बुधवार, 24 जुलाई 2019

पेशी


“जीवन पापमय है और मृत्यु पापमुक्त” – यह जीवन दर्शन स्थापित किया है समाचार पत्रों में प्रकाशित वक्तव्यों, संपादकीय आलेखों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ।
प्रजावत्सल नेता जी अपनी जनता को बिलखता हुआ छोड़कर चले गये । प्रजा उनके अंतिम दर्शन कर सके इसलिये सहृदय नेता जी जाते-जाते बेनामी सम्पत्तियों के साथ-साथ अपना पार्थिव शरीर भी यहीं छोड़ गये । पार्टी कार्यकर्ताओं ने नेता जी की महानता के कसीदे पढ़े तो विरोधियों ने होड़ लगाते हुये उन्हें ईश्वरीय गुणों से महिमामण्डित करना शुरू कर दिया । समाचार प्रकाशित हुआ, लोगों ने विरोधी नेता का वक्तव्य पढ़ा – “राष्ट्रीय राजनीति में पिछले चालीस साल से सितारे की तरह चमकते रहने वाले फलाने राजनेता की मृत्यु से देश की अपूरणीय क्षति हुयी है । देश के राजनीतिक परिदृश्य में ऐसी शून्यता व्याप्त हो गयी है जिसे अगली कई शताब्दियों तक भरा नहीं जा सकेगा । हमने एक ऐसे राजनेता को खो दिया है जो जीवन भर देश के लिए जिया और देश को दिशा देता रहा । फलाने जी अपने मधुर व्यवहार से देश की जनता के दिलों पर राज करने के लिये जाने जाते रहे” ।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रजा को दिखाया – “यह देखिये, फलाने जी के पार्थिव शरीर के दर्शनों के लिये किस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़ रही है । भीड़ को नियंत्रित कर पाना पुलिस के लिये मुश्किल होता जा रहा है । ...और यह देखिये ... लाठी चार्ज । पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ रहा है  ...लोग इधर-उधर भाग रहे हैं ...लेकिन पलट कर अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शनों के लिये वापस भी आ रहे हैं ...इससे फलाने जी की लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है”।
ये वे समाचार पत्र और टी.वी. चेनल्स हैं जो फलाने जी की मृत्यु के ठीक पहले तक उन्हें इस धरती का सबसे बड़ा पापी, भ्रष्ट, घूसखोर, घोटालेवाज और जनता की गाढ़ी कमाई को लूट-लूट कर स्विस बैंक में अपना ख़जाना बढ़ाने वाला जोंक सिद्ध करने में रात-दिन एक किये रहते थे । फलाने जी के मरने के ठीक पहले तक जो विरोधी नेता जितना कठोर, आक्रामक और पोल-खोल अभियान में दक्ष होता वही नेता फलाने जी के मरने के बाद आश्चर्यजनकरूप से उतने ही अधिक विनम्र भाव से फलाने जी की महानता और दिव्यता के बारे में ऐसे-ऐसे रहस्योद्घाटन करने लगता कि भक्तवत्सल प्रजा की आँखों से अश्रुधारायें बहने लगतीं और उन्हें लगने लगता कि उन्होंने वाकई एक ईश्वर को खो दिया है और अब वे सब अनाथ हो गये हैं । 
डॉक्टर दागी ने दशकों से चले आ रहे ऐसे निर्लज्ज तमाशों और रुदन प्रतिस्पर्धाओं को देखने के बाद जो तथ्यात्मक निष्कर्ष निकाला वह इस प्रकार है – “हमारा सच्चा राजनीतिक चरित्र देखना हो तो किसी राजनेता की मृत्यु के बाद तीन-चार दिनों तक चलती रहने वाली राजनीतिक गतिविधियों और वक्तव्यों को देख लीजिये”।
डॉक्टर दागी अपनी बात तथ्यात्मक और घोषणात्मक तरीके से कहने के अभ्यस्त हैं । नेताओं की मौत पर देश भर में उमड़ पड़ने वाले पेशेवर रुदालों की निर्लज्ज नौटंकी अब उन्हें परेशान नहीं करती । वे बताते हैं – “विरोधी खेमे के नेता की मौत पर नेतारुदन और इस रुदन को हाईप्रोफ़ाइल बना देने में निपुण टी.आर.पी. लोभी मीडिया के लिये ऐसी नौटंकी करना उनके पेशे का एक हिस्सा है । इसे भावनाओं या पीड़ा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिये यह तो राजनीतिज्ञों की आपसी लोकनीति है । यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो कल उनकी मौत पर कौन रोयेगा, कौन उन्हें ईश्वरीय गुणों से भरपूर एकमेव नेता के रूप में महिमामण्डित करेगा! मंच पर प्रशंसकों से घिरे रहने वाले नेता अपनी प्रशंसा के इतने एडिक्ट हो चुके होते हैं कि अपनी मौत के बाद भी वे यह नशा एक बार और करके ही रुख़सत होने का मोह छोड़ नहीं पाते”।
चित्रगुप्त के दरबार में रुदालों की पेशी का एक किस्सा सुनाते हुये डॉक्टर दागी ने रहस्योद्घाटन किया – “मृत्योत्तर प्रशंसा” की होड़ के लोकाचार में दक्ष विपक्षी नेताओं में से एक नेता की आज भोरे-भोरे मृत्यु हो गयी । सदा गरजते रहने वाले बादल रुदाले बनकर घिर आये और धरती पर ‘मृत्योत्तर नेताई परम्परा’ निभाई जाने लगी । उधर नेता जी की आत्मा की चित्रगुप्त के दरबार में पेशी हुयी । चित्रगुप्त ने पूछा – “आप अपने विरोधी नेताओं को पापी और पाखण्डी सिद्ध करने में जीवन भर लगे रहे, फिर उनकी मृत्यु होते ही अचानक उन्हें देवतुल्य सिद्ध करने के अभियान में लग जाते रहे । किया जा चुका कर्म तो परिवर्तनशील नहीं हुआ करता । हम जानता चाहते हैं कि जीवितावस्था का पाप मृत्यु होते ही पुण्य में कैसे बदल दिया करते हैं आप ? इन वक्तव्यों में सच कौन सा होता है, जीवितावस्था में लगाए गये आरोप या मृत्योत्तर पढ़े जाते रहे तारीफ़ के कसीदे ?” नेतात्मा ने उत्तर दिया – “नेता कभी झूठ नहीं बोला करते, नेता अपने वर्तमान में जीता है । तत्कालीन परिस्थितियों की माँग के अनुसार दिया गया कोई भी वक्तव्य सत्य ही होता है । जब हमने अपने विरोधी को पापी कहा तब वह उसकी जीवितावस्था का सत्य था, जब हमने उसे देवतुल्य कहा तब वह उसकी मृत्यु के पश्चात का सत्य था । मृत्यु के पश्चात नश्वर देह की तरह पाप भी मिट्टी हो जाते हैं, तब जो शेष बचता है वह सिर्फ पुण्य ही होता है । हे चित्रगुप्त जी ! हमने जब-जब जो भी कहा वह सब सत्य ही था उसमें असत्य कुछ भी नहीं था । अस्तु, मेरे स्पष्टीकरण से संतुष्ट होते हुये मुझे इस आरोप से मुंचित करने की कृपा करें”। 
डॉक्टर दागी मानते हैं कि जिन शक्तियों पर हमारा वश नहीं होता उन्हें नमन अवश्य करना चाहिये, फिर चाहे वे दिव्य शक्तियाँ हों या आसुरी । चलने से पहले डॉक्टर दागी हाथ जोड़कर, आँखें बन्द कर बुदबुदाये – “अहो पाप ! अहो नौटंकी ! आप अद्भुत हैं । इस भवसागर में मिथ्या प्रशंसारूपेण संस्थित पाप और नौटंकी शक्तियों को मेरा तीन बार नमन है”। 

