शनिवार, 20 अगस्त 2022

सनातनसंस्कृति की मर्यादा

    एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने वाले ग्यारह अपराधियों को पंद्रह वर्ष का दण्ड भुगतने के बाद बंदीजीवन के आचरण और सुधार के आधार पर रीमिशन पॉलिसी के अंतर्गत कारावास से मुक्त कर दिया गया।

आरोप यह भी है कि एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल और एक हिंदुत्ववादी संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा मुक्त हुये अपराधियों का फूलमाला और मिठाई से स्वागत किया गया, गोया पाकिस्तान की जेल से मुक्त हो कर आये शूरवीर भारतीय सैनिक हों। इस तरह का स्वागत कोढ़ में खाज पैदा करने वाला है। जघन्य अपराधियों का स्वागत यदि उनके घर के सदस्यों द्वारा भी किया जाता है तो ऐसा कृत्य हमारे नैतिक, वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पतन का द्योतक है। निस्संदेह, बलात् यौनदुष्कर्म और वह भी सामूहिक दुष्कर्म जघन्य और अक्षम्य प्रकृति का अपराध है। आयु, धर्म और शत्रुता के आधार पर इसकी क्रूरता और अमानवीयता को हल्के में लिया जाना किसी भी सभ्यसमाज के लिए आत्मघाती है। प्रकृति ऐसे समाज को फलने-फूलने का कोई अधिकार नहीं देती। यदि यह अजमेर शरीफ़ में विश्व के सबसे बड़े और सबसे सुनियोजित यौनदुष्कर्म एवं गजवा-ए-हिन्द के प्रत्याक्रमण के रूप में है तो भी ऐसे निकृष्ट विचारों और कृत्यों का स्वागत नहीं किया जा सकता। युद्ध और प्रतिरोध की शालीन मर्यादा ही सनातन संस्कृति की विशेषता है, यहाँ इस प्रकरण में किसी भी किंतु-परंतु का कोई स्थान नहीं हो सकता। यदि हम भी यौनदुष्कर्म के अपराधियों का स्वागत और महिमामण्डन करना प्रारम्भ कर देंगे तो सनातन हिन्दूसभ्यता पर गर्व करने वाले लोगों और मोहम्मद-बिन कासिम में क्या अंतर रह जायेगा?   

सभ्य समाज के द्वारा ऐसे जघन्य अपराधियों का स्वागत किया जाना निंदनीय ही नहीं अपराधियों को प्रोत्साहित करने का आपराधिक कृत्य भी है। तथापि बिलकिस बानो के बहाने हिंदूविरोधी मानसिकता को एक बार फिर धार्मिक विवाद को हवा देने का अवसर मिल गया है और इसके साथ ही बिल्किस बानो दुष्कर्म के अपराधियों की रिहाई के औचित्य पर भी बहस प्रारम्भ हो चुकी है। यह बहस स्वागतेय है किंतु इसकी सीमा में निर्भया कांड के उस दुर्दांत अपराधी की रिहाई के औचित्य पर भी सोचा जाना चाहिए जिसे अवयस्कता के आधार पर न केवल मुक्त किया गया बल्कि उसे शासन की ओर से स्वावलम्बन और सुरक्षा भी उपलब्ध करवायी गयी।     

यौनदुष्कर्म के अपराधियों के लिए मृत्यु के अंतिम क्षण तक के कारावास के दण्ड से कुछ भी कम नहीं होना चाहिए। वास्तविकता यह है कि न्यायव्यवस्था और हमारा दंडविधान क्रूर अपराधियों को हतोत्साहित और भयभीत नहीं बल्कि निर्भय बनाने वाला है। क्या यह हमारी चिंता का विषय नहीं होना चाहिये!     

सोमवार, 15 अगस्त 2022

स/न- कारात्मकता से मुक्ति कब

         राष्ट्रीय पर्वों पर विभिन्न राजनैतिक दलों के आचरण और वक्तव्यों में जिस सकारात्मकता की अपेक्षा पूरे देश को रहती है उसे पूरा होते हुये देखना एक बहुत बड़ी चुनौती हो गयी है। राजनीतिज्ञों के अमर्यादित और स्तरहीन व्यवहार से उत्पन्न कलह से उकताये नागरिकों को स्वतंत्रता दिवस और स्वाधीनता दिवस के दिन शांति, उत्साह और प्रसन्नता की आशा होती है जो उन्हें नहीं मिल पाती। राजनीति देशपरक न होकर व्यक्तिपरक हो चुकी है। हम किसी व्यक्ति को ईश्वर के रूप में पूजने के लिये लालायित क्यों रहते हैं? क्या ही अच्छा होता यदि सभी राजनैतिक दलों के नेतागण आज के दिन केवल देश के विकास और उसकी सुरक्षा की अविरोधी बातें करते। कम से कम राष्ट्रीय पर्वों के साल भर में आने वाले दो दिन कलहविहीन होने ही चाहिये। भारत को इस वैचारिक पराधीनता से मुक्ति कब मिलेगी?

