सोमवार, 6 मई 2024

राष्ट्रधर्म

            सनातनराष्ट्र की रक्षा ही जिनके लिये सर्वोपरि धर्म रहा उन्हीं राजपूतों के एक संगठन ने भाजपा को हराने की शपथ लेकर स्पष्ट कर दिया है कि वे उन राजनीतिक दलों के साथ खड़े हैं जिन्हें न राष्ट्र की कोई समझ है और न किसी धर्म की । राजपूतों का यह संगठन उन लोगों के साथ खड़ा हो गया है जिनके पूर्वजों ने लोकतंत्र की हत्या करके स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, अपनी मान्यताओं और सुविधाओं के लिये संविधान में इतनी बार परिवर्तन किये कि संविधान उन लोगों की स्वार्थपूर्ति का माध्यम बन कर रह गया जो देश के विभाजन के लिये उत्तरदायी थे । उनकी रीतियों-नीतियों ने बहुसंख्यक सनातनी हिन्दुओं को भारत के द्वितीय श्रेणी के नागरिक बना कर रख दिया जिससे बहुसंख्यक वर्ग के लोग बेचारे बनकर रह गये । आज हिन्दू अपने ही देश में भयभीत होकर रहने के लिये विवश है । यह कैसा संविधान है जिसके होते हुये भी आज किसी हिन्दू का सर तन से जुदा करने का फतवा निकाल दिया जाता है, किसी हिन्दू स्त्री (नूपुर शर्मा) के साथ यौनहिंसा करने की खुलेआम घोषणा कर दी जाती है, किसी भी हिन्दू की सरेआम हत्या कर दी जाती है, किसी भी हिन्दू लड़की को निकाह या यौनशोषण के लिए उठा लिया जाता है, कहीं भी राष्ट्रीय और निजी सम्पत्तियों को आग लगा दी जाती है।

            ऐसा क्यों हुआ कि भारतविभाजन के लिये वोट करने वाले लोग भारत में ही बस गये और अब वही लोग पूरे भारत को इस्लामिक मुल्क बना देने के लिये तैयार हो चुके हैं। सोचिये! साम्प्रदायिक हिंसाओं और सैनिकों पर आक्रमण करने के स्थान पर यदि हम सब केवल देश के विकास के लिए काम करते तो आज हम विश्व की सर्वश्रेष्ठ अर्थव्यवस्था के स्वामी होते, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। हमारी जो ऊर्जा और धन देश के विकास में लगना चाहिये था वह दंगों और आतंकी आक्रमणों से जूझने में व्यय हो रहा है।

            हम सब जानते हैं कि मँहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के लिये हम सब भी उतने ही दोषी और उत्तरदायी हैं जितने कि राजनेता। हाँ! यही सच है, इसलिये यह रोना मत रोइये, तुम जिस दिन चाहोगे उसी दिन से यह सब समाप्त हो जायेगा। भारत में रामराज्य लाने की इच्छाशक्ति हम लोगों में ही नहीं है। हम सब निजी स्वार्थों के लिये अवसरों की तलाश में रहते हैं, भूखे भेड़ियों की तरह। किंतु... अब स्थितियाँ बहुत विषम हो चुकी हैं। क्या आप भारत को पाकिस्तान बना देना चाहते हैं? क्या आप उन सनातन मूल्यों और आदर्शों की बलि चढ़ा देने के लिये तैयार हैं जिनकी प्रशंसा पूरा विश्व करता रहा है?

            आज सुबह शेयर बाजार ऊपर उठकर खुलने वाला था पर ऐसा नहीं हुआ, जानते हैं क्यों? महाराष्ट्र से समाचार आया कि वहाँ भाजपा के विरोधी प्रबल हो रहे हैं। समाचार सुनते ही लोगों में घबराहट फैल गयी कि यदि मोदी दोबारा सत्ता में नहीं आये तो यह देश बिक जायेगा। दूसरी ओर ब्रिटेन में ऋषि सुनक की कंजरवेटिव पार्टी के सामने मुस्लिम बहुल लेबर पार्टी भारी पड़ने लगी है। बस इसी घबराहट में भारतीय और विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार में बिकवाली शुरू कर दी। आप कहेंगे कि आपको शेयर बाजार से क्या लेना देना! यह शेयर बाजार ही है जो किसी भी देश के अर्थतंत्र की औद्योगिक साँस है और देश की आर्थिक दिशा को समृद्धि की ओर ले जाता है।

