शनिवार, 27 अक्टूबर 2018

दूध में परमिटेड ज़हर मिलाने की आज़ादी है भारत में



मोटी मलाई वाला दूध किसे नहीं लुभाता ! किंतु क्या आपको पता है कि इस मलाई में ज़हरीला Melamine मिला हो सकता है जो शरीर की सामान्य और स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं में बदल देने के लिए कुख्यात है । 
...और मज़े की बात यह है कि हमारे देश में फसाई (FSSI) ने इस ज़हर की भी परमिटेड मात्रा तय कर दी है । यानी फसाई द्वारा तयशुदा मात्रा में ज़हर मिला दूध बेचने, ख़रीदने और पीने की आज़ादी है ।
जब फसाई बने कसाई तो अपनी जान बचाने के लिए हमें ख़ुद चिंतित होना चाहिए ।

फसाई की इस कहानी की हक़ीक़त से पूरे भारत को वाक़िफ़ करना अब हमारा और आपका दायित्व है ।



गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

God is afraid of her????

यह इण्डिया का सर्वोच्च न्यायालय था जिसने सबरीमाला स्थित अय्यप्पा मंदिर में हर आयु वर्ग की स्त्रियों के प्रवेश को उनका अधिकार मानते हुए बारह वर्ष पुराने प्रकरण का अंततः 28 सितम्बर 2018 को पटाक्षेप कर दिया । इस तरह अय्यप्पा मंदिर की लगभग डेढ़ हजार साल पुरानी परम्परा स्त्री समानता और आराधना के मौलिक अधिकार के तर्क के साथ समाप्त कर दी गयी ।

प्रगतिशील सभ्य आनंदित हैं और परम्परावादी असभ्य निराश । मामला है सबरीमाला मंदिर का, जारी है बहस सभ्य और असभ्य के बीच ।

