शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

अफ़गानी इतिहास में पॉलिटिकल सिम्बियॉसिस के नये सफ़े

            अफ़गानिस्तान में बिना अनुमति के विरोध प्रदर्शन करने वालों को गोली मार देने का हुक्म तालिबान सरकार द्वारा जारी किया गया है । विरोध प्रदर्शन से पहले न केवल नयी सरकार से अनुमति लेनी होगी बल्कि विरोध प्रदर्शन का स्थान, विषय, नारे आदि सब कुछ लिखकर बताना होगा । मुझे उस बूढ़े क्रिकेटर की बात याद आ रही है जो कहता है कि तालिबान के आने से पहले अफगानिस्तान पहले ग़ुलाम था अब आज़ाद हो गया है ।

कम्युनिस्ट देशों की अनीश्वरवादी सरकारें चंगेज़ ख़ान की तरह लूटमार करके बनाये गये इस्लामिक स्टेट ऑफ़ अफ़गानिस्तान के पक्ष में खड़ी गयी हैं । धर्म को अफीम मानने वाले कम्युनिस्ट्स को इस्लाम धर्म, शरीया और “निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा” जैसे सिद्धांतों से अब कोई व्यावहारिक विरोध नहीं है । तो क्या अब यह माना जाय कि कम्युनिस्ट भी ईश्वरवादी हो गये हैं, और उन पर भी भविष्य में इस्लामिक रंग चढ़ सकता है?

तालिबान ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की तर्ज़ पर “द सो काल्ड अफ़गान रिवोल्यूशन” के बाद वहाँ कत्ल-ओ-ग़ारत की परम्परा को बनाये रखा है । धार्मिक कट्टरता और अनीश्वरवादी कम्युनिज़्म के दो परस्पर विपरीत ध्रुव एक दूसरे को तरजीह देते स्पष्ट देखे जाने लगे हैं । पॉलिटिकल सिम्बियॉसिस के रचे जा रहे एक नये इतिहास की इबारत को पढ़ने की चेष्टा कर रही दुनिया भौंचक है । अफ़गानिस्तान में निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा की हुकूमत कायम होने से जहाँ पाकिस्तान के कुछ लोग दहशत में हैं तो वहीं कुछ लोग ख़ुशियाँ भी मना रहे हैं । अमरीकी सेना द्वारा अफ़गानिस्तान में छोड़े गये विशाल आयुध भंडार को लूटकर पाकिस्तान में बेचा जा रहा है । तालिबान सरकार की आय का अफ़ीम के बाद फ़िलहाल यही एक साधन है । शिक्षा की तालिबानी बुनियाद के बाद भविष्य में भी अफगानिस्तान में नशा और कत्ल का उद्योग ही परवान चढ़ने वाला है ।    

आपको याद होगा, तीस अगस्त को अमरीकी सेना के जहाज ने काबुल हवाई अड्डे से अंतिम उड़ान भरी, उधर अगले ही दिन सरकार बनाने के लिये बेताब तालिबान आतंकियों ने अफ़गानिस्तान के 138 शासकीय कर्मचारियों को ढूँढ-ढूँढ कर गोली से उड़ा दिया । बोल्शेविक क्रांति के बाद लेनिन के आतंकियों ने लाखों रूसियों को इसी तरह गोलियों से भून दिया था । लेनिन के बाद उसके उत्तरधिकारी स्टालिन ने भी विरोधियों के कत्ल की परम्परा को जारी रखा और पहले से लगभग दो गुना अधिक विरोधियों को गोली से भून दिया ।

तालिबान को अपनी ख़िलाफत पसंद नहीं है, कम्युनिस्ट लोगों को भी अपना विरोध बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है । असहिष्णुता के इस कॉमन मिज़ाज ने दोनों ध्रुवों को क़रीब ला दिया और कम्युनिस्ट देशों ने तालिबान का समर्थन कर दिया । कश्मीर में आग लगाने के लिये पाकिस्तान को तालिबान की मदद की दरकार है । जबकि तालिबान वह ड्रैगन है जिसके शब्दकोष में रहम और इंसानियत जैसे कोई शब्द हैं ही नहीं । पाकिस्तान की अवाम ने तालिबान के ज़ेहन में लिखी इस इबारत को पढ़ लिया है और अब वह ख़ौफ़ में है । अफगानिस्तान की अवाम दहशत में है, पचास लाख डॉलर के इनामी आतंकी सिराज हक्कानी के ग़ृह मंत्री बनने के बाद अफ़गानियों का क्या होगा?