रविवार, 14 जुलाई 2019

राखीगढ़ी के मूल निवासी


पता नहीं यह विषय विवादित है या बना दिया गया है ! हम इतना ही कह सकते हैं कि कोई भी वैज्ञानिक दृष्टि "किंतु-परंतु" से परे देखने का प्रयास करती है । सत्यान्वेषण कुछ बिंदुओं या तथ्यों के आधार पर नहीं हो सकता । समग्रता और विहंगम दृष्टि अपेक्षित है इसके लिये । पूर्वाग्रह, भावुकता और संकुचित दृष्टि को छोड़कर आगे बढ़ना होगा । सबसे पहले हमें आर्यावर्त के प्राचीन इतिहास, भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आसपास फैले द्वीपीय देशों के पारस्परिक सम्बंधों...उनमें समानताओं, वैदिक साहित्य और पुराणेतिहास के अतिरिक्त भाषाओं और लिपियों के विकासक्रम को भी भारत के मूलनिवासियों के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा ।
हमें यह भी याद रखना होगा कि बंगाल की खाड़ी से लेकर गुजरात तक के तटीय क्षेत्रों के आसपास मध्य एशिया, अफ़्रीका और योरोप से व्यापारियों का आना-जाना और बसना होता रहा है । गोवा और चंदननगर में आज भी पुर्तगालियों की कॉलौनी हैं । कोच्चि में अरबों और अफ़्रीकंस के वंशज रहते हैं । अब आप कल्पना कीजिये कि कुछ समय बाद यह सभ्यता किसी कारण से समाप्त हो जाती है । फिर दस हजार साल बाद संयोग से इन्हीं स्थानों की खुदाई की जाय ...जो कि भारत के विभिन्न प्रांतों में हैं तो इन सबकी डी.एन.ए. संरचना में ज़बरदस्त भिन्नता देखने को मिलेगी । अब आप इस रिपोर्ट के आधार पर भारत के मूलनिवासियों की गुत्थी तक कभी नहीं पहुँच सकेंगे । हमें ध्यान रखना होगा कि दुनिया भर में लोगों के आने-जाने और बसने की दीवानगी नृवंशों की विशेषता रही है । हुंजा घाटी के लोगों को ग्रीक सैनिकों का वंशज माना जाता है । किसी दिन यह किस्सा स्मृति से निकल जायेगा ...फिर हजारों साल बाद इनके उत्तराधिकारियों के डी.एन.ए. ग्रीक लोगों के डी.एन.ए. के अधिक क़रीब पाये जाने पर क्या हुंजा वैली ग्रीक सभ्यता का केंद्र मान ली जायेगी ? या यह माना जायेगा कि ग्रीकों ने हुंजा के मूल निवासियों को मारकर वहाँ अपनी बसाहट कर ली ? इन तथ्यों के आधार पर आप अपने उद्देश्य के अनुरूप किसी भी तरह का निष्कर्ष निकाल सकते हैं ।
अब जरा अमेरिका-कनाडा और योरोप के उन शहरों की तरफ़ रुख किया जाय जहाँ आज भारतवंशी (भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान)जाकर स्थायी रूप से बस गये हैं । दस हजार साल बाद वहाँ मिले इस तरह के नगरों और खुदाई से प्राप्त नरकंकालों से आप किस तरह का निष्कर्ष निकालेंगे?