सभ्य – सत्य की जीत होनी ही थी, ब्राह्मणों ने मंदिर को अपनी बपौती मान लिया था । ईश्वर की आराधना में भेदभाव करना पंडितों की दादागीरी के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ?
असभ्य –ईश्वर आराधना ? वह तो पाखण्ड है आपकी दृष्टि में, फिर उसी पाखण्ड को स्थापित करने के लिए आप स्त्रियों को भी क्यों सम्मिलित करना चाहते हैं ?
सभ्य – हम ईश्वर जैसी किसी चीज को नहीं मानते । ब्रिटिश साइंटिस्ट स्टीफ़ेन हॉकिंग से अधिक ज्ञानी नहीं हो तुम । हमने फ़िज़िक्स में पीएच. डी. की है, तुम धरती को चपटी मानने वाले लोग क्या जानो कि धरती गोल है । हम ईश्वर की आराधना के पाखण्ड के लिए नहीं बल्कि स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के विरुद्ध उनके साथ खड़े हुए हैं ।
असभ्य – किंतु जिसे आप पाखण्ड कह कर ईश्वर, कर्मकाण्ड और धर्म आदि का विरोध करते हैं, सबरीमाला प्रकरण में तो आप एक तरह से उसी के समर्थन में खड़े हो गए हैं । क्या यह विरोधाभास नहीं है ? पहले आप तय कर लीजिए कि आप पाखण्ड के विरोधी हैं या उसके समर्थक ?
सभ्य – बेशक ! हम पाखण्ड के विरोधी हैं तभी तो सबरीमाला मंदिर की परम्परा को तोड़ने के समर्थन में हैं । स्त्रियों के अधिकार को अब हम और कुचलने नहीं देंगे ।
असभ्य – अर्थात, आप मंदिर में ईश्वर की आराधना को, जो कि आपकी दृष्टि में पाखण्ड है, स्त्रियों का अधिकार मानते हैं ?
सभ्य – तुम संस्कृताचार्यों के साथ यही दिक्कत है, विज्ञान की ए.बी.सी.डी. जानते नहीं बस केवल वितण्डा करना जानते हो । ईश्वर को लेकर दकियानूसी के सिवाय और क्या है तुम्हारे पास ?
असभ्य – हाइपोथीसिस... जिसके सहारे तुम यहाँ तक पहुँच सके हो । हाइपोथीसिस यदि अवैज्ञानिक है तो आपका तथाकथित विज्ञान भी अवैज्ञानिक है जो इसी की नींव पर खड़ा है ।
सभ्य – बहुत ख़ूब ! अब तुम पंडित जी लोग विज्ञान पर भी हमसे बहस करोगे ?
असभ्य – क्यों ? क्या विज्ञान पर बहस करने का मौलिक अधिकार केवल आपका ही है ?
सभ्य – ठीक है, चलिए बताइए कौन सा वैज्ञानिक तथ्य है आपके पास मंदिर में मेंस्ट्रुएटेड स्त्रियों को प्रवेश न करने देने की परम्परा के पीछे ?
असभ्य – परम्पराओं के साथ आवश्यक नहीं कि वे सदा स्थूल वैज्ञानिक तथ्यों से ही जुड़ी हुयी हों, वे लोकाचारों और स्थानीय आवश्यकताओं की परिणति भी हो सकती हैं । जहाँ तक स्त्रियों के प्रवेश की बात है तो यह पूरे रिप्रोडक्टिव एज़ की बात है केवल मेंस्ट्रुअल स्थिति की ही नहीं ।
सभ्य – कमाल की बात है ! सैनिटरी नेपकिन लगाकर ख़ून में लथपथ स्त्री अंतरिक्ष में जा सकती है, प्लेन उड़ा सकती है, ट्रेन में बैठ सकती है, ऑफ़िस जा सकती है, पार्टी में जा सकती है ...लेकिन आपके अय्यप्पा की पूजा नहीं कर सकती । आपका अय्यप्पा मेंस्ट्रुएटेड स्त्रियों से इतना डरता क्यों है ?
असभ्य – अर्थात, मेंस्टुएटेड स्त्री सब कुछ कर सकती है ....उसे सब कुछ करना चाहिए ?
सभ्य – आपको इसमें क्यों और क्या ऐतराज़ है ?
असभ्य – क्या मेंस्ट्रुएटेड स्त्री को समागम भी करना चाहिए ?
सभ्य – यदि उसकी इच्छा हो तो क्यों नहीं ?
असभ्य – फ़िज़िक्स के विद्वान वैज्ञानिक महोदय ! क्या आपको पता है कि मेंस्ट्रुअल पीरियड में कोई भी स्त्री किसी भी इनफ़ेक्शन के प्रति अधिक सेंसिटिव होती है ? और ऐसी स्थिति में किया गया समागम स्त्री को इनफ़ेक्ट कर सकता है ? क्या यह एक अवैज्ञानिक आचरण नहीं है ? अभी कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक सम्बंधों को भी कानूनी मान्यता प्रदान कर दी है जबकि एड्स की कहानी हाइती में समलैंगिक सम्बंधों के साथ ही प्रारम्भ हुई थी । विज्ञान और आधुनिकता की दुहाई देकर विज्ञान के साथ खिलवाड़ करने को प्रगतिशीलता नहीं कहा जा सकता महोदय !
सभ्य – आप वितण्डा कर रहे हैं, मुद्दे की बात कीजिए । पूजा से इसका क्या सम्बंध ?
असभ्य – इसके लिए पहले आपको पूजा की अवधारणा पर चिंतन करना होगा । यह ठीक उसी तरह है जैसे रंगमंच पर उतरने से पहले कलाकार को अपने कैरेक्टर में प्रवेश करना होता है । यदि आप पूजा का सम्बंध मनःस्थिति से जोड़ पा रहे हों तो समझ सकेंगे कि इसके लिए विधान कितना आवश्यक है । गीत गाने से पहले राग, सुर, ताल का अभ्यास आवश्यक नहीं है क्या ?
सभ्य – आप फिर बात को घुमा रहे हैं । मेंस्ट्रुअल पीरियड से पूजा का विरोध कहाँ है यह क्यों नहीं बता रहे हैं आप ?
असभ्य – ऑपरेशन थिएटर, लेबर रूम, आइसोलेटेड वार्ड, बर्न यूनिट और आई.सी.यू. में प्रवेश करने के नियमों और ऐसे स्थानों के प्रति मनुष्य के आचरण को यदि आप समझ सकें तो ही यह भी समझ सकेंगे कि स्थानविशेष का स्थितिविशेष से कोई विशिष्ट सम्बंध होना चाहिए या नहीं !
सभ्य – पूजा ...पूजा पर आइये पोंगा पण्डित जी !
असभ्य – पूजा के साथ पवित्रता और मन की उच्चतम स्थिति का होना आवश्यक है । पूजा को जीवन के अन्य कार्यों की तरह नहीं निपटाया जा सकता । यह स्थितिविशेष में सूक्ष्म में स्थूल की उच्चतम एकाग्रता का उपक्रम है । अय्यप्पा के पूजा विधान में स्त्रियों की अपनी अनिवार्य भूमिका है, पुरुषों के लिए पूजा के उपादानों की व्यवस्था स्त्रियों को ही करनी होती है । रंगमंच पर हर व्यक्ति हर तरह का किरदार नहीं निभा सकता ..और ऐसी ज़िद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती ।
सभ्य – उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले आप कौन होते हैं ? यह अदालत का विषय है, और अदालत निर्णय कर चुकी है ।
असभ्य – कोई भी अदालत सत्य से ऊपर नहीं हो सकती । अदालतें भी सत्य के ही अनुसंधान का प्रयास करती हैं.... किंतु स्थूल प्रमाणों के आधार पर । पूजा के औचित्य को स्थूल प्रमाणों के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती ।
सभ्य – इसे हम पण्डितों की दादागीरी कहते हैं जिसने देश और समाज का बंटाढार कर रखा है ।
असभ्य – बंटाढार तो उस प्रगतिशीलता ने कर रखा है जिसने सामाजिक और व्यक्तिगत आचारों-विचारों की धज्जियाँ उड़ा रखी हैं । अधकचरे विज्ञान का अहंकार बहुत घातक है सभ्यता के लिए ।
सभ्य – तुम पोंगा पंडित हो, पाखण्ड भरी पूजा करते रहो, तुम्हारे मुंह से निकली विज्ञान की बात भी पाखण्डी हो जाती है ।