इतिहास के नये-नये सफ़े लिखे जा रहे हैं, हर सफ़ा हैरत अंगेज़ बातों से लवरेज़ है । जब अतालिब (अशिक्षित) को तालिब (शिक्षित) की उपाधि से नवाजा जा सकता है तो ख़ूँखारों के गैंग को शहंशाह की उपाधि से नवाजने में क्या हर्ज़ है! यूँ, हकीकात यह है कि किसी ने उन्हें नवाजा नहीं बल्कि उन्होंने ही ख़ुद को नवाज लिया और किसी ने ऐतराज़ भी नहीं किया तो यह माना जायेगा कि दुनिया को उनका नवाजा जाना क़बूल है ।

संयुक्त राष्ट्र को बेचैन होना चाहिये कि उनके चौदह कुख्यात अपराधियों ने ख़ुद को अफ़गानिस्तान का मुख़्तार घोषित कर दिया है । “अतालिब” तालिबान के असुर भक्त इस कल्पना से ख़ुश हैं कि अब संयुक्त राष्ट्र को झक मारकर इन चौदह तालिबान को अपराधी कहना बंद करके उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार करना ही होगा ।

यह असुरों का विजय काल है, वे हर विजय पर उत्साहित होंगे, विस्तार की योजनायें भी बनायेंगे । दुनिया भर के सुरों के लिये यह लज्जा से डूब मरने का काल नहीं बल्कि होश में आकर एक नयी रणनीति बनाने का काल है जिससे भस्मासुरों से दुनिया को बचाया जा सके । हिंदू राजा वक्कादेव, कमलवर्मन, भीमदेव, जयपाल और आनंदपाल आदि  से शासित रहे अफगानिस्तान की जड़ें उसके मातृदेश भारत में आज भी हैं । भारत की रक्षा के लिये हमें प्राचीन भारत के हर भूभाग के बारे में गम्भीरता से चिंतन करना होगा, फिर चाहे वह अफ़गानिस्तान हो या पाकिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान हो या अक्साई चिन, म्यानमार हो या बांग्लादेश ।   

बुधवार, 8 सितंबर 2021

बंदूक से निकली सत्ता हुयी महिमामंडित

 

गन का सामना करती निहत्थी अफगानी स्त्री

आपकी भैंस आपकी नहीं है, उसकी है जिसके हाथ में लाठी है । यही नज़ीर पेश हुयी है, हो रही है, क्योंकि इस नज़ीर को पेश होने के सारे संसाधन उन्होंने उपलब्ध करवा दिये थे जो शब्दों और अर्थों के साथ बलात्कार में दक्ष हैं । Alteration and modification के युग में “वागर्थाविव संपृक्तौ” को पूछता ही कौन है!

रहीम ने पूछा था – “कह रहीम कइसे निभय केर-बेर को संग” । आज रहीम होते तो मैं बताता – “सुन रहीम अइसे निभय केर-बेर को संग, जइसे काबुल में सजय तालिबान को रंग”।

ग्रहों की गति सीधी ही नहीं होती, वक्र भी होती है । बूढ़े क्रिकेटर की बात मानें तो अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान और तालिबान ने मिलकर चरखा चलाया और अफ़गानिस्तान के दिमाग में पड़ी ग़ुलामी की जंजीरें उतार दीं(“तोड़ दीं” नहीं लिखूँगा, तालिबान प्रेमी अहिंसावादी अतिबुद्धिजीवियों को बुरा लगेगा) । अब वहाँ ख़ुश्बूदार गुलों की वारिश हो रही है । स्वचालित राइफ़ल्स तो उन्होंने अमनचैन की झमाझम वारिश करवाने के लिये अपने हाथों में पकड़ी हुयी हैं । पाकिस्तान, चीन, तुर्की और उज़्बेकिस्तान को पक्का भरोसा है कि अफ़गानिस्तान में एक न्यायपूर्ण और अमनचैन वाली हुकूमत कायम हो गयी है जिसमें पाकिस्तानी सूफ़ियों और उनके जंगी हवाई जहाजों से बरसी आयतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । सच और झूठ की मैन्यूफ़ेक्चरिंग एण्ड मोडीफ़िकेशन्स से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है, कम से कम पाकिस्तान, तुर्की, रूस, चीन और अमेरिका ने यह प्रमाणित कर दिया है । दुनिया के इन ताकतवर मुल्कों ने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि बंदूक का स्थान संविधान, कानून की किताब और न्यायालय से भी ऊँचा है । सन् दो हजार इक्कीस की किशोर और युवा पीढ़ी ने यह ज्ञान सारे सबूतों के साथ प्राप्त किया है । काली पोशाक के दीवाने पाकिस्तान और तालिबान ने दुनिया के सामने यह नज़ीर पेश कर दी है कि अँधेरा इस ब्रह्माण्ड का शाश्वत सत्य है, प्रकाश नश्वर है ...आता-जाता रहता है, आज है कल नहीं होगा किंतु अँधेरा हमेशा रहेगा ।