मुझे लगता है कि मूल निवासी का यह प्रश्न ही बेमानी है । मनुष्य घुमंतू रहा है ...आगे भी रहेगा । हमें दो बातों पर सोचने की आवश्यकता है ...हमारा घुमंतू स्वभाव और व्यापार ।
सभ्यता ने हमें तीन मुख्य चीजें दी हैं - शासन, व्यापार और वैश्विक बसाहट । एक समय वह भी था जब सिल्क, मसाले, चाय और इसी तरह की और भी बहुत सारी चीजों की दुनिया भर में माँग और मुनाफ़ा कमाने की ज़रूरत ने कारवाँ कल्चर को जन्म दिया । दुनिया भर के देश सिल्क और टी.हॉर्स जैसे कई रूट्स से होकर न जाने कितने पड़ावों पर ठहरते हुये महीनों की यात्रायें किया करते थे । भाषा, लिपि और संस्कृति के साथ-साथ इन कारवाँओं के लोगों ने अपने जींस भी स्थानीय लोगों को दिये । यह प्रक्रिया आज भी चल रही है । जेनेटिक प्योरिटी न कभी थी और न कभी आगे रहेगी । हम सब मनुष्य हैं और यह पूरी धरती हमारी है । हम सब इस धरती के मूल निवासी हैं ।
हाँ! आने वाले समय में जब चंद्रमा या मंंगल पर हमारी नयी बस्तियाँ बस जायेंगी ...मूल निवासी का मुद्दा वहाँ काम आयेगा ।   

रविवार, 7 जुलाई 2019

मृदाजल


सोये थे जलकण  
लिपटकर
मृदा के कणों से
ओढ़कर चादर  
हवा के नन्हें कणों की ।
धरती
हो गयी थी उर्वरा
पाकर इन कणों को ।
छू देता सूरज
जब-जब इन्हें
चहक उठते बीज
माटी में सोये पड़े जो,  
भर जाती कोख तब
माँ धरती की
कर देने बाँझ जिसे
अड़ गये हो तुम
लगा कर संयत्र
चुरा रहे जलकण
छीन रहे अधिकार
जंगल के जीवन का ।

मर जायेगा जंगल
तड़पकर प्यास से जिस दिन
बनाओगे जीवन तब
जिस कारखाने में
उसे तो लगाया ही नहीं
आज तक तुमने कहीं
और तुम कहते हो
कि कर लिया है बहुत
तुमने विकास ।
हाँ! सचमुच
कर लिया है बहुत
तुमने विकास
जीवन के मूल्य पर
किंतु
तुम्हें क्या
तुम तो चल दोगे
बनाकर धरती को बाँझ
किसी अन्य ग्रह पर
बनाने
उसे भी बाँझ
करते हुये ऐसा ही विकास ।   

रविवार, 2 जून 2019

निर्वात


“मेरी बहन को देखोगे तो पागल हो जाओगे ...एक बार देख तो लो ...चार घर छोड़कर घर है हमारा”।
आठ-नौ साल के बच्चे ने सत्तर साल के बुढ़ऊ की कलायी पकड़कर अपने साथ चलने का आग्रह करते हुये कहा तो बुढ़ऊ ने मुस्कराते हुये पूछा – “ऐसा क्या है तुम्हारी बहन में”?
बच्चे ने व्यावसायिक होते हुये निःसंकोच कहा – “आपकी पसंद की हर चीज है उसके पास”।