नेहरू को भगवान की तरह और मोदी को खूँखार खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रतिस्पर्धा ने देश के नैतिक और राजनैतिक चरित्र की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी हैं। यदि हम इन्हें व्यक्ति के रूप में देख पाते तो आज हम देश और समाज के लिए सही नीतियों का चयन कर पाने की स्थिति में खड़े होते।

भारत में प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाया जाता है और केवल उसी दिन हिन्दी को उसका सम्मान दिलाने की बात की जाती है किंतु योजनाकारों के साथ-साथ लगभग पूरा देश आज़ादी के अमृत महोत्सव का ज़श्नमनाने का अभिनय कर रहा है। इस ज़श्न में मैं सम्मिलित नहीं हूँ, कभी हो भी नहीं सकता। मैं अपने देशवासियों के साथ “स्वतंत्रता का अमृत-महा-उत्सव” मनाना चाहता था किंतु मुझे यह उत्सव अकेले ही मनाना पड़ा। उधर भारत की राजधानी में “मीडिल क्लास और ग़रीब” बच्चों को अंग़्रेज़ीभाषी बनाने का अभियान बड़े गर्व के साथ चलाया जा रहा है। विदेशी भाषाओं पर गर्व करने की दासता से हमें मुक्ति कब मिलेगी?

पराधीन भारत कितना

क्या भारत सचमुच एक पराधीन देश था जिसे 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली थी?

मोतीहारी वाले मिसिर जी ने खिन्न भाव से पूछा है – “15 अगस्त 1947 के दिन देशी रजवाड़े किस विदेशी पराधीनता से स्वतंत्र हुये थे? भारत के तत्कालीन 565 राज्यों के लिए स्वतंत्रता दिवस का अर्थ क्या है?”

“इन 565 राज्यों में से कई राज्यों ने स्वेच्छा से अपनी पारम्परिक स्वतंत्रता और सम्प्रभुता का त्याग करके भारत संघ में अपने राज्यों के विलय की स्वीकृति दी तो कुछ राजाओं और नवाबों ने कुछ विवशताओं के कारण अपने राज्यों को भारत संघ में विलय की अनुमति प्रदान की। ऐसे सभी राज्यों के लिए भी 15 अगस्त के स्वतंत्रता उत्सव का क्या अर्थ है? 15 अगस्त को मिली स्वतंत्रता का उत्सव उन 21 राज्यों के लिए सचमुच महत्वपूर्ण है जिन्हें ब्रिटिश पराधीनता से मुक्ति मिली।

1947 तक भारत में देशी राज्यों, देशी रियासतों और प्रेसीडेंसी को मिलाकर कुल 579 राज्य हुआ करते थे जिनमें से अधिकांश पूर्ण या आशिक रूप से स्वतंत्र राज्य थे। इनमें से केवल 21 राज्यों में ही ब्रिटिश सरकार की सत्ता थी। राजकोट, नवानगर, ध्रोल, मोरबी, गोंडल, मकरान, खारान और कलात जैसे कई देशी रजवाड़े ब्रिटिश दासता से पूरी तरह स्वतंत्र थे, जबकि हमें आज भी पढ़ाया जाता है कि अंग्रेज़ों ने भारत पर 1947 तक शासन किया। हमें यह कभी नहीं पढ़ाया जाता कि अंग्रेज़ों ने भारत के केवल 21 राज्यों में ही शासन किया और 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश दासता वाले राज्यों को ही स्वतंत्रता मिली थी पूरे भारत को नहीं क्योंकि आज का सम्पूर्ण भारत कभी भी पूरी तरह कम्पनी सरकार या ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहा ही नहीं।

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सरकारी डॉक्टर की निजी प्रेक्टिस