                देश के नेता को जाति-धर्म से ऊपर उठकर सर्वकल्याण की भावना से काम करना चहिये। सनातन आदर्शों का यह एक मुख्य मंत्र है । किंतु दुर्भाग्य से अल्पसंख्यक ग़ैर हिन्दू ऐसा नहीं सोचते । उन्हें अपने लिए एक ऐसा राष्ट्र चाहिये जहाँ हर काफिर उनका दास बनकर रह सके । हिन्दूराष्ट्र की व्यवस्था में इस तरह की कभी कोई संकीर्णता नहीं रही, आगे भी नहीं रहेगी, किंतु तब इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सब हिन्दू और उनकी विभिन्न शाखाओं के लोग संगठित हों और विश्व में एक हिन्दूराष्ट्र की स्थापना करें जहाँ हिन्दू निर्भय होकर अपनी सनातनी मान्यताओं और मूल्यों के साथ रह सकें, …जहाँ मुसलमान, ईसाई और पारसी भी अपनी-अपनी मान्यताओं के साथ राष्ट्रीय उत्थान के भागी बन सकें न कि साम्प्रदायिक हिंसा से देश को कलंकित करें और दूसरों के अस्तित्व को ही समाप्त करने वाले कृत्य करें!

                हमारी चिंता में जातिगत संकीर्णता का कोई स्थान नहीं होना चाहिये । हम सवर्णों, पिछड़ों, दलितों या वनवासियों आदि की बात करने के स्थान पर मनुष्य और वंचित की बात क्यों नहीं करते? हमारी चिंता इन संकीर्णताओं के स्थान पर केवल उन मूल्यों के लिए है जो उदार हैं, जो सर्वग्राही हैं, जो सहिष्णु हैं और जो सर्वे भवंतु सुखिनः के सिद्धांत के साथ सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। हमें स्वामी विवेकानंद और बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के चिंतन के अनुरूप इस देश को बनाने के लिए मतदान से पहले इन सभी बातों पर विचार करना ही होगा।     

शनिवार, 4 मई 2024

*मुसलमानों को नहीं स्वीकार हैदर शेख से हरि नारायण*

इंदौर में २७ अप्रैल को हैदर शेख ने सपरिवार सनातन विचारधारा को स्वीकार कर लिया। हैदर शेख से हरि नारायण बनना पड़ोसी पुसलमानों को स्वीकार नहीं है, उन्होंने पहले तो हत्या कर देने की धमकियाँ दीं फिर हरिनारायण के घर पर पथराव कर दिया। हरिनारायण ने धमकी की सूचना पुलिस को दी थी पर पुलिस और सेना पर पथराव करने वाले निडर हुआ करते हैं। मुस्लमीन के नेता असदुद्दीन इस्लाम की घटती साख से चिंतित हैं। विश्वहिन्दू परिषद इसे धर्मांतरण नहीं बल्कि घर वापसी मानता है। विधिक दृष्टि से भारत में धर्मांतरण पर प्रतिबंध नहीं है, प्रतिवर्ष न जाने कितने गैरमुसमान लोग मुसलमान बन जाते हैं, जिसे इस्लामिक नेता शुभ अवसर मानते हैं। यह सर्वविदित है कि गैरमुसलमानों को मुसलमान बनाने के कई अभियान दुनिया भर में चलाये जा रहे हैं जिसे वे इस्लामिक आदेश मानते हैं और इसके लिए मानवता की किसी भी सीमा को तोड़ने के लिए सदैव तैयार रहते हैं। ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे देश इस बात को लेकर चिंतित होते रहे हैं।

हैदर शेख ने अपने पूर्वजों के धार्मिक विचारों, आदर्शों और समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपनी सनातन प्रतिबद्धताओं में स्वेच्छा से विश्वास व्यक्त किया और घर वापसी की जिसे धर्मांतरण नहीं माना जा सकता। वास्तव में धर्मांतरण जैसा कुछ होता ही नहीं है, हम या तो धार्मिक होते हैं या फिरअधार्मिक।