पता नहीं बुढ़ऊ ने भरोसा किया बच्चे की बात पर या कि उसकी व्यावसायिकता से प्रभावित हुआ, बहरहाल वह तैयार हो गया बच्चे के साथ जाने के लिये ।
चार घर छोड़कर एक कच्चे घर में मण्डी थी । बच्चे ने ओसारे में पहुँचते ही आवाज़ लगायी – “जिज्जी”।
दरवाजा खोलकर प्रकट हुयी लड़की को बुढ़ऊ ने नीचे से ऊपर तक देखा, एक्स-रे जैसी भेदक दृष्टि से देखकर देह के उतार-चढ़ाव वाले एक-एक चित्र का विश्लेषण किया, मन ही मन काम के तराजू पर रखकर उसकी देह को तौला । बुढ़ऊ ने बच्चे को कुर्ते की जेब से दस का एक नोट निकालकर देते हुये कहा – “माल वाकई जोरदार है”।
दलाल बच्चे की जिज्जी मात्र चौदह-पंद्रह साल की एक किशोरी थी । किशोरी ने बुढ़ऊ को अपने पीछे आने का संकेत दिया और अंदर चली गयी । बच्चे ने चिल्लाकर कहा – “कुछ चाहिये तो माँग लेना” और इसके बाद वहाँ से भाग गया । 
यह बेड़ियों का गाँव है जहाँ अपने ही बेचते हैं अपनों के शरीर । तथाकथित सभ्य समाज में प्रचलित नैतिकता की सीमाओं को धता बताती देहव्यापार की इस घरेलू मण्डी की अपनी सीमायें हैं और अपनी ही परिभाषाएँ । बाजार के विस्तार को रक्त सम्बंध भी बाँध पाने में असमर्थ हो जाते हैं इस गाँव में ।
कच्ची मिट्टी के बने घर, घर के बाहर दीवारों पर छप्पर डालकर बनाये गये काम चलाऊ खुले बरामदे, कच्ची गलियाँ, किसी-किसी घर के सामने उगे नीम के पेड़, अपनी माँ-बहन-भाभी-पत्नी या बेटी की देह का व्यापार करते रक्तसम्बंधियों के समूह ...बहुत कुछ था वहाँ पर पिछले दो घण्टों से मैंने एक भी चित्र नहीं लिया था, कैमरा ऑन करने की भी इच्छा नहीं हुयी । यहाँ तक कि नीम के पेड़ की एक डाल पर बैठे मोर को देखकर भी मेरा मन नहीं मचला ।
मन हुआ कि पास जाकर नीम से पूछूँ ...मोर से पूछूँ ...पूछूँ कि रक्त सम्बंधों में सहज मानवीय भावनाओं का यह निर्वात क्यों?

जिस समय सत्तर साल के बुढ़ऊ एक चौदह साल की किशोरी को खा कर अपनी भूख मिटाने का प्रयास कर रहे थे उस समय मेरी चिर सखी उदासी चुपके से मेरे पास आकर बैठ गयी । मैंने उसके आने और अपने पास बैठने को स्पष्ट अनुभव किया, पूछा – “तुम फिर आ गयीं ...मैं अकेले रहना चाहता हूँ ...और तुम हो कि मुझे कभी अकेला नहीं छोड़तीं । आज मैं बिल्कुल अकेले रहना चाहता हूँ, तुम जाओ यहाँ से”।