एक दिन दुनिया को पता चला कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति तेज समुद्री चक्रवात में फँसी डूबती नाव को छोड़कर इसलिये एयर-लिफ़्ट होकर विदेश भाग लिये जिससे कि नाव डूबने से बच जाय । बहादुर अफ़गानी सेना युद्ध किये बिना ही हार गयी, मर्द नामर्द हो गये और बाइस दिन के रक्तपात के बाद अंततः अफ़गानी जनानियों ने हक का झण्डा बुलंद कर दिया । दुनिया के तमाम ताकतवर, शिक्षित और धन्नासेठ मुल्कों ने अफगानिस्तान की तबाही को तमाशा बनने दिया, इंसानियत का फ़ालूदा बनाया और ख़ुद को बुरी तरह नंगा कर दिया ।

सत्य के समर्थक विरले होते हैं, असत्य के समर्थकों की कमी नहीं हुआ करती, दुनिया की यही रीति है । इसीलिए एक दिन हम सबने देखा कि बहुत सारे लिपे-पुते शब्दों ने रातों-रात अपने अर्थ बदले और निहायत बेशर्मी के साथ दुनिया के सामने आकर खड़े हो गये । फ़ारुख़ अब्दुल्ला को उमीद है कि पाकिस्तान से आयातित भेड़िए अफ़गानिस्तान में पहँचते ही हंस बन जायेंगे । भारतविरोधी फ़ारुख़ अब्दुल्ला अफ़गानिस्तान के देशी हंसों को हंस मानने के लिये तैयार नहीं है । महबूबा मुफ़्ती को पक्का यकीन है कि भारत में भी आयातित भेड़ियों की सख़्त ज़रूरत है । पाकिस्तानी कबाब-बिरियानी की दावत उड़ाने वाले शिरोमणि अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा और पाकिस्तानी बूढ़े क्रिकेटर के भारतीय अधेड़ दोस्त सिद्धू को पाकिस्तान के हुक्मरानों से गहरी मोहब्बत है, होनी चाहिये, दिल दा मामला है, लेकिन हिंदुस्तान से इतनी दुश्मनी क्यों?

ग़ुलामी समाप्त करने का सबसे अच्छा उपाय है ग़ुलामशब्द का नाम बदलकर उसे आज़ादपुकारने लगना, ठीक वैसे ही जैसे ग़रीबी समाप्त करने के लिये ग़रीबका नाम बदलकर अमीररख देना । बूढ़े क्रिकेटर ने निहायत बेशर्मी के साथ अफ़गानियों की आज़ादी का नाम “ग़ुलामी” रख दिया और चरखा चलाकर उसे बड़े प्यार से उतार कर एक ओर रख दिया ।

अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार के नये शिक्षा मंत्री ख़ुद में कभी तालिब नहीं रहे । तालिबान सरकार के और भी बहुत से मंत्रियों का तालीम से कभी कोई नाता नहीं रहा किंतु वे ख़ुद को तालिब मानते हैं क्योंकि उनके पास बंदूक और बारूद का इल्म है । पढ़े-लिखे लोग परेशान हैं कि अपढ़ एवं अपराधी किस्म के लोग अफ़गानिस्तान की हुकूमत कैसे चलायेंगे? इस प्रश्न का कोई औचित्य नहीं, लूटमार की हुकूमत के लिये किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती । यूँ, मूसलयुद्ध अभी बाकी है, सूरज निकलने तक अँधेरे को कायम रहना ही होगा ।

वैश्विक संकट की इस घड़ी में तमसोमा ज्योतिर्गमय” की वैश्विक कामना वाले भारत की महती भूमिका के लिये दुनिया आश्वस्त होना चाहती है । इस गहन अंधकार में मैं उन हाथों को दिया जलाते हुये देखना चाहता हूँ जिन्होंने ईश्वर और मनुष्य के लिये उसके वास्तविक संदेश को समझा है ।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

बराबरी का हिस्सा चाहिये

         ब्रिटिश इण्डिया के समय मुसलमानों को अपने लिये एक हिस्सा चाहिये था । उन्हें पश्चिम में ईरान और पूर्व में म्यानमान की सीमाओं से लगे क्षेत्र पाकिस्तान बनाने के लिए दे दिये गये । बटवारे के बाद भी मुसलमानों की एक बहुत बड़ी जनसंख्या  भारत में ही बनी रही । अब एक बार फिर मुसलमानों को बराबरी का हिस्सा चाहिये । ओवेसी, वारिस पठान और रहमानी जैसे लोगों ने आवाज़ बुलंद कर दी है कि उन्हें हिंदुस्तान की सियासत में बराबरी का हिस्सा चाहिये । उनके अनुसार उन्हें यह हक भारत के संविधान ने दिया है । आप भारत को हिंदूराष्ट्र बनाने की माँग करने से डरते हैं । मुसलमान भारत में शरीयत लागू करने के लिये सड़कों पर नारे लगाते हैं ।