(यह एक अनंत बहस है, चलती रहेगी ......)              


शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

‘मी टू’ के बाद अब ‘मी टू पार्ट टू’ की बारी


एफ़.टी. की दुनिया में चल रही ग़र्म हवा पहली बार नहीं चली है । पहले भी तेज हवाओं से अचानक खुल गई खिड़की से लोगों ने कॉस्टिंग काउच को देखा है । राजनीतिक गलियारों में इस तरह की हवा को “प्रायोजित” और “षड्यंत्र” कह कर तर्कों के साथ कुछ प्रश्न भी उठाए जा रहे हैं । किंतु एफ़.टी. की रंगीन दुनिया में इस ग़र्म हवा को “प्रायोजित” और “षड्यंत्र” स्वीकार करने का कोई उचित कारण नहीं है ।

निश्चित ही एफ़.टी. की महिलाओं के साहस का स्तर हमारी अपेक्षा बहुत उच्च है । मी टू कहने वाली स्त्रियों को एक भी शब्द बोलने से पहले कितने अंतर्द्वंद्वों और आंतरिक झंझावातों से से होकर आगे बढ़ना होता है, इसकी कल्पना ही पसीना ला देने के लिए काफी है । मी टू महिलाओं के अपने अंतर्द्वंद्व से बाहर निकलने का आंदोलन है, यौन अत्याचारों के ख़िलाफ बगावत का ऐलान है, विवश मौन को स्वर देने की क्रांति है । मुझे लगता है कि रिश्वत और भ्रष्टाचार के मामले में अब मी टू पार्ट टू की बारी पुरुषों की होनी चाहिए । आख़िर हम कब तक भ्रष्टाचार के शिकार होते रहेंगे । मैं रिश्वखोरी की बात कर रहा हूँ । क्या हमें मी टू की स्त्रियों की तरह भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के ख़िलाफ भी खुलकर अपनी आवाज़ नहीं उठानी चाहिए ?
        रिश्वतखोरी के मामले में व्याप्त हो चुकी सामाजिक मानसिकता का विश्लेषण हमारे सामने एक भयानक चित्र उपस्थित करता है । विद्यार्थियों को छोड़ दिया जाय (क्योंकि वे अभी किसी जॉब में नहीं हैं) तो शायद ही कोई मिले जो रिश्वतखोरी के समर्थन में तर्क करते हुए जरा भी हिचकता या शर्माता हो । देखिए, रिश्वत के पक्ष में क्या है आम धारणा -
1- रिश्वत एक सुविधा शुल्क है, इसे निगेटिव रूप में नहीं लेना चाहिए ।
2- दूध का धुला कौन है ? पेट तो हमारा भी है न !
3- जो रिश्वत लेते-देते हैं वे सुखी हैं और उन्नति कर रहे हैं, उनके प्रमोशन भी हो रहे हैं और उनके गोपनीय प्रतिवेदन भी बहुत अच्छे लिखे जाते हैं । इसमें बुरा क्या है ?
4- रिश्वत यदि इतनी बुरी चीज है तो सरकार रोक क्यों नहीं पा रही इसे ? कानून बनाने से कुछ नहीं होता । कानून तो बलात्कार के लिए भी है, लेकिन रुक पाया क्या ? जो प्रचलन में है वह बुरा कैसे हो सकता है ?   
5- हम जी-तोड़ मेहनत करते हैं, रिश्वत हमारा हक़ है ।
6- इसे रिश्वत न कहिए, व्यावहारिकता कहिए, सिद्धांत और नैतिकता का औचित्य भाषणों के बाद नहीं होता । यदि मुश्किलों से बचना चाहते हैं तो आपको व्यावहारिक बनना होगा ।
7- समय-समय पर रिश्वत देते रहोगे तो उच्चाधिकारियों से सम्बंध अच्छे बने रहेंगे और कभी कोई परेशानी नहीं होगी ।
8- लेन-देन तो हर कोई करता है । रिश्वत अब समाज में स्वीकृत आचरण है इसे सरकार द्वारा भी मान्यता मिल जानी चाहिए ।
9- क्या कीजिएगा, लेन-देन के बिना कोई काम नहीं होता, जो रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं वे रिश्वत दे कर छूट भी जाते हैं । जैसी बहै बयार पीठ तब तैसी दीजै – यही है सफलता का सूत्र ।


शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

एक वैज्ञानिक की प्रताड़ना कथा


रामायण में उल्लेख मिलता है कि त्रेतायुग में राक्षसों ने ऋषियों-मुनियों का जीना मुश्किल कर रखा था । किंतु वे तो तपस्वी थे और ज्ञान की साधना में लीन रहते थे फिर ऐसा क्या था कि राक्षस उनकी साधना में आये दिन विघ्न ही नहीं उत्पन्न करते बल्कि उन्हें प्रताड़ित भी करते रहते थे । इस प्रश्न का उदाहरण सहित उत्तर इसरो के वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन की प्रताड़ना कथा में मिल जायेगा । यह प्रताड़ना कथा कलियुग के ईसा वर्ष 1994 में प्रारम्भ हुयी थी जो 24 वर्ष तक निरंतर चलती रही ।

एशिया महाद्वीप के प्राचीन आर्यावर्त्त में कलियुग के प्रभाव से एक देश में दो देश एक साथ अस्तित्व में आ गये जिनमें से एक है भारत और दूसरा है इण्डिया । दूसरा देश यानी इण्डिया प्रबल है, जबकि भारत को अपने अस्तित्व के लिए कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है । इसी इण्डिया ने अपने दबंग स्वभाव के कारण एक दिन भरपूर क्रूरता के साथ भारत की एक शीर्ष वैज्ञानिक प्रतिभा की सामाजिक और चारित्रिक हत्या कर दी । ...क्योंकि इण्डिया के लोगों को यह गवारा नहीं था कि इसरो का एक भारतीय वैज्ञानिक स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाये । केरल की तत्कालीन सरकार ने उन पर झूठे और गम्भीर आरोप लगाकर एक भारतीय प्रतिभा की सामाजिक हत्या कर दी । देशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने का काम रुक गया और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्रगति को इण्डिया द्वारा अपूरणीय क्षति पहुँचाई गई ।
यूँ अदालत ने उस प्रतिभा को 24 साल बाद बाइज़्ज़त बरी कर दिया ...सभी आर्थिक लाभों और मुआवज़े की रक़म के साथ, किंतु इस बीच भारत कई सौ साल पीछे चला गया । इसलिए तिरुनेलवेली के वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन की कहानी भारत के युवा वैज्ञानिकों के साथ-साथ देश के हर नागरिक को भी जाननी ही चाहिए ।

वर्ष1970 के प्रारम्भ में ही तरल ईंधन रॉकेट प्रणाली को भारत में विकसित करने वाले और स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन “विकास” को विकसित करने में लगे नारायणन को जासूसी करने और तकनीक शत्रु देश को बेचने के झूठे आरोप में वर्ष 1994 में ग़िरफ़्तार कर लिया गया । इण्टेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने नारायणन को इतनी शारीरिक और मानसिक यतानायें दीं कि उन्हें अस्पताल में रखना पड़ा, बाद में उन्हें पचास दिनों तक जेल में भी रखा गया । यह एक ऐसी घटना थी जो भारत के युवा वैज्ञानिकों को बुरी तरह दहशत में लाने और उन्हें हतोत्साहित करने वाली थी । किंतु जब झूठ का साम्राज्य व्यवस्थित हो तो रोशनी की नन्हीं किरण को भी विवश होना पड़ता है । ब्लैक होल से कब कोई फ़ोटॉन जीत सका है !
किंतु नारायणन ने हार नहीं मानी और वे न्याय पाने के लिये चौबीस वर्षों तक निरंतर संघर्ष करते रहे, इस बीच उन्हें सामाजिक और मीडिया की यातनाओं से भी गुजरना पड़ा, किंतु वे रुके नहीं । अंततः नंबी नारायणन को न्यायालय से दोषमुक्त कर दिया गया किंतु उनके जीवन पर चौबीस साल तक लगे रहे ग्रहण को कैसे मुक्त किया जा सकेगा ? 