चिर सखी उदासी बैठी ही रही, गयी नहीं । थोड़ी देर बाद मैंने बुढ़ऊ को वापस आते देखा । बुढ़ऊ के चेहरे पर तृप्ति का भाव तिर रहा था । मैं उसे समीप आते देखता रहा । पास आकर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा – “मजा आ गया कमाल का माल है …एक बार जाकर तो देखो”।
मैंने कुछ नहीं कहा, आँखें फेर कर हवा में झूमती हुयी नीम की पत्तियों को देखने लगा । बुढ़ऊ ने पूछा – “लेखक हो?”
मैं चुप रहा तो बुढ़ऊ ने ही कहा – “मुझसे घृणा है रही है न! ...तुम लेखक लोग ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हो । दुनिया के हर देश में ...हर युग में यह सब होता रहा है”।
मुझे लगा कि बुढ़ऊ के पास कहने के लिये बहुत कुछ है । मैंने पूछ दिया – “सहज रिश्ते इतने निर्वात कैसे हो सकते हैं?”
बुढ़ऊ चौंक गये, कुछ देर चुप रहकर बोले – “मतलब?”
“मतलब यह कि कोई पिता या भाई अपनी बेटी, बहन या पत्नी की देह का इतनी निर्लज्जता से सौदा कैसे कर लेता है?”
बुढ़ऊ हँसे, फिर बोले – “हे अर्जुन ! संसार के समर में न कोई पिता है, न कोई पत्नी है ...न कोई भाई-बहन ...सब कुछ मन का भ्रम है ...विकार है । यह जो छोटा सा अबोध बच्चा अपनी जिज्जी की देह का मुझसे सौदा कर रहा था ..उसी से तुम व्यथित हो गये हो न! ...वे दोनों सहोदर हो सकते हैं ...किंतु उनके पिता अलग-अलग हैं ...उसी तरह जैसे हम लोगों के मोहल्ले में सभी बच्चों के पिता अलग-अलग हुआ करते हैं । ...और फिर ...यह तो मन की निर्बंध स्थिति है ...अपने-पराये के भाव से परे”।
मैंने घृणा से भर कर कहा – “बच्चे को छोड़ो ...आप अपनी कहो, उस अबोध बच्ची को कैसे खा सकेआप?”
बुढ़ऊ ने गम्भीर हो कर उत्तर दिया – “खाया वही जाता है जो खाद्य होता है ...अखाद्य को कौन खा सकेगा! आयु को मत देखो ...शरीर को देखो । आयु तुम्हें उलझा सकती है ...शरीर तुम्हें आकर्षित कर सकता है”।
“वह अभी बच्ची है”।
“तो क्या हुआ? भोग्या की आयु तो है न उसकी!”
“और उसका कोमल मन? कच्ची उम्र में उसे औरत बना देना आपको कोई अपराध नहीं लगता?”
“भोग्या और औरत में अंतर क्यों करना चाहते हैं आप?”
“यह अंतर आप भी तो कर रहे हैं । अपने घर की किसी किशोरी को क्यों नहीं खा लिया आपने? यहाँ इतनी दूर चलकर आने की ज़रूरत नहीं पड़ती तब”।
बुढ़ऊ का चेहरा तमतमा गया । उसने मुझ पर हाथ उठा दिया तो आसपास खड़े होकर चुपचाप बहस सुन रहे दलालों ने हाथ पकड़ लिया उसका । एक ने कहा – “तेरा काम हो गया सेठ! अब तू जा यहाँ से ...फालतू की बहस मत कर”।
मैंने कहा – “हे पितामह भीष्म! मुझे ख़ुशी हुयी कि आपको मुझ पर क्रोध आया । यह क्रोध आपके भीतर बैठी चेतना के आहत होने से उत्पन्न हुआ है । इस चेतना को बनाये रखना”।
बुढ़ऊ ने नम आँखों से पूछा – “तुम कौन हो बेटा?”
मैंने कहा –“मुझे नहीं मालुम ... बस इतना जानता हूँ कि हम दोनों की चेतना ने मात्र एक पल के लिये ही सही ...एक-दूसरे को स्पर्श किया है । काश! आपकी यह चेतना कुछ देर पहले जाग्रत हो गयी होती तो आप उस बच्ची में अपनी पोती को पा लेते”।

तीन दिन बाद गाँव के बाहर वाले तालाब में लोगों ने एक वृद्ध की लाश को देखा ।

सोमवार, 20 मई 2019

विभाजन


बलात् कब्ज़ा वाले कश्मीर के भी दो टुकड़े हो गये एक पी.ओ.के. और दूसरा ख़ूबसूरत हुंजा घाटी वाला गिलगित-बाल्टिस्तान । पाकिस्तान सरकार द्वारा किया गया यह बटवारा केवल चीन को ख़ुश करने के लिये है ।  जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर एक नया राज्य बनाये जाने की बहुत दूरदर्शी आवश्यकता है ...पता नहीं राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से इस पर कोई विचार हो भी रहा है या नहीं ! बुरा विभाजन हो गया, अच्छे विभाजन के बारे में हम कब सोचेंगे?  



मुझे पता है, इस विषय पर कश्मीरी अलगाववादी और उनके समर्थक धारा 370 की ढाल लेकर सामने आ जायेंगे । ढाल लेकर टूट पड़ने वाले बुद्धिजीवी और नीतिकार शिमला समझौते के परिप्रेक्ष्य में तब कोई प्रतिरोध नहीं करते जब पाकिस्तानी हुक्मरान गिलगित-बाल्टिस्तान को एक अलग सूबा बना देते हैं । यानी दुनिया की आँखों में धूल झोंकते हुये शिमला समझौते का उल्लंघन किया जा सकता है, कश्मीर घाटी में एथनिक जेनोसाइड किया जा सकता है, महबूबा और शबनम लोन जैसे लोग कश्मीर को भारत से अलग कर लेने की धमकी दे सकते हैं ...लेकिन भारत की बेहतरी के लिये धारा 370 समाप्त करने या लद्दाख को एक नया प्रांत बनाने के बारे में कोई पहल नहीं की जा सकती ।
हम भारतीय आत्ममुग्धता से पीड़ित रहने वाले लोग हैं इसलिये हमें बारबार इतिहास के पन्ने पलट कर देखने की आवश्यकता है । मेरा संकेत भारत विभाजन की ओर है ।  
तत्कालीन ब्रिटिश भारत में धार्मिक बहुलता के आधार पर भारत विभाजन की माँग की गयी थी । भारत विभाजन हो गया अब इस बात की क्या सुनिश्चितता कि स्वतंत्र भारत में धार्मिक समीकरण बदलने पर यह इतिहास कभी पुनः दोहराया नहीं जायेगा जबकि कई मुस्लिम नेता पिछले एक दशक से एक और भारत विभाजन की धमकी देते रहे हैं । मोहम्मद अली जिन्ना किसी समय भारतीय एकता के समर्थक हुआ करते थे, किंतु बाद में सत्ता और धार्मिक पहचान की अदम्य भूख के आगे वे झुक गये और भारत विभाजन की ज़िद पर अड़ गये । क्या यही इतिहास उन लोगों द्वारा नहीं दोहराया जा सकता जो आज भारत के समर्थक हैं ? मत भूलिये कि पिछले एक दशक से टी.वी. डिबेट्स पर आने वाले लोगों ने एक और भारत विभाजन के बीज बोने शुरू कर दिये हैं ।

