कथा यह है कि जब सत्य-समर्थक अल्पमत में हुये तो असत्य-समर्थक संख्याबल के प्रभाव से बहुमत में आ गये, अत्याचारों और आतंक में वृद्धि होने लगी, जिससे बचे-खुचे सत्यपथानुगामी हताहत होने लगे। इस तरह सतयुग का अंत हुआ।
त्रेतायुग की कथा आपने रामायण में पढ़ी और सुनी है कि किस तरह दुष्टों ने सत्यवादियों और सदाचारियों के जीवन-पथ को कंटकाकीर्ण कर दिया था। उन्होंने तपस्वियों (i.e. seekers, scientists and researchers) के तपभंग को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया जिससे अधर्म प्रभावशाली होने लगा। विश्वामित्र ने क्रांति करने का बीड़ा उठाया और श्रीराम के नायकत्व में राक्षसों पर नियंत्रण किया ...पर क्षीण लोकचेतना के कारण इसमें स्थायित्व नहीं रह सका, अंततः त्रेतायुग का भी अंत हो गया।
अगला युग द्वापर था जिसकी प्रतिनिधि-कथा महाभारत के माध्यम से सबको विदित है कि किस तरह द्रौपदी का चीरहरण हुआ और संपत्ति एवं सत्ता को लेकर महाविनाशक विश्वयुद्ध हुआ जिसने द्वापरयुग के अंत के साथ कलयुग को आमंत्रित किया।
आज हम सब कलयुग में हैं जिसके बारे में क्या ही बताया जाय, सभी युगों के हीनलक्षणों के समुच्चय का प्रभाव हमारे सामने है।
इस समय जीन्यूज पर शोभना यादव जी अनिरुद्धाचार्य जी से वाक-युद्ध कर रही हैं जिसका सार यह है कि शोभना जी नहीं चाहतीं कि किसी स्वेच्छाचारी और अपराधी के आचरण पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने का स्वाभाविक अधिकार किसी स्वतंत्र विचारक या चिंतक को मिले। उन्होंने स्वेच्छाचारियों के आचरण पर सामाजिक नियंत्रण का विरोध करते हुए अनिरुद्धाचार्य जी को *सनातन का सबसे बड़ा शत्रु* तक बता दिया। ...यही है कलयुग का प्रभाव!
बधाई हो शोभना जी! आप कलयुग की प्रतिनिधि बनकर सामने आ चुकी हैं। आपके अनुसार अपराध को समझने और नियंत्रित करने का अधिकार केवल सत्ता और उसके तंत्र का होता है, समाज के विचारकों और चिंतकों का नहीं।
...महोदया जी! तब तो न्यूज एंकरिंग का भी कोई औचित्य नहीं बनता न! क्या अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता एंकर्स को प्राप्त है वह किसी चिंतक/विचारक को नहीं प्राप्त होनी चाहिए?
शोभना जी! आपको पता है, आप क्या कह रही हैं? आप समाज की अवधारणा को ही अस्वीकार कर रही हैं! आपने अनियंत्रित समाज की गतिविधियों का समर्थन कर दिया है। क्या समाज के आचरण में बुद्धिजीवियों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?
धन्य है आपका वाक् युद्ध, आपका चिंतन और आपका दुस्साहस!