नंबी नारायणन अदालत से दोषमुक्त तो हो गए किंतु उनके विरुद्ध रचे गये षड्यंत्र के सबूत मिल जाने के बाद भी ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की गई । हमारे देश में ऐसा ही होता है, पीड़ित को दोषमुक्त होने के लिए अपने जीवन का एक लम्बा हिस्सा स्वाहा करना पड़ता है, दूसरी ओर इस सबके लिए उत्तरदायी लोगों के विरुद्ध कोई दण्डात्मक कार्यवाही न होने से इस तरह की घटनाओं पर आज तक विराम नहीं लग सका है, आगे भी नहीं लग सकेगा । ऐसी पंगु न्याय व्यवस्था निष्ठावान लोगों में प्रतिक्रियात्मक आक्रोश उत्पन्न करती रही है, आगे भी करती रहेगी ।    
वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में यह एक अत्यंत क्रूर और घृणास्पद घटना है जिस पर भारत को चिंतित होना चाहिए था, किंतु भारत चिंतित नहीं हुआ, बिल्कुल भी नहीं हुआ । ट्रक के नीचे किसी जाति विशेष के व्यक्ति की मुर्गी कुचल जाने पर हल्ला करने वाली मीड़िया और तथाकथित मानवाधिकारवादियों ने भी इस पर कोई चिंता व्यक्त नहीं की । क्या हम इसी तरह विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं ? यह इण्डिया में होने वाली अत्यंत क्रूर घटनाओं में से एक है ...जिसके लिए भारत सरकार को उनसे और पूरे देश से माफ़ी माँगनी चाहिए । हम इस घटना से दुःखी हैं, और इससे भी अधिक दुःखद यह है कि भारतीय मीडिया ने इस प्रकरण को उतनी गम्भीरता से नहीं लिया जितना लिया जाना चाहिए था । यह घटना देश के युवा वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करने वाली है । क़माल है इतनी तेज तूफ़ान आया और देश में एक पत्ता तक नहीं हिला ! यह पूरे भारत के लिए घोर शर्मिंदगी और आत्मग्लानि का विषय है ।

भर्त्सना करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं । मुझे लगता है कि जिस समाज में प्रतिभाओं की क्रूर सामाजिक और चारित्रिक हत्या कर दी जाती हो और समाज कामोश बना रहने का अभ्यस्त हो उस समाज और देश का परित्याग कर देना चाहिए ।


बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 का विस्फोटक अंत


कानून हो गया ग़ैरकानूनी ... 
सवाल, दर-असल सिर्फ़ इतना सा था कि दो व्यक्तियों के विवाहेतर सम्बंधों में दोषी केवल पुरुष ही क्यों, महिला भी क्यों नहीं ? विद्वानों ने मंथन किया और निर्णय दिया कि धारा 497 स्वयं ही लैङ्गिक असमानता की शिकार है ।
यौन सम्बंध यदि पारस्परिक सहमति से नहीं बनाए गए हैं तो निश्चित्त ही यह किसी एक पक्ष द्वारा किया गया बलात्कार ही माना जाना चाहिए किंतु विवाहेतर यौनसम्बंध यदि दोनों पक्षों की सहमति से बनाए गए हैं तब इन्हें व्यभिचार माना जाना चाहिए या नहीं ?
कोई पुरुष अपनी पत्नी के परपुरुष गमन को यदि अपनी सहमति नहीं देता है तो यह परपुरुष के लिए तो अपराध है किंतु पत्नी के लिए नहीं क्योंकि उसने तो इसके लिए अपनी सहमति दे ही दी थी । अर्थात किसी की पत्नी से व्यभिचार के लिए परपुरुष को उसके पति से भी अनुमति लेने की अपेक्षा की जाती रही है जिसे न्यायाधीशों ने लैङ्गिक असमानता स्वीकार किया है । इस मामले में भरतपुर के बेड़िया बड़े दूरदर्शी निकले जहाँ उनकी सामाजिक परम्परा के अनुसार बेड़िनियाँ अपने-अपने पतियों, भाइयों या पिताओं की अनुमति से ही देह-व्यापार करती रही हैं । यद्यपि देह-व्यापार के अपराध में उन्हें जब-तब सजा भी होती रहती है किंतु अब शायद ऐसा नहीं होगा क्योंकि वे तो अपने स्वजन पुरुषों की अनुमति से ही परपुरुष गमन करती आ रही हैं ।  
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार 27 सितम्बर 2018 के बाद से व्यभिचार नामक आचरण अब शून्य घोषित हो चुका है । नैतिक मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों के टकराव का यह एक ऐसा उदाहरण है जो भारतीय समाज की दिशा तय करने वाला है ।  

विवाहेतर यौनसम्बंध नहीं रहा अब व्यभिचार...