जिन्हें यह भरोसा है कि अब भारत का और विभाजन नहीं होगा उन्हें इतिहास स्मरण रखने की आवश्यकता है ।
जब हिंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे तो किसी ने नहीं सोचा था कि कभी भारत का विभाजन भी होगा, किंतु विभाजन हुआ और वह भी बहुत नृशंसतापूर्वक । वर्ष 1947 में किसी ने नहीं सोचा था कि पाकिस्तान कश्मीर पर आक्रमण करके उसका एक बड़ा हिस्सा हड़प लेगा, किंतु ऐसा हुआ । वर्ष 1948 में किसी ने नहीं सोचा था कि पाकिस्तान कलत पर आक्रमण कर उसे पाकिस्तान में मिला लेगा, किंतु ऐसा हुआ और आज पूरा बलूचिस्तान पाकिस्तान से आज़ाद होने के लिये हाथ-पाँव मार रहा है । वर्ष 1962 में किसी ने नहीं सोचा था कि चीन कभी भारत पर आक्रमण भी कर सकता है, किंतु आक्रमण हुआ और हमने भारत के लिये सामरिक महत्व का दो हजार वर्ग किलोमीटर का लद्दाखी भूभाग अक्साई-चिन खो दिया । वर्ष 1965 में किसी ने नहीं सोचा था कि जरा सा पाकिस्तान भारत पर आक्रमण करने का कभी दुस्साहस भी कर सकेगा किंतु यह दुस्साहस हुआ । और इससे भी पहले 1919 में जब ब्रिटिश हुकूमत ने गांधी जी से प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों को ब्रिटेन की ओर से युद्ध में सम्मिलित होने का सहयोग माँगा और पुरस्कार में भारत को आज़ाद कर देने का वादा किया तब भी किसी ने नहीं सोचा था कि ऊधम सिंह, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों की हिंसा का विरोधी और अहिंसा का पुजारी महात्मा भारतीय जवानों को हिंसा करने के लिये ब्रिटेन का साथ देने की घर-घर जाकर वकालत करेगा और युद्ध के बाद अंग्रेज़ अपने वादे से पूरी तरह मुकर जायेंगे । यहाँ यह भी स्मरणीय है कि जो गांधी देश की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेज़ों के विरुद्ध हथियार उठाने को हिंसा मानते थे वही गांधी आज़ादी का पुरस्कार पाने के लिये भारतीय जवानों को विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की ओर से हथियार उठाकर हिंसा करने की प्रेरणा देने को उचित मान रहे थे ।

इतिहास में कुछ और पीछे चलते हैं, वर्ष 1905 में जब लॉर्ड कर्ज़न ने धार्मिक बहुलता के आधार पर बंगाल का विभाजन किया तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह 1946-47 के भारत विभाजन का पूर्वाभ्यास है और हिंदूबहुल पश्चिमी बंगाल आगे चलकर मई 2019 में एक बार फिर इस्लामिक बहुल प्रांत बनने की ओर तीव्रता से बढ़ता दिखायी देगा और हमारी माननीया सांसद श्रीमती साज़दा अहमद बंगाल में न केवल रामनाम और हिंदूवाद के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा कर देंगी बल्कि बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों को बसाने की सार्वजनिक प्रतिज्ञा भी करेंगी, किंतु यह सब हुआ ।   

गुरुवार, 16 मई 2019

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद...