आपने सुना किन्तु उसका भावार्थ नहीं समझा, जब उन्होंने कहा कि वे वंदे मातरम नहीं कहेंगे लेकिन उन्हें हिंदुस्तान की धरती से मोहब्बत है । नादिरशाह और हमायूँ को भी हिंदुस्तान की धरती से मोहब्बत थी । उन्हें ईद के बकरे से भी मोहब्बत होती है । उन्हें हर ख़ूबसूरत चीज से मोहब्बत होती है जिसका वे उपभोग कर सकते हैं । हम भारत की धरती की पूजा करते हैं । हम जिसकी पूजा करते हैं उसका उपभोग करना हमारे संस्कारों में नहीं है, इसीलिये हमने किसी दूसरे मुल्क पर धरती की मोहब्बत में हमला नहीं किया, वहाँ के रहवासियों का कत्ल-ए-आम नहीं किया, वहाँ की धरती को रौंदा नहीं, वहाँ के लोगों को तबाह नहीं किया, वहाँ की स्त्रियों से बलात-यौनाचार नहीं किया । वे हमारी धरती से मोहब्बत करते रहे और हमारे मंदिरों को लूटते रहे, हमारी बहुओं-बेटियों की इज्जत लूटते रहे । मोहब्बत को हम इबादत समझते रहे और ख़ुद को तबाह करने के लिए उन्हें अपने आपको सौंपते रहे ।

छोड़िये, आप इतिहास को कुरेदना नहीं चाहते । वर्तमान को तो देख सकते हैं न! देखिये... आँखें खोलकर देखिये, अच्छी तरह देखिये, उन गढ़ी हुई परिभाषाओं को देखिए जो आपके अधिकारों को छीनने के लिये आपको पढ़ायी जाती रहीं, उन धमकियों को देखिये जो आपके स्वाभिमान को ललकारती हैं, उन घोषणाओं को देखिये जो आपको विदेशी मानती हैं और मुसलमानों को भारत का मूल नागरिक ।

मुसलमानों के तेवर और उनकी तैयारियों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अब भारत के और नये टुकड़े से संतुष्ट नहीं होंगे बल्कि उन्हें पूरा भारत चाहिये । उन्हें मुसलमान मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री चाहिये । उन्हें विधानसभा में नमाज के लिये एक हॉल चाहिये फिर एक दिन उन्हें शरीयत भी चाहिये । यह सब होगा । आप गाते रहिये – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी । ख़याली पुलाव पकाने और आत्ममुग्धता में डूबे रहने से कोई किला नहीं जीता जाता, हाँ! जीता हुआ किला हारा ज़रूर जाता है ।

दिल्ली के मुख्य मंत्री हर विधान सभा क्षेत्र में उर्दू और इस्लाम की तालीम के लिए सरकारी स्कूल खोलने जा रहे हैं । यही सेक्युलरिज़्म है, संविधान नें उन्हें इस काम के लिए अधिकार दिया है । संविधान में हिंदुओं के क्या अधिकार हैं, इसकी  कोई चर्चा नहीं होती । चर्चा इस बात की होती है कि सनातन धर्म की शिक्षा सरकारी स्कूलों में देना इस्लाम का अपमान ही नहीं बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण भी है । इससे हिंदू आतंकवाद फैलेगा । ये बातें चौबीस घण्टे दोहरायी जाती हैं । हम इन बातों के अभ्यस्त हो जाते हैं फिर इसी को सच मानने लगते हैं । भारत आने वाले समय में अफगानिस्तान बनने बनने वाला है । आप गंगा-जमुनी तहज़ीब और भाईचारे की ढोलक बजाते रहिये । उन्हें हिंदुस्तान में “पाकिस्तान ज़िंदाबाद” और “हिंदुस्तान मुर्दाबाद” चाहिये ।   

सोमवार, 6 सितंबर 2021

अफ़गानिस्तान में आधी दुनिया की हार

 

तालिबान मेरी माँ को उठा ले गये और अब उनके साथ बुरा-बुरा काम भी करते हैं  

अस्लहा थामे हाथ तर्क नहीं सुन सकते, न्याय नहीं देख सकते, उन्हें संवेदना और करुणा जैसे साहित्यिक शब्दों की अनुभूति नहीं होती, वे सिर्फ़ गोलियाँ चला सकते हैं जिनसे चीखें निकलती हैं और ख़ून बहता है ।

बुद्धिमान व्यक्ति तर्क करते हैं, आगे-पीछे की स्थितियों पर मंथन करते हैं और एक दिन उन लोगों द्वारा अचानक गोलियों से भून दिये जाते हैं जिन्हें लोग बुद्धिमान नहीं मानते । धरती के एक भूखण्ड पर राज करने के लिये बचते हैं केवल कुछ अराजक तत्व । कलियुग की दुनिया इसी तरह चल रही है ।

समाज कभी पूरी तरह सभ्य नहीं होता, उसका एक हिस्सा हमेशा असभ्य बना रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई सभ्य व्यक्ति भी अंदर से थोड़ा सा असभ्य बना रहता है । असंतुलन की स्थिति में सभ्यता ही असभ्यता को प्रश्रय देने लगती है । सभ्य और असभ्य दोनों ही लोग दुनिया की आँखों में धूल झोंकते हुये लुका-छिपी खेलते रहते हैं । फिर एक दिन सब नंगे होकर मार-काट मचा देते हैं । मैं इसे युद्ध नहीं, मृगया (शिकार) कहूँगा । इसमें पुरुष हारते नहीं, मारे जाते हैं, हारती है तो केवल आधी दुनिया और उनके मासूम बच्चे ।