सर्वोच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन, जस्टिस ए. एम. ख़ानविलकर, जस्टिस डी. वाय. चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा के एक निर्णय से 158 साल पुरानी धारा 497 हुई कानून की धार से बाहर । सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचाररोधी कानून को एक पक्षीय और मनमाना घोषित करते हुए लैङ्गिक समानता के अधिकार के विरुद्ध माना है । निर्णय के अनुसार यह कानून महिला की चाहत और यौन चाहत का असम्मान करता है 
हाँ ! यौन सम्बंधों की सहमति को लेकर लैङ्गिक असमानता नहीं होनी चाहिए किंतु यह बात यहीं तक नहीं रुकी, इसके निहितार्थ की गूँज यौन सम्बंधों के सामाजिक ढाँचे को भी प्रभावित करने वाली है ।  

विवाहेतर यौनसम्बंधों की पारस्परिक सहमति और इसका सामाजिक मूल्य समय की धारा में बहता हुआ तृण है जो कभी डूबता सा लगता है तो कभी उतराता सा । दुनिया भर के विभिन्न देशों और समाजों में इसे लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं और तदनुसार ही पाप-पुण्य की परिभाषाएं भी । आज मुझे भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास "चित्रलेखा" की स्मृति हो आई है । कई बार कानून गुलेल की तरह काम करता है जिसे पेड़ पर बैठी चिड़िया कभी स्वीकार नहीं करती । भारतीय समाज में हो रहे पश्चिमी परिवर्तनों के सामाजिक अनुकरण से भारतीय मान्यताओं में परिवर्तन तो होने ही हैं, चाह कर भी इसे रोका नहीं जा सकेगा ।

पाप पापना रहा पुण्य पुण्यना रहा...
कुछ ही समय पूर्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरदान से समलैङ्गिक यौन सम्बंधों को सामाजिक मूल्य प्रदान किए जाने की आकाशवाणी हुई थी । अप्राकृतिक यौन सम्बंधों को प्राकृतिक कृत्य और मौलिक अधिकार मान लिया गया था और अब विवाहेतर यौन सम्बंधों को भी सर्वोच्च न्यायालय का वरदान प्राप्त हो चुका है ।
परस्त्री गमन और परपुरुष गमन अब नहीं रहा अपराध, यौन सम्बंध हुए स्वच्छंद, देहव्यापार की सीमाएं हो गई हैं शिथिल, व्यभिचार मुँह बाए खड़ा है यह जानने को उत्सुक कि अब क्या है उसकी नई परिभाषा ।
एक निर्णय ने ध्वस्त कर दिए भारतीय समाज के सनातन सांस्कृतिक मूल्य, अब हम पश्चिम हो चले हैं और यह माना जा रहा है कि सूर्य को अब कभी पूर्व में नहीं उगना चाहिए ।  

नैतिकता पर प्रभावी हुई संवैधानिकता !
समलैङ्गिक यौनसम्बंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को समाप्त करते हुए विद्वान न्यायाधीशों ने घोषणा कर दी कि अब "सामाजिक नैतिकता नहीं बल्कि संवैधानिकता को ही प्रभावी माना जाएगा।"
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नैतिकता का निर्धारण और संवैधानिकता का निरुपण करता कौन है? निश्चित ही दोनों आकाशीय वर्षा के परिणाम नहीं हैं, नैतिकता का निर्धारण समाज के दीर्घकालीन अनुभव करते हैं और संविधान का निर्धारण तात्कालिक परिस्थितियों के आलोक में व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह करता है ।

अब हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी समाज के लिए लोककल्याणकारी क्या है, समाज के दीर्घकालीन अनुभवों से उपजे नैतिक मूल्य या तात्कालिक परिस्थितियों के आलोक में मात्र कुछ व्यक्तियों द्वारा निर्धारित संवैधानिक मूल्य?  

सोमवार, 10 सितंबर 2018

पत्रकारिता का महानायक - सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन से ...