             बहुत समय पहले की बात है जब एक राज्य के चिकित्सा-डायरेक्टर को औषधि क्रय में भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में डाल दिया गया। गंदी मछली समुदाय की यह एक छोटी सी गंदी मछली थी। भारत भर में ऐसी मछलियाँ बहुतायत से पायी जाती हैं। एक बुलबुला फूट गया, गोया किसी ज्वालामुखी के मुँह में एक कंकड़ फेक दिया गया हो। आम जनता इस भ्रम में थी कि भारत एक बड़े सुधार की दिशा में चल पड़ा है, पर ऐसा हुआ नहीं, 2200 डिग्री फ़ारेनहाइट में तपते ज्वालामुखी के ट्यूब में वह कंकड़ भी उसी लावा का एक हिस्सा बन गया। पानी में बुलबुलों का बनना और फूटना ही भारत की प्रजा की नियति है।

देश भर के रोगियों का विश्वास है कि राजकीय चिकित्सालय की अपेक्षा सरकारी डॉक्टर के घर में परामर्श लेना कहीं अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है। यह बात लगभग 90 प्रतिशत सही भी है जिसमें चिकित्सकों का योगदान तीस प्रतिशत और सरकारी व्यवस्था का योगदान सत्तर प्रतिशत होता है। आप किसी भी राजकीय चिकित्सालय के गेट पर खड़े हो जाइए और औचक ही बीस लोगों के प्रेसक्रिप्शन्स का अवलोकन कर लीजिये। आप पायेंगे कि विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए सामान्यतः एक ही जैसी तीन दवाइयाँ उनमें लिखी होती हैं। सरकारी डॉक्टर्स पर प्रतिबंध होता है कि वे 1- बाहर से ख़रीदने के लिए दवाइयाँ नहीं लिख सकते (राजकीय प्रजावत्सलता और करुणा का चरम परचम) और 2- रोगियों को चिकित्सालय में उपलब्ध दवाइयाँ ही दी जानी चाहिये (गोया दवा नहीं पंजीरी हो, चिकित्सा और फ़ार्मेकोलॉजी के इस सिद्धांत को ठेंगा दिखाते हुये कि दवा एक विशिष्ट उत्पाद है जो हर किसी के लिए कॉमन नहीं होती इसलिए हर रोगी के लिए दवा का स्पेसिफ़िक औचित्य चिकित्सक को निर्धारित करना चाहिए)।

इस सरकारी प्रमेय का समीकरण इस प्रकार स्थापित होता है... राजकीय चिकित्सालय का प्रेस्क्रिप्शन= औषधि= पंजीरी= स्वास्थ्य की ऐसी-तैसी। प्रजा को समझना चाहिये कि सरकारी दवाइयों के परिणाम सेक्युलरिज़्म के नहीं बल्कि ईश्वरीय आस्था के समानुपाती हुआ करते हैं, इसलिए सरकारी गोली खाने से पहले बजरंगबली जी का स्मरण करना ही रोगी के प्राणों को संकट से उबार सकता है।

राजकीय चिकित्सालयों में ब्रूफ़ेन को पंजीरी का पर्याय माना जा चुका है। यह विज्ञान का चमत्कार है कि सिरदर्द के लिए दी जाने वाली ब्रूफ़ेन के साइड इफ़ेक्ट्स में एक इफ़ेक्ट ख़ुद सिरदर्द भी है। दर्द, दवा, साइड-इफ़ेक्ट और रोगी के बीच की यह एक ऐसी अघोषित फ़ार्मेकोलॉजिकल ट्रीटी है जो हर रोगी के लिए बाध्यकारी होती है।

ठुकराये हुये आशिक को भरोसा होता है कि “जिसने दर्द दिया वही दवा भी देगा”। राजकीय अस्पतालों के रोगियों के मामले में यह उलटा है – “जिसने दवा दी उसी ने दर्द भी दिया”।

सरकारी चिकित्सक के सामने यह बहुत बड़ी समस्या होती है कि सेवानिवृत्त होने तक यदि वह पंजीरी बाँटने तक ही अपने को सीमित रखेगा तो वह बहुत जल्दी अपने चिकित्सा ज्ञान को खो देगा। किसी राजपाश में बँधकर चिकित्सा जैसे बौद्धिक और सतत शोधपरक कार्य को कर पाना उतना ही सम्भव है जितना कि नारियल के पेड़ से आम के फल को प्राप्त कर पाना। वैसे लोकतांत्रिक सरकारों को यह भरोसा होता है कि कुपोषित व्यक्ति से पहलवानी करवायी जा सकती है और कोड़े मार-मार कर किसी गधे से राग मल्हार गवाया जा सकना शत प्रतिशत सम्भव एवं नियमानुकूल है।