वर्ष 2014 में भाजपा की (मोदी की) सरकार आयी तो सारे विपक्षी हिंदू-राष्ट्रवाद को लेकर सशंकित हो उठे । केंद्र में भाजपा की सरकार आने से भारत को संघीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से मुक्त करने का स्वप्न देखने वालों को झटका लगना स्वाभाविक था ।
भारत की एक बहुत बड़ी विडम्बना यह रही है कि यहाँ हर किसी के मन में अपने क्षेत्र का शहंशाह बनने की प्रबल इच्छा रहती है । कश्मीर में तो ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है, अफ़ज़ल गुरु भी उन्हीं में से एक था । भारत की संसद पर आक्रमण करने के दोषी अफ़ज़ल गुरु को वर्ष 2014 में मृत्यु दण्ड दे दिया गया जिसे भारत के अलगाववादियों का एक बहुत बड़ा समूह अपनी पराजय के रूप में देख रहा था ।
कश्मीर भारत की एक दुःखती हुयी रग है । वर्ष 1990-91 में जब मण्डल आयोग को लेकर पूरे देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह का विरोध हो रहा था, जयपुर के आमेर पैलेस के एक बड़े से हॉल में सुबह-सुबह हमने सुना कि रामबाग में दुकानों को आग लगा दी गयी है और शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया है । इस घटना के मात्र दो दिन पहले ही आमेर पैलेस के इसी हॉल में मेरी भेंट एक कश्मीरी छात्र से हुयी थी जिसने कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा और घाटी में दशकों से छाई दहशत का बयान किया था ।  
कश्मीर घाटी को हिंदू-मुक्त बनाने के लिए इस्लामिक कट्टर पंथियों के दशकों से कहर ढा रहे अमानुषिक अत्याचार घाटी के हिंदुओं पर दिनोदिन बढ़ते जा रहे थे और भारत की तत्कालीन सरकार कश्मीरी हिंदुओं को सुरक्षा दिला सकने में असफल हो रही थी । जयपुर में रहते समय मेरी अच्छी मित्रता हो गयी थी उस कश्मीरी छात्र से । वह जब भी मुझसे मिलने आता तो उसकी चर्चाओं में कश्मीर एक मुख्य विषय हुआ करता । वर्ष 1990-91 में इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी पंडितों को अपनी बहू-बेटियाँ वहीं छोड़कर कश्मीर घाटी खाली कर देने का फ़रमान दे दिया गया था जिससे कश्मीरी पंडित दहशत में थे । अराजकता, असामाजिकता, जेनोसाइड, क्रूरता और अमानवीय आचरण की यह एक चरम स्थिति थी जिसके बाद कश्मीर घाटी खाली होने लगी और कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनने को विवश हो गये । कश्मीर या भारत की सरकार अपने नागरिकों को सुरक्षा देने का अपना संवैधानिक दायित्व पूरा कर सकने में पूरी तरह असफल सिद्ध हो चुकी थीं जिससे भारत के इस्लामिक कट्टरपंथी और गज़वा-ए-हिंद अभियान के रणनीतिकार उत्साहित थे । वर्ष 2014 में भाजपा की मोदी सरकार के आने के बाद इन रणनीतिकारों ने दिल्ली और प्रधानमंत्री मोदी को अपने कठोर विरोध का केंद्र बना लिया था ।
वर्ष 2016 में फरवरी के नवें दिन दिल्ली के विश्वविख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्वयं को अलगाववादी बुद्धिजीवी मानने वाले कुछ युवकों ने कश्मीरी कवि आगा शाहिद अली के काव्य संकलन –“The country without a post office” जो कि मूल रूप से “Kashmir without a post office” के नाम से लिखी गयी थी, पर चर्चा के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसका एक छद्म किंतु मुख्य उद्देश्य संसद पर आक्रमण करने वाले अफज़ल गुरु के मृत्युदण्ड की तीसरी बरसी मनाकर देश और दुनिया को अलगाववाद की नीति का संदेश देना था ।      
क्रिटिक को प्रगति का अनिवार्य तत्व और अपना आदर्श मानने वाली जे.एन.यू. की संस्कृति इस बार अपने उछाल पर थी । अलगाववादी बुद्धिजीवियों ने भारत की राजधानी के प्रख्यात विश्वविद्यालय परिसर में ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह’, ‘हम क्या चाहते …आज़ादी’, 'हम लेके रहेंगे …आज़ादी', 'गो इंडिया …गो बैक', 'संग-बाजी वाली आज़ादी’, 'कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी – जंग रहेगी', 'भारत की बर्बादी तक आज़ादी की जंग रहेगी', 'हम छीन के लेंगे आज़ादी, लड़के लेंगे आज़ादी', 'तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा', 'तुम कितने मकबूल मारोगे, हर घर से मकबूल निकलेगा', 'अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं', 'अफ़ज़ल तेरे ख़ून से इंकलाब आएगा’ और ‘इंडियन आर्मी को दो रगड़ा'… जैसे उत्तेजक नारे लगाकर भारत के प्रधानमंत्री को अपना संदेश देने का फिर एक सफल प्रयास किया ।
राजनीति की भाषा में इस तरह के नारे अलगाववाद और हिंसक विद्रोह की भूमिका माने जाते हैं ।  ‘अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ और ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा’ जैसे नारों से भारत के सर्वोच्च न्यायालय एवं भारत राष्ट्र की सम्प्रभुता को सार्वजनिकरूप से चुनौती दी जाती रही ...पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत की भीरु प्रजा भी इस बगावती ऐलान को देखती और सुनती रही ।    
इन अलगाववादी बुद्धिजीवियों में जे.एन.यू. के अध्येताओं के साथ-साथ कुछ कश्मीरी युवक-युवतियाँ भी सम्मिलित थे । इनमें से कई लोग मार्क्स और शोपेनहॉर को अपना आदर्श मानते थे और केरल में प्रारम्भ हुये “किस ऑफ़ लव” आंदोलन के भागीदार रह चुके थे ।
जे.एन.यू. परिसर में हुयी इस बगावत से वामपंथी विचारधाराओं को पटखनी देने और अपनी हिंदूवादी विचारधारा को प्रखर करने का एक संयोगजन्य अवसर सत्तारूढ़ दल को मिल चुका था । अब राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति, राजद्रोह और राष्ट्रद्रोह जैसे भारीभरकम शब्दों पर वैचारिक और कूटनीतिक बहस पूरे देश में प्रारम्भ हो गयी । ‘भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ जैसे शब्दों और इन पर होने वाली बहसों से भारत की आम प्रजा परिचित हो रही थी । जे.एन.यू. बगावत के अगुआ रहे कन्हैया कुमार भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के लिये आमंत्रित किये जाने लगे । न चाहते हुये भी कन्हैया कुमार को पूरे देश ने एक बगावती राजनेता के रूप में स्थापित होते हुये देखा । मार्क्सवादी दल ने कन्हैया कुमार को बेगूसराय संसदीय क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में उतारा तो कन्हैया कुमार पर एक सुस्थापित राजनेता की मोहर भी लग गयी । इस माह के अंतिम सप्ताह में बेगूसराय की प्रजा के निर्णय की प्रतीक्षा पूरे देश के साथ-साथ दुनिया भर की वामपंथी सत्ताओं को भी है ।