हमने बर्बर युग के उस कालखण्ड को भी भोगा है जब शक्ति के स्वच्छंद प्रयोग और रक्तपात को ही तत्कालीन समाज के लिये बाध्यकारी न्याय माना जाने लगा था । सत्य और न्याय की सार्वभौमिक और सार्वकालिक परिभाषाओं, मान्यताओं और मूल्यों को नकार दिया गया था । युद्ध के स्थापित नियमों को उखाड़ फेका गया था और कुछ घुड़सवार लुटेरे कहीं भी मारकाट और लूटमार करते हुये किसी भी भूखण्ड के अधिपति बन जाया करते थे । सभ्य समाज में इस तरह की आसुरी प्रवृत्ति को कभी स्वीकारा नहीं गया किंतु सारी निंदाओं को नकारते हुये समय-समय पर समय अपने आप को दोहराता रहा है । आज हम एक बार फिर इतिहास को साक्षात होता हुआ देख रहे हैं ।

 प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को लगा था कि अब शांति स्थापित हो जायेगी किंतु दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध का भी सामना करना पड़ा । कोई भी सभ्यता कितनी भी विकसित क्यों न हो जाय वह अभी तक युद्ध और हिंसा को रोक सकने में असफल ही रही है । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी हिंसा और युद्ध की श्रंखलायें लम्बी, और लम्बी होती ही रहीं ।

हमारे देखते-देखते सीरिया आदि के बाद अब अफ़गानिस्तान में भी युद्ध हो रहा है । स्वेच्छाचारी मानव समूहों के निरंकुश आचरण के आतंक से भयभीत लगभग एक लाख अफ़गानी अपनी मातृभूमि से पलायन करने के प्रयास में हैं । वहाँ की सांसद अनारकली कौर ने रोते हुये विश्वसमुदाय से विनती की है – “अफ़गानियों को इस तरह मरने के लिये मत छोड़ दीजिये” । अधेड़ और बूढ़े तालिबान द्वारा यौनशोषण के लिये उठा लिये जाने के भय से रोती हुयी अफ़गानी बच्चियाँ पूरी दुनिया से दया की भीख माँग रही हैं – “हमें बचा लो”।

भारत और पाकिस्तान के बहुत से लोग उन्हीं तालिबान को आज के सर्वाधिक सभ्य मनुष्य मानते हुये उनका स्वागत कर रहे हैं । ये लोग भारत और पाकिस्तान में तालिबान के निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा क़ायम किए जाने की प्रतीक्षा में उत्साहित हैं । सभ्य कभी पूरी तरह सभ्य नहीं हो पाता, विशेषकर तब जब कि उनके पास एक अद्भुत किताब का हवाला भी हो ।     

अमेरिका, रूस, चीन और टर्की जैसे देशों को अफ़गानिस्तान की निर्बल जनता की अथाह पीड़ा से कोई सरोकार नहीं । यह गृद्धों का झुण्ड है जो अवसर की तलाश में है, अवसर मिलते ही यह झुण्ड अर्धजीवित मनुष्यों के समूह पर टूट पड़ने के लिये तैयार है ।

अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में भी कुछ इंसान रहते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह भारत में भी कुछ शैतान रहते हैं । मेरी चिंता इंसानों के लिए है, दुनिया भर के इंसानों के लिए । मेरी परिभाषा के इंसानों का कोई पारम्परिक धर्म नहीं होता किंतु वे सच्चे धार्मिक हुआ करते हैं ।  

भारत और पाकिस्तान के कुछ लोग ऐसी तस्वीरों के सत्य को स्वीकार करने से मना कर देते हैं 




रविवार, 5 सितंबर 2021

तहर्रुश-गेमिया और अ-सहिष्णु हिंदू की वैदिक कामना

एक दृश्य –

“आठ-दस कुत्तों का एक झुण्ड एकमात्र कुतिया को फ़ॉलो करता हुआ चल रहा है । पीछे-पीछे चलते हुये कुत्ते आपस में लड़ते हैं किंतु कोई कुत्ता कुतिया को लेश भी क्षति पहुँचाने की कोशिश नहीं करता”।

दृश्य का विश्लेषण–

“कुतिया के प्रति कुत्तों का यह आचरण उनकी सामाजिक समझ और सभ्यता को प्रदर्शित करता है”।

असभ्य और असंस्कारित माने जाने वाले पशु समाज में प्रचलित यह परम्परा आमतौर पर देखी जाती रही है, जबकि मानव समाज की बात करें तो एकपक्षीय प्रणय याचना करने वाला पुरुष स्त्री के प्रति प्रायः हिंसक और क्रूर हो जाया करता है । प्रणय में असफल होने पर स्त्री को एसिड अटैक से घायल करने और उसकी हत्या कर देने जैसी घटनायें सभ्य समाज का एक हिस्सा हो चुकी हैं ।