शासकीय सेवाओं में सम्मान की तलाश...

सुप्र यानी सुरेंद्र प्रपात सिंह का विश्वास है कि जातिगत आधार पर शासकीय सेवाओं में दिये जाने वाले आरक्षण से उनके सम्मान की तलाश पूरी होती है । हम इसका अर्थ यह भी निकाल सकते हैं कि उनके लिये शासकीय सेवा का उद्देश्य लोकहित में गुणवत्तापूर्ण भागीदारी नहीं बल्कि व्यक्तिगत सम्मान भर पाना है ।

सुरेंद्र प्रताप सिंह को पत्रकारिता का महानायक माना जाता है । नवभारत टाइम्स आदि समाचार पत्रों में समय-समय पर प्रकाशित उनके सम्पादकीय लेखों का संकलन किया है आर. अनुराधा ने और पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है राजकमल प्रकाशन ने ।

पुस्तक को सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, राजनीति-कांग्रेस, राजनीति-तीसरा मोर्चा, राजनीति-भाजपा, चुनाव-राजनीति, कश्मीर-समस्या समाधान, राजकाज-भ्रष्टाचार, अर्थनीति, समाज-संस्कृति, पत्रकारिता और परिशिष्ट में वर्गीकृत कर सजाया गया है । परिशिष्ट में फ़िल्म पारके चुनिंदा संवादों के अतिरिक्त गणेश जी के दूध पीने और उपहार सिनेमा अग्निकाण्ड पर टीवी रिपोर्टिंग के कुछ अंशों का समावेश किया गया है ।

मुझे लगता है कि सप्र जी के आलेखों पर गम्भीर विमर्श की आवश्यकता है । मैं धीरे-धीरे उनके आलेखों पर अपने विचार रखने का प्रयास करूँगा ।

पुस्तक के सामाजिक न्याय खण्ड का पहला लेख है मुद्दा नौकरी नहीं सम्मान हैजिसमें सुप्र आरक्षण के प्रबल समर्थन में खड़े दिखायी देते हैं । वे “समाज में बराबरी का अधिकार पाने के लिए” शासकीय सेवाओं में जातिगत आरक्षण हेतु कई शताब्दियाँ भी कम ही मानते हैं । उनके अनुसार, इस सम्बंध में वे विमर्श तो चाहते थे किंतु इसके लिये उन्हें मित्रवत वातावरण का अभाव नज़र आया । सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के लिये वे ऐतिहासिक और आनुवंशिक कारणों को उत्तरदायी मानते हैं साथ ही अनारक्षित वर्ग द्वारा आरक्षण के विरोध में दिये गये किसी भी तर्क को स्वीकार करने के लिये वे तैयार भी नहीं होते । वे मानते हैं कि हिंदू समाज में शोषण और दमन का जो व्यवस्थित चक्र हजारों साल से जाति व्यवस्था को आधार बनाकर चलाया जाता रहा है उसे एक बार उल्टा चलाए बिना जाति व्यवस्था को समाप्त कर पाना छलावा ही होगा । सप्र जी जातीय पिछडेपन को सवर्णों की साज़िश मानते हैं जो शोषित वर्ग के जायज अधिकारों को हड़पना चाहते हैं । उनके अनुसार आरक्षण का विरोध करने वाले फासीवादी होते हैं जिन्हें तर्क और न्याय से चिढ़ होती है ।  
सात दशकों में आरक्षण से हुये सामाजिक परिवर्तनों की वास्तविकता को देख चुकने के बाद भारतीय समाज को उसका निष्पक्ष गुणात्मक विश्लेषण करना चाहिए । हमें यह सत्य स्वीकार करना होगा कि शासकीय सेवाओं में आरक्षण का उद्देश्य यदि वर्ग विशेष का विकास करना है तो यह सिर्फ़ उतने कुनबे का ही मात्र आर्थिक विकास भर होगा, समग्र समाज और देश का सर्वाङ्गीण विकास नहीं । क्योंकि कोई भी शासकीय सेवा पूरे समाज के लिये होती है न कि केवल एक परिवार के लिये ! यही कारण है कि पिछले सात दशकों के बाद भी लोगों का पिछड़ापन दूर नहीं हो सका है । आरक्षण का व्यक्तिगत लाभ केवल कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया है ।

सुप्र जैसे पत्रकार शासकीय सेवाओं में भी वर्गों के प्रतिनिधित्व की बात करते हैं तो आश्चर्य होता है ।