आयुर्वेद का गुणगान ही पर्याप्त है

हमारे ऋषियों-मुनियों की महान चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का गुणगान कर लेना ही पर्याप्त होता है, गोया मरते समय भगवान विष्णु का नाम ले लो और सीधे विष्णुलोक का आरक्षण पा लो।

आयुर्वेदिक औषधियों का अन्य दवाइयों की तरह हानिकारक नहीं होना ही आयुर्वेद का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। इस सद्गुण ने औषधि निर्माताओं को मिलावट की भरपूर सम्भावनायें उपलब्ध करवा दी हैं। आयुर्वेद की कुछ औषधियों में मिलावट का स्तर शून्य भी हो सकता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वह औषधि बहुत अच्छी है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह औषधि शुद्ध नकली है जिसमें औषधि का प्रतिशत शून्य है। आप इसे शुद्ध नकली कह सकते हैं। आयुर्वेद के राजकीय अस्पतालों में सत्यनारायण की कथा के कुछ अंश प्रभावी होते हैं जैसे कि –“हे महराज! आपको देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं है, हमारी नाव में तो केवल लती-पत्तरा है”।

भगवान धन्वंतरि और ऋषियों-मुनियों की महान चिकित्सा पद्धति का गुणगान करने वाले भक्त हर मौसमी व्याधि की सम्भावनाओं को देखते हुये एक शरणागती आदेश प्रसारित कर दिया करते हैं – “...मौसमी व्याधियों की सम्भावनाओं को देखते हुये सभी वैद्य अपने कर्तव्य सुनिश्चित करें और मौसमी व्याधि से ग्रस्त प्राणी को तुरंत समीप के एलोपैथी चिकित्सालय की सेवायें उपलब्ध करवायें”। भारत की प्रजा यह समझ पाने में असमर्थ है कि फिर आयुर्वेदिक वैद्यों और राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालयों को सफेद हाथी की तरह पालने का औचित्य क्या है?

कोविड-19 के चरम प्रकोप वाले युग में राजकीय वैद्यों की नकेल कस दी गयी, उनके हाथ काट दिए गये, उनकी बुद्धि पर ताले डाल दिये गये, उन्हें स्पष्टतः कह दिया गया कि वे कोविड-19 के रोगियों की आयुर्वेदिक औषधियों से चिकित्सा न करें। वहीं, निजी आयुर्वेद चिकित्सक और औषधि निर्माता इस राज-पाश से मुक्त रखे गये जिसके परिणामस्वरूप इन लोगों ने चाँदी ही नहीं काटी बल्कि सोना-हीरा-मोती सब काटा और कोविड-19 के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वह बात अलग है कि कोई भी साइंटिस्ट और कोई भी भारतीय राजा इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।      

शनिवार, 9 जुलाई 2022

थियोक्रेसी और कानून

            ब्रिटिशर्स के बारे में कुख्यात है कि वे बड़े-बड़े अपराध या कांड कानून की सीमा में रहकर करना अधिक पसंद करते थे। उन्होंने एक उत्तराधिकार नियम बनाया जिसके अनुसार ब्रिटिश सत्ता को उन भारतीय राज्यों का उत्तराधिकार मिल जाया करता था जिनके राजाओं का कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ करता था।

किसी की हत्या करनी है तो पहले एक कानून बनाकर हत्या करने का अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लो फिर हत्या करके अपनी पीठ ठोंक लो, यह कहते हुये कि देखो हम कितने नियम-कानून के पाबंद हैं! इस पूरी प्रक्रिया को आप अपनी सुविधा के अनुसार कोई भी नाम दे सकते हैं, यथा – थियोक्रेसी, कानून, दया, भाईचारा, तहज़ीब, धर्म, दीन, मज़हब... या कुछ भी।

याद कीजिये उन चौदह सौ वर्षों को जब योरोप में चर्च सर्वाधिक शक्तिशाली हुआ करते थे। पाँचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता की शक्तियाँ चर्च की ओर स्थानांतरित होने लगीं जिससे चर्च शक्तिशाली होने लगे। आठवीं शताब्दी के मध्य तक चर्च इतने शक्तिशाली हो गये कि उन्होंने कैथोलिक थियोक्रेसी को आधार बनाकर तीन पैपल स्टेट्स पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इटेलियन पेननसुला में लगभग 1100 साल तक पैपल स्टेट्स सत्ता में बने रहे। यह स्थिति सोलहवीं शताब्दी तक बनी रही।