भूख, भय और भोग के लिए मानव समाज में आदिकाल से संघर्ष होता रहा है । ये ऐसी तीन मौलिक समस्यायें हैं जिनकी हिंसारहित सुचारु व्यवस्था के लिये मनुष्य को सभ्य होना पड़ा । अतः सभ्यता को एक कंडीशनल व्यवस्था कहा जा सकता है जिसका प्रवाह सदैव अधोगामी रहा है । व्यवस्था बनती है, फिर भंग होती है, फिर कुछ सुधार होता है, फिर भंग होती है... यही क्रम न जाने कब से चलता आ रहा है । इन तीन विषयों के लिए हम लाखों साल पहले भी लड़ते थे, आज भी लड़ते हैं ।

इस वर्ष पाकिस्तान में जश्न-ए-आज़ादी मनाते हुये पंद्रह अगस्त के दिन लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान में एक लड़की को चार सौ लोगों की भीड़ ने तहर्रुश-गेमिया का शिकार बनाया । अबाया और हिज़ाब को तहज़ीब मानने वाले मुल्क के लोगों की एक भीड़ ने रहम की भीख माँगती लड़की के शरीर को लिबास से सरेआम आज़ाद कर दिया । चीखती हुयी लड़की के शरीर के साथ वहशी भीड़ तीन घण्टे तक फ़ुटबॉल की तरह खेलती रही । भीड़ में शामिल कुछ लोग लड़की को बचाने का स्वांग करते हुये उसके शरीर के साथ खेलते रहे तो कुछ लोग भूखे भेड़िये की तरह उसे नोचते रहे ।

सभ्य और विकसित मनुष्य समाज की अधोगामी गति के परिणामस्वरूप ही इस युग में भी तहर्रुश-गेमिया जैसे दुर्दांत और क्रूरष्ट अपराधों का जन्म होता है । तीन घण्टे तक चले इस तमाशे को शासन-प्रशासन ने भी जी भर कर देखा । अगले दिन कुछ इंसाननुमा लोगों ने हो-हल्ला किया तब चार दिन बाद शासन-प्रशासन की ख़ुमारी दूर हुयी और उसने एक कार्यवाही की रस्म अदायगी कर दी । आरज़ू काज़मी को लगता है कि कुछ दिन बाद अपराधियों को आज़ाद कर दिया जायेगा । पाकिस्तान की जेलों में ऐसे अपराधियों के लिये स्थान नहीं होता ।

ऋग वेद के ऋषि की कामना है – “हमारे लिए सभी ओर से कल्याणकारी विचार आयें”। Let noble thoughts come to us from every side. “आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः” –ऋग वेद 1-89-1,

मन, शरीर और आचरण का निरंतर परिमार्जन ही “संस्कार” है । यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें मर्यादाओं और शिष्टता के साथ आचरणीय संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया जाता है । संस्कारवान व्यक्ति सुसंस्कृत माना जाता है, सुख की कामना करने वाले समाज के लिये यही अभीष्ट है । भारतीय संस्कृति के मूल आधार में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव है । वैदिक ऋषि विश्वकल्याण की सदा कामना करते रहे – “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुःखभाग भवेत्”।

शॉपेन हॉर जैसे बहुत से वामपंथी चिंतक भी मेरी तरह वैदिक वाङ्गमय से प्रभावित होते रहे हैं । वह बात अलग है कि प्रगतिशील विचारक होने के कारण भारतीय संस्कृति की ऊर्ध्वगामी चिंतनधारा को “मनुवादी” कहकर गाली दी जा सकती है, वेदों को जलाया जा सकता है, उपनिषदों, स्मृति ग्रंथों और पुराणों आदि की घोर निंदा करते हुये भारतीय संस्कृति का अपमान करके “वैज्ञानिक समाजवाद” और “आधुनिकता” जैसे छद्म भावों से आत्मसंतुष्टि में डूबे रहने की विघ्नसंतोषी अनुभूति की जा सकती है । तहर्रुश-गेमिया जैसी स्वेच्छाचारिता की पृष्ठभूमि निर्मित करने के लिये यह सब आवश्यक है । और हाँ! पशु योनि में तहर्रुश गेमिया नहीं होता । 


जश्न-ए-आज़ादी मनाते-मनाते छीन ली एक स्त्री की आज़ादी और उसके शरीर को आज़ाद कर दिया उसका लिबास उतारकर 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