सैद्धांतिक रूप से भी धर्मांतरण एक रूढ़ शब्द है जिसका कोई तात्विक अर्थ न होकर वाचिक अर्थ भर है, और यह है एक सम्प्रदाय से दूसरे सम्प्रदाय में विचारांतरण, जैसा कि राखी सावंत करती रही हैं। उन्होंने हिन्दूआदर्शों एवं सिद्धांतों का परित्याग कर पहले ईसाई आदर्शों एवं सिद्धांतों को और फिर उनका भी त्याग करके इस्लामिक आदर्शों एवं सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

राजनेता और मीडिया जिसे “धर्मांतरण” कहते हैं और विश्वहिन्दू परिषद के लोग “घर वापसी” कहते हैं, वास्तव में वह मानवता, जीवनशैली, समाज और राष्ट्र के प्रति विचारांतरण है। दुनिया भर में, विशेषकर भारत में नयी पीढ़ी के कुछ मुसलमानों ने “पूर्व मुसलमान” के रूप में अपनी पहचान बना ली है। ऐसे लोग स्कैंडिनेवियंस की तरह किसी साम्प्रदायिक प्रतिबद्धता से बँधने की अपेक्षा मानवतामुखी विचारों और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध होने का प्रयास करते हैं। वे लोग भले ही इसे “नो रिलीजन” कहते हों पर वास्तव में यही तो वह सार्वकालिक धर्म है जो सनातन है। इसके अतिरिक्त तस्लीमा नसरीन और नाजिया इलाही जैसे भी न जाने कितने मुसलमान हैं जिनकी प्रतिबद्धतायें मुस्लिम प्रतिबद्धताओं से अलग हैं। साम्प्रदायिक प्रतिबद्धताओं को लेकर भारतीय पारसियों ने बड़े ही अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, उनकी जीवनशैली भले ही पारसी हो पर भारत के प्रति उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धताओं ने उन्हें सम्मान के शीर्ष स्थान पर पहुँचा दिया है।

तथाकथित धर्मांतरणों को लेकर भारत में साम्प्रदायिक क्रूरहिंसा होती रही है इसलिये नेताओं और मीडिया को धर्मांतरण जैसे अतात्विक और संवेदनशील शब्दों को गढ़ने एवं प्रचारित करने से पहले इनके दूरगामी और नकारात्मक परिणामों पर गम्भीरता से चिंतन करना चाहिये। भारत विभाजन के समय हुयी साम्प्रदायिक हिंसा के व्रण अश्वत्थामा के माथे के व्रण की तरह मानवता के व्रण बन चुके हैं। स्वतंत्र भारत में जब-जब साम्प्रदायिक घटनायें होंगी तब-तब हमें हठी मोहनदास के यूटोपियन थॉट्स व्यथित करते रहेंगे।   

बुधवार, 1 मई 2024

कलारों वाला बाग

 


अपनी वृद्धावस्था से जूझता यह वृक्ष ... कलारों वाले बाग का एकमात्र शेष सदस्य है जो साक्षी हुआ करता था हर उस लूटमार का जो सूरज डूबते ही राहगीरों के साथ आये दिन हुआ करती थी । कानपुर से बालामऊ जाने वाली पैसेंजर गाड़ी सूरज डूबने के बाद ही दो-तीन मिनट के लिये इस हाल्ट पर आकर खड़ी हुआ करती थी । गाड़ी का समय आज भी वही है पर पहले की तरह राहजनी अब यहाँ नहीं होती । राहजनी, सेंधमारी और डकैती जैसे अपराध आजकल अब होते ही कहाँ हैं! आधुनिक तकनीक ने उन्हें बेदखल कर दिया है और उनका स्थान अब साइबर क्राइम ने ले लिया है ।

मैं उस वृक्ष की बात आपको बता रहा था जो न जाने कितने अपराधों का मौन साक्षी हुआ करता था । अब उसे किसी के आने की प्रतीक्षा नहीं होती, निश्चिंतता ने उसे संसार के प्रति उदासीन बना दिया है । आँधियों ने उसकी शाखायें छीन लीं, उसका रूप-स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा । सूरज डूब चुका है और गाड़ी भी आने ही वाली है, मैं घूम-घूम कर उस वृक्ष को नीचे से ऊपर तक बार-बार देखता हूँ जिसके पास अपराधों की न जाने कितनी साक्षियाँ हैं ...जिन्हें कोई न्यायालय आज तक देख नहीं सका ।