इन 1100 सालों में सत्ता, समाज, शिक्षा, विज्ञान और व्यापार आदि की सारी शक्तियाँ चर्च के पास केंद्रित हो गयीं। चर्च अपनी इन भौतिक शक्तियों को मनमाने ढंग से बेचने लगे थे, यहाँ तक कि किसी भी पद के लिए एक निर्धारित शुल्क चर्च को देकर कोई भी व्यक्ति उसे प्राप्त कर सकता था। परिणामस्वरूप योरोप का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के दलदल में डूबता चला गया। थियोक्रेसी की सत्ता बनाये रखने के लिए वैज्ञानिक शोधों पर भी चर्चों द्वारा कड़ी नज़र रखी जाने लगी और वैज्ञानिकों को उनके शोधकार्यों के लिए दण्डित किया जाने लगा। योरोपीय समाज और विज्ञान के लिए यह एक अंधकारयुग था। सत्य और सत्ता का गला घोटा जाने लगा जिससे उन्नीसवीं शताब्दी में सत्ता को चर्च के विरुद्ध क्रांति के लिए सामने आना पड़ा और राज्यों ने चर्चों से अपनी सारी शक्तियाँ वापस छीन लीं। 11 फ़रवरी 1929 में लैटिरन ट्रीटी के द्वारा थियोक्रेसी को वेटिकन सिटी तक सीमित कर दिया गया। धार्मिक सत्ता वाले पैपल स्टेट्स टूटकर 11 स्वतंत्र राज्य बने जो बाद में इटली, फ़्रांस और वैटिकन सिटी के हिस्से हो गये।

कैथोलिक थियोक्रेसी के बाद यह एक नया युग था जब समाज, ज्ञान, विज्ञान, सत्ता, राजनीति, व्यवसाय आदि जीवन के सभी पक्षों को धर्म से मुक्त कर दिया गया। यह एक प्रतिक्रियाजन्य एवं एक और विकृत युग का प्रारम्भ था जिसने मनुष्य के आचरण को अधार्मिक बना दिया। भारत ने भी सत्ताहस्तांतरण के साथ ही योरोप के इसी विकृत युग को अपने ऊपर स्वेच्छा से थोप लिया जबकि भारत में इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। भारत में धर्म की अवधारणा पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है जिसे मोहनदास करमचंद और जवाहरलाल नेहरू ने समझने और स्वीकार करने से बिल्कुल मना कर दिया।

पाँचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के दो सौ साल बाद यानी सातवीं शताब्दी में एक और थियोक्रेसी ने जन्म लिया जिसे आज इस्लाम के नाम से जाना जाता है। अरब के लोग रोमन साम्राज्य में कैथोलिक थियोक्रेसी के बढ़ते हुये जलवे को देख रहे थे। शायद उन्हें अरब के तत्कालीन यज़ीदी धर्म में रहते हुये सत्ता पाने की कोई आशा नहीं थी इसलिए उन्होंने कैथोलिक थियोक्रेसी के प्रभावों से सीख लेते हुये एक नयी थियोक्रेसी को स्थापित किया जिसके परिणाम उनकी आशा से भी अधिक प्रभावी निकले। बहुत कम समय में इस्लामिक थियोक्रेसी ने सभी महाद्वीपों में अपनी पहुँच बना ली।   

यह इस्लामिक थियोक्रेसी का ही प्रभाव है कि दुनिया में पहला इस्लामिक रिपब्लिक होने का ताज 1956 में पाकिस्तान ने पहना। इस्लामिक मुल्क स्थापित करने का दूसरा स्थान 1958 में मौरितानिया ने बनाया, तीसरा स्थान 1979 में ईरान ने बनाया और चौथा स्थान 2004 में अफगानिस्तान ने बनाया, यानी मात्र 48 वर्षों में चार देश इस्लामिक रिपब्लिक के नाम से स्थापित हुये। एक तरह से देखा जाय तो यह पाकिस्तान की इस्लामिक विजय यात्रा है, जबकि सनातनी परम्परा के लोग अपनी संस्कृति, सभ्यता, जनसंख्या और भूखण्डों को निरंतर खोते जा रहे हैं।

भारत में अघोषित रूप से इस्लामिक थियोक्रेसी की सत्ता लगभग स्थापित हो चुकी है। आज जब ईशनिंदा के आरोप में थियोक्रेटिक्स द्वारा कमलेश तिवारी, कन्हैयालाल एवं ईश्वर सिंह की हत्या की जा चुकी है और नूपुर शर्मा की हत्या की घोषणा की जा चुकी है, हमें गैलीलियो गैलिनी और जियोर्दानो ब्रूनो को भी स्मरण कर लेना होगा।