गोमाता पूजकों के देश में

             जिस देश में पशुपतिनाथ शिव के साथ नंदी को स्थान दिया गया हो और उनके बिना शिवालय अधूरे से लगते हों, जिस देश में गाय को माता की तरह पूजा जाता हो उसी देश में गोवंश की कारुणिक स्थिति मन और हृदय को विचलित करती है । एक समय था जब गोवंश के कारण ही भारत की कृषिपरम्परा समृद्ध हुयी और हम “शतं जीवेत्” एवं “दूधों नहाओ, पूतों फलो” जैसे आशीर्वाद के साथ श्रेष्ठसभ्यता के वाहक बने । आज हमने अपनी उसी समृद्ध विरासत की धज्जियाँ उड़ा दी हैं ।

हम दूध दुहने के बाद गायों को सड़क पर फेक दी गयीं सड़ी हुयी सब्जियाँ और पॉलीथिन में लिपटी चीजें खाने के लिये छोड़ देते हैं, बैलों को ट्रैक्टर्स ने अनुपयोगी प्राणी बना दिया है और साँड़ों को हमने अवांछनीय प्राणी मान लिया है । गोवंश के प्रति हमारे आचरण से यह सब प्रतिदिन प्रमाणित हो रहा है । एक ओर तो हम गोमांस को प्रतिबंधित करने की माँग करते हैं तो दूसरी ओर गायों और साँड़ों की क्रूरता की सीमा तक उपेक्षा करते हैं । सड़क पर छोड़ दिये जाने वाले इस गोवंश में से न जाने कितनी गायों और साँड़ों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है । वे लावारिस की तरह तड़प-तड़प कर सड़क पर पड़े-पड़े मर जाते हैं, आसपास से गुजरने वाले सभ्य लोगों में से किसी को इतनी फुरसत नहीं होती कि वह इन घायल प्राणियों की आँखों में भरी पीड़ा को देख भी सकें ।

नंदी की आँख में किसी नुकीली चीज से किये गये क्रूर प्रहार के बाद इलाहाबाद में सड़क पर लावारिस खड़े नंदी

गोवंश के प्रति सड़क दुर्घटना से भी अधिक क्रूरता उन लोगों द्वारा की जाती है जो इन प्राणियों पर घातक आक्रमण कर उन्हें घायल कर देते हैं । तब्बल, कुल्हाड़ी, भाला, छाते की नोक, उबलता पानी और एसिड जैसी चीजों से बड़ी क्रूरतापूर्वक इन प्राणियों को बुरी घायल कर देना आम बात हो गयी है । सभ्यता का दम भरने वाले मनुष्य के दिये घाव के कारण मूक पशु चल नहीं पाते, घाव में प्यूट्रीफ़ेक्शन हो जाता है और उसमें मैगेट्स पड़ जाते हैं । चलने-फिरने में असमर्थता के कारण उन्हें भूखे रहना पड़ता है । घाव से उठने वाली दुर्गंध के कारण कोई भी इन्हें अपने घर या दुकान के सामने खड़ा तक नहीं होने देता । इन घायल और मूक प्राणियों को एक कौर खाने की किसी चीज के लिये लोगों की भीख पर निर्भर होना पड़ता है । लाखों वर्षों से मनुष्य के लिये उपयोगी रहे इन प्राणियों को भीख माँगना नहीं आता और हम अपनी दुकान या घर के सामने इनके खड़े होने से ही क्रुद्ध हो जाते हैं

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शरीर में धँसी कुल्हाड़ी की पीड़ा लिए नंदी को देख जब काँप उठती है क्रूरता, अवाक हो जाते हैं शब्द और शून्य हो जाती है अभिव्यक्ति तब उठ खड़े होते हैं अनंत प्रश्न

यह कैसी गोपूजा है, यह कैसी सभ्यता जो केवल गोवंश का दोहन करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है? सावधान! गाय की प्रशंसा में गीत गाने और मंदिर में जाकर नंदी की मूर्ति की पूजा अर्चना करने का पाखण्ड एक दिन हमारी हिंदू सभ्यता का काल बनेगा । 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

सरकारी विद्यालय में धार्मिक घृणा का बीजारोपण


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर उपवास रहने और भगवान में आस्था रखने को दण्डनीय अपराध मानते हुये सरकारी विद्यालय के शिक्षक ने विद्यार्थियों को पीटा 

भारतीय विद्यालयों में हिंदुओं के विरुद्ध धार्मिक घृणा फैलाने के लिये एन.सी.ई.आर.टी. के माध्यम से शिक्षाविदों द्वारा वर्षों से षड्यंत्र किये जाते रहे हैं । इस षड्यंत्र के सुदृढ़ धागे पूरे देश में फैले हुये हैं । ईसाई मिशनरी स्कूलों की छोड़िये, सरकारी विद्यालयों में भी यह सब धड़ल्ले से होता रहा है, अभी भी हो रहा है । हिंदू अन्य धर्मावलम्बियों को उनके धर्म के विरुद्ध कभी कोई आपत्तिजनक शिक्षा नहीं देता किंतु ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही नहीं बल्कि वामपंथी हिंदुओं और दिग्भ्रमित वनवासियों द्वारा भी सनातनधर्म के विरुद्ध घृणा का बीजारोपण विद्यालयों में आज भी किया जा रहा है जबकि जे.एन.यू. वालों को लगता है कि भारत में उन्हें आज़ादी नहीं मिल सकी है जिसे वे छीन कर ले लेंगे ।  