प्रतिनिधित्व की आवश्यकता समाज को वर्गों में बांटती है । विभिन्न वर्गों के राजनीति में प्रतिनिधित्व की तरह ही शासकीय सेवाओं में भी प्रतिनिधित्व की बात को आश्चर्यजनक रूप से मौलिक अधिकार माना जाने लगा जबकि दोनों की प्रकृति अलग है और उद्देश्य भी । सुप्र को लगता है कि आरक्षित वर्गों की तरह ही पिछड़े वर्गों को भी शासकीय सेवाओं में अपने वर्गीय प्रतिनिधित्व के लिये आरक्षण मिलना चाहिये । किंतु शासकीय सेवाओं में किसी भी वर्ग के आरक्षण की माँग को विवेकसम्मत नहीं माना जा सकता । प्रतिनिधित्व एक सांख्यिकीय हठ है जिसका गुणात्मकता से कोई सम्बंध नहीं होता । और बात जब गुणात्मकता की हो तो कोई समझौता क्यों किया जाना चाहिये ? खोये की मिठायी में नीबू-मिर्च के प्रतिनिधित्व की और भिण्डी की सब्जी में दूध के प्रतिनिधित्व की माँग कितनी व्यावहारिक और वैज्ञानिक हो सकती है इस पर पूरे समाज को चिंतन करने की आवश्यकता है ।
हम यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि जिसे वैज्ञानिक कार्यों में रुचि नहीं है उसे इस कार्य में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? जो क्रिकेट नहीं खेल सकता उसे क्रिकेट में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? जो शिक्षा के लिए सुपात्र नहीं है उसे शिक्षा में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? लोग यह क्यों नहीं समझना चाहते कि गुणात्मक दक्षता के प्रतिनिधित्व के लिये आरक्षण एक अतार्किक, अवैज्ञानिक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था है जो उसके वास्तविक पात्रों के नैसर्गिक अधिकारों के बलात् अपहरण का षड्यंत्र है ।
सप्र ने अपने आलेख में चार बातें बलपूर्वक कहने का प्रयास किया है – 1-सामाजिक बराबरी के लिये जातीय आधार पर आरक्षण जायज अधिकारहै, 2- जातीय दृष्टि से पिछड़े लोगों के जायज अधिकारों को हड़पना सवर्णों की साजिश है, 3- आरक्षण का विरोध करने वाले फासीवादी होते हैं जिन्हें तर्क और न्याय से चिढ़ होती है, 4- दक्षिण अफ़्रीका के गोरे (नस्लीय शोषण की) अपनी सड़ी व्यवस्था तर्कों के सहारे लागू रखना चाहते हैं ।  
शोषण और दमन के लिये सवर्णों को उत्तरदायी ठहराते समय सप्र जी यह नहीं बताते कि जाति विशेष के लोग पिछड़े क्यों ? वे कब पिछड़ गए ? पिछड़े होने से पहले समाज में उनकी स्थिति क्या थी ? पिछड़ेपन के मापदण्ड क्या हैं ? क्या शोषण का उलटा चक्र चलाने से शोषण पर सदा के लिये विराम लग सकेगा ? क्या शोषण के अनवरत चक्र को सभ्य समाज का प्रतीक माना जाना चाहिए ?
हमारे देश के विद्वान जब भी आरक्षण को अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए तर्क प्रस्तुत करते हैं तो वे शोषण और पिछड़ेपन के मूल कारणों के इतिहास की पूरी तरह उपेक्षा सी करते हुये प्रतीत होते हैं । उनके पास एक ही रटा रटाया तर्क होता है कि इस सबका कारण सवर्णों का जातिगत विद्वेष रहा है । वे इस बात पर भी कोई चिंतन प्रायः नहीं करना चाहते कि प्राचीन भारतीय समाज की समाज व्यवस्था के उत्कर्ष और उसके पराभव के वास्तविक कारण क्या रहे ?

शनिवार, 8 सितंबर 2018

मंथन


कौन करे
किसका अभिनंदन
कुल गर्दभ के करते मंथन ।
बस ! यही तेरा एक इष्ट !
शेष
केवल अनिष्ट, केवल अनिष्ट !

चिंतनशून्य हुए जब-जब तुम
तर्कशून्य हुए तब-तब तुम   
रीति उपेक्षित
सागर मंथन की  
नहीं वासुकी नहीं मंदराचल
चहुँ ओर व्याप्त तुमुल कोलाहल
हो रहा क्रंदन ही क्रंदन ।
हैं सूने सारे देवालय  
प्रज्वलित नहीं कहीं कोई दीप
तिमिर गहन में
पथ विहीन तू
चला जा रहा किधर बता तो !