मंगलवार, 14 मई 2019

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को हर भारतीय के कान इस गीत को सुनते आ रहे हैं । वर्ष में दो बार उन्हें लगता है कि उनका देश दुनिया के दीगर मुल्कों से कुछ ख़ास है...

सब लोगों की तरह हमें भी लगता है कि हमारा देश कुछ ख़ास है जहाँ वर्ष में दो बार हमें अपने महान होने का अनुभव होता है । साल के बाकी तीन सौ तिरेसठ दिन हम रोज की तरह हीनभावना से ग्रस्त बने रहते हैं क्योंकि किसी भी अन्याय का विरोध करने पर चारों ओर से लोग हमें सीख देने इकट्ठे होने लगते हैं – ”यह इण्डिया है यार ! यहाँ सब चलता है …अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ लेगा ...चुपचाप घर बैठो और जो जैसा चल रहा उसे वैसा ही चलने दो ....तुम ईश्वर नहीं हो जो कुछ बदल सकोगे ....दूसरों को अपने अनुसार नहीं बल्कि ख़ुद को लोगों के अनुसार बदलना सीख लो तो सुखी रहोगे ...”।
यह इण्डिया है जहाँ हम जीवन भर न्याय के लिये संघर्ष करते-करते परलोक सिधार जाते हैं और सत्यमेव जयते की हमारी आशा पूरी नहीं हो पाती ।
अब हम आते हैं भारत से प्रतिभाओं के पलायन की परम्परा पर । पलायन हमारे देश की परम्परा बन चुकी है । भारत की प्रतिभाओं और वैज्ञानिकों को काम न करने देने की कसम खाये बैठे अधिकारियों की हर बार जीत होने की परम्परा बन चुकी है । इसरो के वैज्ञानिकों की हत्या कर देने की परम्परा बन चुकी है । उनकी हत्याओं पर हर किसी के ख़ामोश बने रहने की परम्परा बन चुकी है । अकारण हल्ला करते रहने वाली मीडिया की अति संवेदनशील मुद्दों पर बिल्कुल चुप बने रहने की परम्परा बन चुकी है । दिन-रात एक-दूसरे पर गंदे से गंदा कीचड़ उछालने में व्यस्त रहने वाले माननीयों के महत्वपूर्ण विषयों से अनजान बने रहने की परम्परा बन चुकी है । यह देश परम्परावादियों का देश है ।
सरस्वती के चीरहरण की घटनायें चौथे स्तम्भ के लिये भी उपेक्षित होती हैं । कभी-कभार कोई बात उजागर हो ही गयी तो माननीयों द्वारा कह दिया जाता है कि यह सब विदेशी ताकतें करवा रही हैं हमारे देश में । विदेशी ताकतों पर थोप कर सारे आरोप हम ख़ुद को पाक-साफ मान कर चुप बैठ जाते हैं ।
इसरो के वैज्ञानिकों की हत्यायें अमेरिका, फ़्रांस या रूस के इशारों पर होती रहती हैं ... इसमें हमारे भोले माननीय निर्दोष हैं ...वे क्या कर सकते हैं बेचारे !
हत्या करवाने वाला कोई भी विदेशी हो पर हत्या करने वाला भारतीय कौन है ...इसकी जाँच न होने देने के लिये कौन भारतीय उत्तरदायी है ?
सत्ता हो या विपक्ष हर किसी को लक्ष्मी से प्रेम है ... वर्ष में मात्र एक दिन रस्म निभाने के लिये हम सरस्वती की पूजा करने का ढोंग कर लेते हैं ...इसके बाद तो पूरे साल सरस्वती की नितांत उपेक्षा करते रहने वाले हम लोग कभी शर्मिंदा न होने के अभ्यस्त हो चुके हैं ।