बिना किसी अपराध के लिए क्षमायाचना कर चुकीं नूपुर शर्मा को, उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने और मृत्यु दण्ड के लिए थियोक्रेटिक्स को सौंप दिये जाने के लिये पूरे देश भर में उत्पात मचा हुआ है। याद कीजिये, बिना किसी अपराध के क्षमायाचना करने वाले गैलीलियो को क्षमादान के बाद भी बंदी बनाये रखा गया और उसी स्थिति में उनकी मृत्यु भी हुयी, जबकि ब्रूनो को 17 फ़रवरी 1600 को रोम में एक चौराहे पर जीवित जला दिया गया था। इन सभी लोगों को ईशनिंदा का आरोपी माना जाता है।

जियोदार्नो ब्रूनो की नृशंस हत्या के बाद कालचक्र चार सौ वर्ष आगे निकल चुका है किंतु इतिहास पिछले दिनों को दोहराने की ज़िद पर एक बार फिर अड़ गया है।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

अ-हत्या का आश्वासन

         क्या हत्या का समाधान हत्या ही है?

मैं मृत्युदण्ड की बात नहीं कर रहा हूँ, व्यक्तिगत और सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए तो यह भी आवश्यक है। मैं व्यक्तिगत अहंकार, सामाजिक मान्यताओं या असहिष्णुता जैसे कारणों से की जाने वाली हत्याओं की बात कर रहा हूँ।

हत्या और प्रतिहत्या की श्रृंखलाओं के परिणामों को हम भारत विभाजन के समय और फिर पिछले कुछ दशकों में सीरिया और अफ़गानिस्तान आदि में भी देख चुके हैं।

हत्या साम्प्रदायिक कारणों से हो या किसी अन्य कारण से, उसे रोका जाना चाहिये। शासकों द्वारा अपने शासितों को दिए जाने वाले आश्वासनों में यह सर्वोपरि है जिसके प्रति भारतीय शासक कभी गम्भीर नहीं रहे, आज भी गम्भीर नहीं हैं।

“जीवन का अश्वासन” लिखने के स्थान पर मैंने जानबूझकर “अ-हत्या” शब्द का प्रयोग किया है। जीवन तो ईश्वर का दिया हुआ है, उसका आश्वासन भला कौन दे सकता है! सत्ताएँ हत्या न होने देने का भय दिखाकर ही तो विशाल जनसमूह पर शासन करती आयी हैं। कुछ समय पहले एक प्रभावशाली व्यक्ति ने “प्रताड़ित न करने” के मूल्य के रूप में अपने अधीनस्थ एक अधिकारी से बीस हजार रुपये झटक लिए। भय की रचना करके ही तो सत्ताएँ प्रजा का दोहन कर पाती हैं। हम पतन की ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ जीवन की सुरक्षा की बात नहीं बल्कि हत्या न करने के आश्वासन की बात होने लगी है।

पाप और पुण्य

शिकार करना ही जिनकी आजीविका है उनके लिए क्या पाप और क्या पुण्य! जब कोई भेड़िया किसी शेरनी के बच्चों पर आक्रमण करता है तो भेड़िये की दृष्टि में यह उसका अधिकार है जबकि शेरनी की दृष्टि में अक्षम्य अपराध। पाकिस्तान में बुरहान बानी की शहादत मनायी गयी जिससे भारत के लोगों में रोष है। सुरों और असुरों के मूल्य एक से नहीं होते, जो हमारे लिए पाप है वही पाकिस्तान के लिए पुण्य है। अद्भुत बात तो यह है कि विचित्र सिद्धांत वाले लोग पाप और पुण्य को एक ही गुलदस्ते में सजाने का हठ कभी छोड़ना नहीं चाहते जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि भूखे भेड़िये गुलदस्ते में सो रहे सिंहशावकों को मार कर खा जाते हैं। भारत के मामले यह और भी विचित्र है जहाँ सिंहशावक ही भेड़ियों के गुलदस्ते में सोने का हठ करते रहे हैं।   