यहीं कहीं ...या यहाँ से कुछ आगे खिरनी का भी एक पेड़ हुआ करता था जो अब नहीं है । कई दशक बाद एक दिन जॉली बाबा के राजमहल में खिरनी के कुछ वृक्ष देखे थे, पीली-पीली खिरनियों से लदे हुये, जिन्हें देखते ही उछल पड़ा था मैं । हमारे गाँव के बाहर भी खिरनी वाला एक बाग हुआ करता था जो अब नहीं है । एक बार गोराई बीच पर खिरनी बिकते देखी तो मैंने दद्दू से कहा था – “चलो आज खिरनी खाते हैं”। मुझे आश्चर्य हुआ, दद्दू को खिरनियों के बारे में पता ही नहीं था जबकि उनका घर बोरीवली में गोराई समुद्र के पास ही है । जॉली बाबा को भी कहाँ पता था! मैंने एक खिरनी उठाकर मुँह में डाली तो उन्होंने पूछा – “इज़ इट एडिबल?” मैंने कहा – “आप भी खाकर देखिये, आपके विदेशी अतिथियों को बहुत पसंद आयेगी”।

मैंने शिवस्वरूप से पूछा – “खिरनी का पेड़ नहीं दिख रहा कहीं”। उत्तर मिला – “कलारों वाला बाग भी तो कहाँ रहा अब!”

कोविड वैक्सीन और हृदयरोग

     एंटीकोविड वैक्सीन कोवीशील्ड और बाबा रामदेव की इम्युनिटी बूस्टर कोरोनिल औषधि पर वैज्ञानिकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गम्भीर चिंतन की आवश्यकता है। कोरोनिल को लेकर शीर्ष न्यायालय के निर्णय कुछ भी हों (न्यायालय वैज्ञानिक नहीं है) किंतु अब कोरोनिल के घटक द्रव्यों पर क्लीनिकल ट्रायल होने ही चाहिये जिससे बाबा ऑस्टिन जयलाल को यह पता लग सके कि कोरोनिल स्वास्थ्य के लिये कितनी हानिकारजक या लाभदायक है।   

कई वर्षों के बाद एस्ट्रा जेनिका निर्मित कोवीशील्ड से होने वाले घातक कॉम्प्लीकेशंस एक बार फिर चर्चा में हैं। वायरोलॉजी और इम्यूनोलॉजी पढ़ने के बाद मैं अपने छात्र जीवन से ही सैद्धांतिकरूप से वायरसजन्य इन्ड्यूस्ड इम्यूनाइजेशन के पक्ष में नहीं रहा हूँ। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि अठारहवीं शताब्दी में जिस समय योरोप में मलेरिया मृत्यु का पर्याय बन चुका था तब भारत में भिंड और बनारस के ब्राह्मण घूम-घूमकर देश भर में इम्यूनाइजेशन किया करते थे जो एक तरह से वैक्सीनेशन का ही तत्कालीन स्वरूप था । भारत की ब्रिटिश सरकार के अधिकारी इस वैक्सीनेशन के विरोधी थे किंतु बाद में उन्होंने इसकी प्रशंसा की और यह जानकारी ब्रिटेन तक पहुँचायी।  

  मैं ही नहीं, विश्वस्तर के कई वैज्ञानिक भी वैक्सीन के मुखर विरोधी रहे हैं । हम इस विषय में फिर कभी चर्चा करेंगे, अभी तो अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के उस एक्ट की बात करते हैं जिसे FALCPA (Food Allergen Labeling and Consumer Protection Act of 2004) के नाम से जाना जाता है । अमेरिका में centre for food safety and applied nutrition जैसी खाद्य सुरक्षा एवं पोषण को लेकर कई संस्थायें बहुत सजग हैं जिनकी रिपोर्ट के आधार पर कुछ खाद्य-पेय पदार्थों को हानिकारक चिन्हित किया गया है । इसके कारणों पर भी विस्तृत चर्चा की जानी चाहिये, फ़िलहाल उन चौदह खाद्य पदार्थों के नाम जान लेना आवश्यक है जिनके सेवन से हमारे शरीर में गम्भीर प्रकार की अनूर्जता (एलर्जी) उत्पन्न हो सकती है । ये खाद्य पदार्थ हैं –