बस्तर सम्भाग के कोण्डागाँव जिले में गिरोला विकासखण्ड के बुंदापारा ग्राम स्थित शासकीय उच्चतर प्राथमिकशाला के शिक्षक श्रीचरण मरकाम ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने और उपवास करने पर छात्रों को पीट दिया । गुरु जी सनातनधर्म के सिद्धांतों, मान्यताओं और परम्पराओं के विरोधी हैं इसलिए छात्रों को भी अपने जैसा ही बना देना चाहते हैं जिसके लिए वे बालमन में धार्मिक-घृणा का बीजारोपण करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । विद्यालय के छात्रों के अनुसार गुरु जी ने ज्ञान प्रदान करते हुये अपने छात्रों को बताया कि “हिंदुओं की गायत्री काल्पनिक है, सरस्वती अशिक्षित है वह किसी को क्या ज्ञान देगी । मैं तुम्हारे भगवान को खूँदूँगा (कुचल दूँगा) । तुम लोग भी भगवान को मत मानो । श्रीकृष्ण की सात गर्ल-फ़्रेण्ड थी, वे लड़कियों को स्नान करते समय देखते थे और उनके कपड़े छुपाते थे...”।

भारत का कदाचित ही कोई ऐसा प्रांत होगा जहाँ के अधिकांश ईसाई मिशनरी स्कूलों और कुछ सरकारी विद्यालयों में इस तरह की घटनायें न होती हों, स्थानीय स्तर पर बच्चों के अभिभावक बच्चों के भविष्य को संकट में नहीं डालना चाहते और चुप रहते हैं । कुछ विद्यालयों में तो हिंदी बोलने पर भी बच्चों को प्रताड़ित करने की घटनायें प्रकाश में आती रही हैं । प्रांतीय मातृभाषाओं, सनातन सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं के प्रति विद्वेष का यह षड्यंत्र स्वतंत्र भारत में आज भी रचा जा रहा है । उस पर तुर्रा यह कि हमें असहिष्णु बताते हुये हमारे विरुद्ध असहिष्णुता का आरोप भी लगाया जाता रहा है । इतना ही नहीं, अपनी भाषाओं, धार्मिकपरम्पराओं और अध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा के लिये यदि हम भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की बात भी करते हैं तो भारत से लेकर योरोप और अमेरिका तक के वामपंथी विश्वविद्यालयों में तूफ़ान आ जाता है । हम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का स्वप्न भी नहीं देख सकते, अपनी सुरक्षा का कोई उपाय भी नहीं कर सकते, न हिंदी बोल सकते हैं और न सनातनधर्म का अनुशीलन कर सकते हैं । क्या ये स्थितियाँ हमारे मौलिक अधिकारों और स्वाभिमान के विरुद्ध नहीं हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें हमारी स्वतंत्रता की लेश भी अनुभूति करा सकने में समर्थ हैं?

हमारे देश में एक सुदृढ़ लॉबी है जो वनवासियों को हिंदू नहीं मानती; वनवासियों को भड़काया जा रहा है कि वे ही इस देश के मूलनिवासी हैं जबकि हिंदू लोग बाहर से आये हुये आक्रमणकारी हैं । मूलनिवासी एवं बाहरी आक्रमणकारी के कुतर्कों के साथ वनवासी ही नहीं, बौद्ध, सिख एवं जैन आदि परम्पराओं को भी हिंदूधर्म से पृथक करने के षड्यंत्र को समझना होगा । हम कबीलों में बँटे हुये अफगानी नहीं हैं, हमारी गौरवमयी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत रही है, जब तक हम इस विरासत को सहेजे रहेंगे तब तक भारत अखण्ड, समृद्ध और शांत बना रहेगा ।  

हम शिक्षक को गुरु और आचार्य भी मानते हैं, आचार्य बह है जिसका आचरण अनुकरणीय हो । इस घटना से स्पष्ट है कि शासकीय विद्यालय के शिक्षक श्रीचरण मरकाम की शिक्षाओं और उनके आचरण का अनुकरण किया जाय तो भारत की नयी पीढ़ी घृणा के विष से भर उठेगी । अपने विषाक्त आचरण से शिक्षक की मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाला कोई व्यक्ति क्या शिक्षक के पवित्र दायित्वों का निर्वहन कर सकने योग्य है ? जिलाधीश ने ग्रामीणों की लिखित शिकायत, जिसमें वीडियो और ऑडियो प्रमाण भी संलग्न किये गये हैं, पर शिक्षक को निलम्बित कर दिया है किंतु क्या यह पर्याप्त है? ज्ञान के मंदिर में घृणा की खेती करने वाले व्यक्ति को शिक्षक के गरिमामय पद बने रहने का क्या औचित्य है?