कोई आक्रामक हमारी दृष्टि में पापी हो सकता है किंतु स्वयं अपनी दृष्टि में वह अपने उन अधिकारों का प्रयोग कर रहा होता है जो हर शासक अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए करता आया है। पाकिस्तान और भारतीय कश्मीर में जिन लोगों की शहादत की बरसी मनायी जाती है वे उनकी दृष्टि में उनके नायक हैं जबकि भारत की दृष्टि में आतंकवादी। वे मानते हैं कि यदि जिन्ना और नेहरू को शासक बनने का अधिकार था तो यही अधिकार उन्हें भी क्यों नहीं! जिंगेज ख़ान, तैमूर लंग, माओजेदांग, लेनिन और स्टालिन बनने की महत्वाकांक्षा लिए ये लोग किसी लोककल्याण के लिए यह सब नहीं करते। यदि इनमें लोककल्याण की भावना होती तो वे संत बनने की बात सोचते, सत्ताधीश बनने की नहीं।

भौतिक सुखों के चरम को राज सुख में देख पाने वाले लोगों को पृथक सत्ता की तीव्र लालसा होती है – ममता, महबूबा, केजरीवाल, अब्दुल्ला, अफ़ज़ल गुरु, बुरहानबानी और यासीन मलिक जैसे लोग इसी श्रेणी के लोग हैं जो निरंकुश साम्राज्य स्थापित करने के लिए सतत संघर्षशील रहते हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

सत्ता और शासन का चीनी प्रादर्श

  लगातार  इन्फ़्लेशन और रीसेशन के बीच आर.बी.आई. के पूर्व गवर्नर रघुराजन ने फिर चेतावनी दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह भूलुण्ठित होने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। उनके अनुसार यदि आर्थिक और औद्योगिक-तकनीकी सुधारों की ओर तत्काल गम्भीरतापूर्वक ध्यान न दिया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह धराशायी हो जायेगी।

इन सुधारों का दायित्व किस पर है?

क्या भारत में लोकतंत्र की अवधारणा एक असफल प्रयोग हो कर रह गयी है?

भारत की जनता ने पिछले कुछ दशकों से केवल सत्ता की छीना-झपटी को ही देखा है। सरकार गिराने, बनाने और बचाने में पाँच साल तक कलाबाजियाँ करने वाले कुछ लोगों की जेब में समा चुके भारत को अब आंतरिक संघर्षों की आग में जलते हुये देखा जा रहा है जिसकी लपटें अराजकता, गृहयुद्ध और विखण्डन के स्पष्ट संकेत दे रही हैं। कृषि, आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी सुधारों की ओर ध्यान देने का समय ही किसके पास है! सरकारी औद्योगिक प्रतिष्ठान निरंतर घाटे में ही डूबे रहने की कसम खाये बैठे हैं और लालफीताशाही अपने एक अलग ही साम्राज्य में आत्ममुग्ध है।    

आज से लगभग चौबीस शताब्दी पूर्व सोलह महाजनपदों वाले विश्व के प्रथम गणतांत्रिक वृज्जिसंघ की व्यवस्था को लिच्छवियों की राजधानी वैशाली में धूल-धूसरित होते हुये यह देश देख चुका है। पिछले वर्ष हमने एक काल्पनिक देश खालिस्तान के ध्वज को लाल किले पर लहराते हुये देखा है। सत्ता और सत्य का अब आपस में दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा। कोई भी सत्ता जब सत्य, विद्वान और चिंतकों को धता बताने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वह सत्ता तो बिखरेगी ही, देश भी बिखरेगा – अट्टकुल के वृज्जिसंघ की तरह, ओट्टोमन साम्राज्य की तरह, सन् 1947 के भारत की तरह और यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ सोवियत रूस की तरह।   

  स्पष्ट कर दूँ कि सैद्धांतिकरूप से मैं वर्तमान कम्युनिज़्म का समर्थन नहीं करता। हमें पीछे मुड़कर देखने की अनुमति नहीं है इसलिए मौर्यकालीन भारत के प्रादर्श पर चर्चा के बारे में तो सोचना भी अपराध है। हमें किसी अन्य विकल्प पर ही विचार करना होगा। निस्संदेह चीन हमारा शत्रु है किंतु यदि भारत के विकास में उधार का लोकतंत्र सफल नहीं हो पा रहा है तो क्यों नहीं हमें भारत में सत्ता और शासन के लिए चीनी प्रादर्श पर चिंतन करना चाहिए? जब उधार ही लेना है तो पश्चिम से क्यों, पूर्व से क्यों नहीं!

जिस साम्यवाद की हम आलोचना करते नहीं थकते उसी साम्यवाद ने चीन को आज विश्व की महाशक्ति बना दिया है, जबकि अतिप्रशंसनीय लोकतंत्र ने भारत को अराजकता, निरंकुशता और गृहयुद्ध में झोंक दिया है। लोकतंत्र की सफलता की चाबी एक आदर्श और साफ-सुथरे समाज के पास होती है, बिखरे हुये और दास मानसिकता वाले समाज के पास नहीं। भारत जैसे अराजक और स्वेच्छाचारी समाज के लिए या तो कबीला तंत्र अच्छा है या फिर कुछ सुधार के बाद चीनी साम्यवाद!