1-    Cereals containing gluten – जिनमें गेहूँ, जौं, राई और ओट्स सम्मिलित हैं ।  

2-    Crustaceans – जिनमें केकड़ा, झींगा और झींगा-मछली सम्मिलित हैं ।

3-    Eggs – अंडा (जिसे “संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे” के नारे के साथ बच्चों को खाने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है)। 

4-    Fish – मछली जो दुनिया भर में मुख्य मांसाहार माना जाता है।

5-    Peanuts – मूँगफली (बच्चे जिसके दीवाने रहते हैं)। 

6-    Soybeans – सोयाबीन (जिसकी बड़ी से लेकर तेल, दूध और मिठाइयाँ तक बनाई जाती हैं)।

7-    Milk – दूध (भारत में अधिक दूध उत्पादन के लिये श्रीमान् कूरियन की श्वेतक्रांति प्रसिद्ध रही है)।

8-    nuts – सूखे मेवे (almonds, hazelnuts, walnuts, cashews, pecan nuts, brazil nuts, pistachio nuts)

9-    Celery – अजवायन (भारतीय रसोयी का लोकप्रिय मसाला)।  

10- Mustard – (सरसों/ राई)

11- Sesame seeds – (तिल के तेल से लेकर न जाने कितने व्यंजन भारत में लोकप्रिय हैं)

12- Sulpherdioxide and sulphates (at concentration of more than 10 mg /kg or 10 mg/L in terms of total sulpherdioxide) used as a preservative.  

 

इन सभी खाद्य पदार्थों और खाद्य संरक्षकों के गम्भीर साइड-इफ़ेक्ट्स अब सर्व विदित हो चुके हैं । कोवीशील्ड को लेकर चिंतित होने वाली लॉबी को इन खाद्य पदार्थों के लिए भी चिंतित होने की आवश्यकता क्यों नहीं होती है? एक समस्या और भी है, गेहूँ, जौं, सोयाबीन, मूँगफली, तिल, सूखे मेवे, सरसों, अजवायन और दूध जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन छोड़ भी दिया जाय तो फिर खाने के लिए बचता ही क्या है?

विदेशों में भारतीय मसालों पर प्रतिबंध

मैं संतुष्ट हूँ कि कुछ भारतीय निर्माताओं के मसालों पर विदेशों में प्रतिबंध लगा दिया गया है । सम्भव है कि अब भारत में भी प्रतिबंध के कारणों को लेकर चर्चा प्रारम्भ हो और लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों ।   

अरब, मिस्र और योरोप के व्यापारियों की पहली पसंद रहे भारतीय मसाले, जिनके कारण भारत दीर्घकाल तक विदेशी दासता में बँधा रहा, अब अपयश के कारण बनने लगे हैं । पहले सिंगापुर एवं हांगकांग और फिर मालदीव ने भी एवरेस्ट और एम.डी.एच. के चार मसाला मिश्रणों को प्रतिबंधित कर दिया है । इन देशों की सरकारों के अनुसार चार प्रकार के इन मसाला मिश्रणों में कैंसर उत्पादक कीटनाशक एथिलीन ऑक्साइड की उच्च मात्रा पायी गयी है ।  

भारत में एवरेस्ट और एम.डी.एच. (महाशियाँ दी हट्टी) के मसाला उत्पाद बहुत लोकप्रिय माने जाते हैं । भारत में स्थानीय स्तर पर मिलने वाले मसाला उत्पादों में आर्सेनिक की मात्रा पाये जाने के समाचारों से हम सब समय-समय पर अवगत होते रहते हैं किंतु उपभोक्ताओं में जिस प्रकार की जागरूकता होनी चाहिये उसका सर्वथा अभाव ही प्रायः देखने को मिलता रहा है ।

