शनिवार, 12 सितंबर 2020

सिद्धांतों का सौदा करने वाले सिद्धांतवादी...

उन्होंने दावा किया था कि वे एक ही रास्ते के दो पथिक हैं, उनकी मंजिलें एक हैं ।

मंजिल क़रीब आने को हुयी तो मंजिल पर दावे को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया । एक ने दामन थाम लिया उन लोगों का जो उनके सैद्धांतिक विरोधी थे ।

सत्ता सुंदरी किसी दूसरे के अँगना में नाचे यह एक पथिक को स्वीकार्य नहीं हुआ । जो रहगुज़र था वह शत्रु हो गया,    सिद्धांतों के सौदे के साथ सत्ता पर क़ब्जा हुआ ...लेकिन इसी बीच सत्ता का नशा सिर चढ़कर उत्पात मचाने लगा । कुछ बदमाश और असामाजिक लोग भोले भण्डारी शिव के सैनिक बनकर उत्पात मचाने लगे ।

दोनों सहयात्री पथिक अब एक-दूसरे के सैद्धांतिक शत्रु हैं जो अगले चुनाव में पुनः मित्र बन सकते हैं और आज के मित्र फिर से शत्रु हो सकते हैं । प्रजा इस सारे तमाशे को देखते समय अब हैरान-ओ-परेशान नहीं होती, उसे भी पता चल चुका है कि सिद्धांत और आदर्श वे काँटे हैं जिनसे सत्ता की मछली फ़ँसाई जाती है । अब भारत की प्रजा भी राजा बनने का ख़्वाब देखने लगी है ...लेकिन हर किसी की किस्मत में तो ऐसा नहीं होता न!

फ़िलहाल, कैलाश पर्वत पर साधनारत शिव छद्मसैनिकों के इस उत्पात से तनिक विचलित हुये फिर उन्होंने शनि देव को पूरा मामला हैण्ड ओवर कर दिया । अब तमाशबीनों को “जैसी करनी वैसी भरनी” की प्रतीक्षा करनी होगी ।  

...लेकिन इस सबके बीच मोतीहारी वाले मिसिर जी गुस्से में बड़बड़ाते हैं – “आख़िर सैद्धांतिकता की दुहाई देने वाले लोग इतने असैद्धांतिक हो कैसे जाते हैं” ?

 

देश के भीतर कई देश...

संजय राउत महाराष्ट्र के, सुशांत सिंह राजपूत बिहार के, रिया चोक्रोवोर्ती बंगाल की और कँगना रानावत हिमांचल प्रदेश की नागरिक हैं । ख़बर है कि महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल और हिमांचल के राजा एक-दूसरे के नागरिकों के ख़िलाफ़ षड्यंत्र कर रहे हैं । भारत की प्रजा को पता करना होगा कि इन पारस्परिक शत्रुओं में से कोई भारतीय भी है या नहीं?

भारत के हजार टुकड़े करने का नारा देने वाले उमर ख़ालिद को नास्त्रेदमस की भूमिका में देखकर मैं हैरान हूँ । 

3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद!
      अन्याय पर चुप रहना नागरिक दायित्वों के विरुद्ध है । जब राजा कर्तव्यच्युत हो जाय तब प्रजा को जागरूक होना ज़रूरी हो जाता है ।

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