिए ही होता है । आशीर्वाद देने वाली मूर्तियाँ हिंसक प्रतिक्रिया कैसे कर सकती हैं! यही कारण है कि सोमनाथ जैसे कई मंदिरों को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा बार-बार नष्ट किया जाता रहा । 

प्रश्न – लोग मंदिर जाते हैं, किसी कामना की पूर्ति के लिए देवी-देवता से आशीर्वाद लेते हैं परंतु आवश्यक नहीं कि याचक को सफलता मिल ही जाय । दिव्यमूर्ति का आशीर्वाद निष्फल कैसे हो जाता है ?

उत्तर – एक ही लैबोरेटरी में काम करने वाले सभी वैज्ञानिकों को सफलता नहीं मिल पाती । आवश्यक नहीं कि हर वैज्ञानिक का आविष्कार सफल, उपादेय और सर्वकल्याणकारी हो । एक वैज्ञानिक बुहान की लैब में काम करता है तो जेनेटिकली मोडीफ़ाइड कोरोना वायरस तैयार करता है, एक अन्य वैज्ञानिक भारत-बायोटेक की लैब में काम करता है तो कोरोना को-वैक्सीन का आविष्कार करता है । याचक की क्षमता और शुचिता पर निर्भर है कि किसी मंदिर में जाकर वह वहाँ से क्या और कितना प्राप्त कर पाता है ।     

प्रश्न – प्रधानमंत्री मोदी कल सुबह रामलला की प्राणप्रतिष्ठा में भाग लेने वाले हैं, कुछ साधु-संतों ने इसे विधिविरुद्ध बताया है । क्या मोदी का यजमान होना विधिविरुद्ध है?

उत्तर – ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए सुपात्रता की आवश्यकता तो होती ही है । मोदी इसके लिए सुपात्र हैं या नहीं इसका निर्धारण कौन करेगा और इसकी इलेजिबिलिटी परीक्षा कैसे की जाय! मोदी जी साधारण व्यक्ति होकर भी पिछले कई दिनों से सुपात्रता की साधना कर रहे हैं, वहीं कई साधुसंत क्रोधित हैं और मोदी को कोस रहे हैं । मुझे लगता है कि ऐसे साधु-संतों की अपेक्षा मोदी जी प्राणप्रतिष्ठा के लिये कहीं अधिक सुपात्र व्यक्ति हैं ।