घातक कीटनाशक मसालों और अनाजों में ही नहीं अच्छी कम्पनीज़ के मधु में भी पाये जाते रहे हैं । जागरूक उपभोक्ताओं को भारत में कैंसर, मधुमेह और यकृत के रोगियों की बढ़ती संख्या के कारणों पर भी चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है । रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध व्यवहार ने वैज्ञानिकों को चिंतित किया है। आम आदमी को इस सबसे कोई लेना देना नहीं होता चाहे वह कृषक हो या उपभोक्ता पर यह तो सरकार का भी दायित्व है कि कृषि में व्यवहृत होने वाले इन घातक रसायनों को प्रतिबंधित करने के लिये कठोर कदम उठाये । जनता की सेवा करके अपार सम्पत्ति के मालिक बन गये मंत्रीगण और रिश्वतखोर अधिकारी तो ऑर्गेनिक मसाले और अनाज का उपयोग कर सकते हैं पर आम ऊपभोक्ता के पास बाजार पर निर्भर रहने के अतिरिक्त और कोई उपाय है भी तो नहीं; इसीलिये मसालों को हम घर पर ही तैयार करने के पक्ष में परामर्श देते रहे हैं, जिसका महिलाओं ने कभी समर्थन नहीं किया । किंतु यह दायित्व महिलाओं का ही नहीं, पुरुषों का भी है । तात्कालिक रूप से इसके अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है । कम से कम हम प्रोसेस्ड मसालों में मिलाये जाने वाले हानिकारक प्रिज़र्वेटिव्स से तो स्वयं को सुरक्षित रख ही सकते हैं ।       

 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

कोरोना में जीसस की भूमिका और आयुर्वेद

३० मार्च २०२१, ऑप इंडिया http://www.opindia.in में प्रकाशित समाचार के अनुसार इण्डियन मेडिकल कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर जॉन रोज़ ऑस्टिन जयलाल का मोदी पर आरोप है कि “मोदी सरकार आयुर्वेद में इसलिए विश्वास रखती है क्योंकि उनके सांस्कृतिक मूल्य और आस्था हिन्दुत्व में हैं । आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी और योग इत्यादि की जड़ें संस्कृत में हैं जो हिन्दुत्व की भाषा है । सरकार आयुर्वेद के माध्यम से लोगों के दिल-ओ-दिमाग में संस्कृत भाषा को घुसाना चाहती है” । “हिन्दुओं में कई देवता होते हैं इसलिये उन्हें अब जीसस और मोहम्मद को ईश्वर मान लेना चाहिये । हर ईसाई का यह कर्तव्य है कि वह बाइबिल का संदेश सभी तक पहुँचाये” ।

आई.एम.ए. के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था कि वे “आज जो भी हैं वह जीसस क्राइस्ट का गिफ़्ट है और कल जो होंगे वे भी उनके ही गिफ्ट होंगे”।

क्रिश्चियन टुडेके एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि महामारी के बावज़ूद ईसाई मज़हब आगे बढ़ रहा है

कोरोना काल में उन्होंने जीसस को क्रेडिट देते हुये बताया कि कि लोग उनकी कृपा से ही सुरक्षित हैं और इस महामारी में उन्होंने ही अभी की रक्षा की है । कन्याकुमारी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रोफ़ेसर ऑस्टिन जयलाल भारत में चिकित्सा के माध्यम से ईसाई धर्म को प्रचारित करना चाहते हैं, समय-समय पर उनके भाषणों और साक्षात्कारों के कुछ अंश ध्यान देने योग्य हैं –

“...मैं चाहता हूँ कि आई.एम.ए. जीसस क्राइस्ट के प्यार को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाये कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं“।

 “... चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया”।

सारांश यह है कि आयुर्वेद की जड़ें संस्कृत भाषा और सांस्कृतिक मूल्य हिन्दू आस्था जुड़ी हुयी हैं जो जयलाल को पसंद नहीं है। इसीलिये प्रोफ़ेसर जयलाल ऑस्टिन बाबा रामदेव और आयुर्वेद को अपनी विकृत मानसिकता के वायरस से संक्रमित करने के लिये पीछे बिना हाथ धोए पड़ गये ।

आयुर्वेद की जड़ें, संस्कृति, संस्कृत भाषा, देवी-देवता, हिन्दुत्व, जीसस की कृपा, कोरोना से सुरक्षा ...आदि के सम्बंध में बाबा ऑस्टिन जयलाल के वक्तव्यों को “आपत्तिजनक विज्ञापन (प्रचार-प्रसार) अधिनियम १९५४” के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता, यद्यपि-किंतु-परंतु-तथापि... मी लॉर्ड की कृपा है कि डॉक्टर ऑस्टिन जयलाल “...हंस चुनेगा दाना-तिनका कौआ मोती खायेगा...” वाला सुख प्राप्त कर रहे हैं और बाबा रामदेव चार बार क्षमायाचना करने के बाद भी क्षमा का लाभ प्राप्त कर पाने से वंचित हैं ।  