आधुनिक भारत में खुलेआम हत्या, सामूहिक नरसंहार और यौनदुष्कर्म की धमकियों को चीख-चीख कर न्यायसंगत ठहराने वाले अतिबुद्धिजीवियों की फौज़ के होते हुये किसी औद्योगिक या तकनीकी सुधार के बारे में सोचा भी कैसे जा सकता है!

क्या आपको नहीं लगता कि भारत अफीम की पिन्नक में डूब चुका है!


लोकतंत्र की ऐसी-तैसी का अधिकार

टीवी चैनल्स पर रावण से विष्णु के बारे राय पूछी जाती है, किसान से ब्रेन सर्जरी का तरीका पूछा जाता है, इंजीनियर से ध्रुपद गायन के लिए कहा जाता है और तस्लीम रहमानी एवं वारिस पठान से सिगरेट पीती हुयी काली पर टिप्पणी करने के लिए कहा जाता है क्योंकि यह लोकतंत्र है और हर किसी को किसी भी विषय पर अपनी राय बनाने और उसे सार्वजनिक करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। जेबी पारदीवाला के सुर में बोलूँ तो वाकई बहुत सारे विवादों को समाप्त करने के लिए टीवी चैनल्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाये जाने की आवश्यकता है।

इस्लामिक आराध्यों पर टिप्पणी करने का लोकतांत्रिक अधिकार किसी सनातनी को नहीं है पर महान टीवी चैनल्स वाले सनातनी आस्थाओं पर टिप्पणी करने के लिए किसी संत या दार्शनिक को नहीं बल्कि तस्लीम रहमानी और वारिस पठान को आमंत्रित करते हैं। सीएनबीसी आवाज की जय हो!

रविवार, 3 जुलाई 2022

अपने गौरव को विस्मृत करने वाला भारत

            भारत पर मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के साथ ही इस्लामिक विस्तारवाद ने सन् 712 में भारत में प्रवेश किया। महाराजा दाहिर के वध और भारत के दुर्भाग्य के साथ युद्ध का अंत हुआ। पड़ोसी राजाओं ने सिंध के राजा को सहयोग नहीं किया, वहीं सिंध के बौद्धों ने स्थान-स्थान पर कासिम और उसकी सेना का स्वागत करके यह बता दिया कि अपने देश के साथ विश्वासघात करने में भी कोई बुराई नहीं। यद्यपि बाद में उनकी यह धारणा उनके लिए भी आत्मघाती ही सिद्ध हुयी। मोहम्मद बिन कासिम सिंध की महारानी के साथ-साथ राजकुमारियों और रनिवास की अन्य स्त्रियों को भी बंदी बनाकर अपने साथ दमिश्क ले गया। देवल के मंदिर को ढहा कर कासिम ने भारत में इस्लाम की नींव रख दी। बौद्धों ने ब्राह्मण राजा से अपना राजनीतिक बदला तो ले लिया, लेकिन भारत को उसकी बहुत बड़ी कीमत आज भी चुकानी पड़ रही है।

सन् 669 में जन्मे चच वंश के तीसरे और अंतिम राजा की आज जयंती है जिसे पाकिस्तानी सिंधी कई वर्षों से मनाते आ रहे हैं। पाकिस्तान में आज भी कुछ ऐसे राष्ट्रवादी मुस्लिम हैं जो भारत को अपना राष्ट्र मानते हैं और सनातनियों को अपना पूर्वज। वे राजा दाहिर पर गर्व करते हैं, जबकि अरबों से लड़ते हुये भारत के लिए बलिदान होने वाले सनातनी राजा को भारत ने भुला दिया। भारत में अरबों के प्रवेश का विरोध करने वाले प्रथम राजा के प्रति अपनी कृतघ्नता के लिए हम दोषी हैं।

आज जबकि अरबी अपसंस्कृति भारत के अस्तित्व के लिए ही चुनौती बन गयी है, हमें अपने राष्ट्रपुरुषों का स्मरण कर अरबी प्रतिकार के लिए तैयार होना होगा। कोई मनाये या न मनाये, हम तो प्रतिवर्ष राजा दाहिर की जयंती मनाने के लिए संकल्पित हैं।  

चचवंशी महाराजा दाहिर अमर रहें।