भ्रामक विज्ञापन और बाबा रणछोड़ दास

(औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम १९५४ के संदर्भ में) 

भ्रामक विज्ञापन प्रकाशन के आरोप पर बाबा रामदेव ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर हुंकार भरी जिससे आयुर्वेद को वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानने वाले लोग उत्साहित हो गये पर बाबा अपनी हुंकार पर दृढ़ नहीं रह सके और एक-दो बार नहीं बल्कि चार बार क्षमा याचना करने के बाद भी न्यायालय से उन्हें मुक्ति नहीं मिल पा रही है। कुछ वर्ष पहले भी बाबा एक जन आंदोलन में पुलिस से बचने के लिए महिला का सलवार कुर्ता पहनकर भाग चुके हैं। बाबा के चिंतन और आचरण में दृढ़ता का अभाव लोगों को निराश करता है।

बाबा अपनी औषधियों को प्रामाणिक और शोध-आधारित बताते रहे हैं। उनके दावों और क्षमायाचना के बीच कोई तालमेल दिखायी नहीं देता। क्या यह औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के दबाव का परिणाम है या सचमुच आयुर्वेदिक औषधियाँ प्रमाण और शोध-आधारित नहीं हुआ करतीं?

पहले हम उस अधिनियम के बारे में चर्चा करना चाहते हैं जिसके अंतर्गत बाबा रामदेव अपयश के भागी हो चुके हैं । आज से ६८ वर्ष पहले   जम्मू-कश्मीर को छोड़कर शेष भारत के लिये “ड्रग्स एण्ड मैजिक रेमेडीज़ अधिनियम १९५४” को चिकित्सा व्यवसाय में लागू किया गया था जिसके अनुसार कथित औषधियों का विज्ञापन निषिद्ध घोषित कर दिया गया । लगभग सात दशक व्यतीत हो जाने के बाद भी इस अधिनियम में किसी परिवर्तन का न किया जाना इस बात का प्रमाण है कि इन सात दशकों में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में कोई शोध या उन्नति नहीं हो सकी और चिकित्सा जगत को चिकित्सा के लिये कई अनुमानों, कल्पनाओं और विरोधाभासों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यदि सर्वोच्च न्यायालय ऐसा मानता है तो यह बहुत गम्भीर और चिंतनीय स्थिति है क्योंकि इस बीच शोध कार्यों पर अंधाधुंध पैसा व्यय किया जाता रहा है और उनके परिणामों पर मीलॉर्ड ने विचार करना भी उचित नहीं समझा ।      

इस अधिनियम के अनुसार ५४ प्रकार के प्रतिबंधित रोग, विकार या स्थितियों के नाम इस प्रकार हैं

अपेंडिसाइटिस, धमनीकाठिन्य, अंधापन, रक्तविषाक्तता, ब्राइट्स रोग (नेफ़्राइटिस) या यूरेमिया, कैंसर, मोतियाबिंद, बहरापन, मधुमेह, मस्तिष्क के रोग एवं विकार, ऑप्टिकल प्रणाली के रोग और विकार, गर्भाशय के रोग एवं विकार, मासिक धर्म प्रवाह के विकार, तंत्रिकातंत्र के विकार, प्रोस्टेटिक ग्रंथि के विकार, जलोदर, मिर्गी, स्त्री रोग, बुख़ार, फ़िट्स, महिलावक्ष का रूप और संरचना, पित्ताशय की पथरी, गुर्दे की पथरी, मूत्राशय की पथरी, गैंग्रीन, ग्लूकोमा, धेघा, हृदय रोग, उच्च एवं निम्न रक्तचाप, हाइड्रोसील, हिस्टीरिया, शिशु पक्षाघात, पागलपन, कुष्ठ रोग, ल्यूकोडर्मा, लॉक जॉ, लोकोमोटर गतिभंग, ल्यूपस, तंत्रिका सम्बंधी दुर्बलता, मोटापा, पक्षाघात, प्लेग, प्ल्यूरिसी, न्यूमोनिया, गठिया, फ़्रैक्चर, यौन नपुंसकता, चेचक, व्यक्तियों की ऊँचाई, महिलाओं में बाँझपन, ट्रैकोमा, क्षय रोग, ट्यूमर, टाइफ़ाइड, जठरांत्र के अल्सर, यौन रोग (सिफलिस, गोनोरिया, सॉफ़्ट शैकर, वेनेरियल ग्रेन्युलोमा, और लिम्फो ग्रेन्यूलोमा) सम्मिलित हैं । इन व्याधियों/स्थितियों पर वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाश डालने के लिए पृथक से शीघ्र ही एक आलेख के लिये कृपया प्रतीक्षा करें।

औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम संख्या २१(१९५४) के कुछ अंश इस प्रकार हैं –

२ए विज्ञापन में कोई भी नोटिस, परिपत्र, लेबल, रैपर, या अन्य अभिलेख और मौखिक रूप से प्रकाश या धुआँ उत्पन्न करने या प्रसारित करने के लिये किसी भी माध्यम से की गयी कोई भी घोषणा सम्मिलित है ।

(नींद लाने के लिये मॉर्टिन वालों का विज्ञापन चमत्कार से मुक्त है?)

2 सी - जादुई उपचार में सम्मिलित हैं- ताबीज़, मंत्र, कवच किसी भी प्रकार का कोई अन्य आकर्षण जिसमें मनुष्यों या पशुओं में किसी भी रोग के निदान, चिकित्सा, शमन या उपचार या रोकथाम या प्रभावित करने के लिए चमत्कारी शक्तियाँ होने का आरोप लगाया गया है या किसी भी तरह से मनुष्यों या पशुओं के शरीर की संरचना या किसी जैविक कार्य को प्रभावित करने का दावा करना ।

            (रेल के डिब्बे, शौचालय और सार्वजनिक मूत्रालय में चिपके बाबा शेखानी रहमत उल्ला के बाँझपन, प्यार में निराश, खोया प्रेम पाने, मुकदमा जीतने आदि के लिये भभूत और ताबीज के विज्ञापनों पर इस अधिनियम की धारा के अंतर्गत विचार करने के लिये मीलॉर्ड के पास समय नहीं है)

3- प्रतिबंधित विज्ञापन

ए- महिलाओं में गर्भपात की रोकथाम, या महिलाओं में गर्भधारण की रोकथाम; या

बी यौन सुख के लिए मनुष्य की क्षमता का रखरखाव या सुधार; या

सी- महिलाओं में मासिक धर्म सम्बंधी विकार का सुधार; या

डी अनुसूची में निर्दिष्ट किसी रोग, विकार या स्थिति या किसी अन्य रोग, विकार या स्थिति का निदान, चिकित्सा, शमन, उपचार या रोकथाम, जो इस अधिनियम के तहत बनाये गये नियमों में निर्दिष्ट किया जा सकता है ।                                                                                                      

अधिनियम के अनुसार चौव्वन विशिष्ट चिकित्सा स्थितियों के उपचार और इलाज के लिये लक्षित औषधियों का प्रचार स्पष्टरूप से वर्जित घोषित किया गया है किंतु सन् उन्नीस सौ चौव्वन से अब तक देश भर में न जाने कितने फ़र्टिलिटी सेंटर्स खुल चुके हैं जिन पर मीलॉर्ड ने अभी तक कोई संज्ञान नहीं लिया, साथ ही महिलाओं में मासिक धर्म की समस्या को मीलॉर्ड आज भी अचिकित्स्य मानते हैं? चौव्वन व्याधियों में से अधिकांश तो ऐसी हैं जिनका उपचार बंद कर दिया जाय तो हाहाकार मच जायेगा । किसी न किसी मीलॉर्ड जी और उनकी पत्नी जी को कभी न कभी इन चौव्वन में से कोई न कोई व्याधि तो हुयी ही होगी, मीलॉर्ड ने अधिनियम के अंतर्गत पत्नी जी की चिकित्सा नहीं करवायी होगी न! मीलॉर्ड जी को उनके चिंतन और ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के लिये शुभकामनायें!